फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नखलऊवा पंचः कवि अज्ञेय की डपट पड़ी तो अरोड़ा से भारतीय हो गईं मुन्नी

Sat, 23 Feb 2019 04:29 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
विज्ञापन
1 of 5
कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन - फोटो : डेमो
सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’ किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। विद्वान मानते हैं कि जिन्हें अंग्रेजी न आती हो वे अज्ञेय को पढ़कर अंग्रेजी कविता के भाव को समझ सकते हैं। वह जितने बड़े कवि थे उतने ही पारंगत गद्य लेखन में भी थे। 
विज्ञापन

2 of 5
कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन - फोटो : amar ujala
उपन्यास, कहानियां, निबंध एवं आलोचनाओं की विधाओं में भी उनकी लेखनी ने धाक जमाई। उन्हें ‘अकविता में कविता’ शैली का जनक भी माना जाता है। वह जातिवाद के घोर विरोधी थे। शिक्षिका रिंकी सिंह बताती हैं, ‘बात तब की है जब वह लखनऊ में रहा करते थे। उनके पड़ोस में एक अरोड़ा परिवार रहता था। अरोड़ा किसी सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे। दोनों लोगों की छतें लगी हुई थीं।
विज्ञापन

3 of 5
कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन - फोटो : डेमो
अरोड़ा जी के एक छोटी लड़की थी। अरोड़ा दंपती प्यार व दुलार से उसे मुन्नी कहा करते थे। अरोड़ा रोज शाम को अपनी बिटिया से कहते, ‘मुन्नी! तुम कौन हो? मुन्नी कुछ कहती तो अरोड़ा जी कहते, ‘कहो, हम अरोड़े होते हैं।’ यह बताने में उनके मुंह से कुछ ऐसा भाव निकलता था कि जैसे अरोड़ा होने पर मुन्नी को गर्व करना चाहिए। एक दिन अज्ञेय से बरदाश्त नहीं हुआ। 

4 of 5
कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन - फोटो : डेमो
अरोड़ा को डपटते हुए बोले, ‘हम ठाकुर हैं, हम ब्राह्मण हैं, बनिया हैं, अरोड़ा है, मतलब किस जाति के हैं, यह बताने पर आपका जोर क्यों रहता है? जातिवाद तो हमारी राजनीति का संकट है, पर आप जैसे लोग इस संकट को घर में घुसेड़ रहे हैं। अरे! अरोड़ा से कभी इंसान भी बन जाए। मुन्नी को यह क्यों नहीं सिखाते, 
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन - फोटो : डेमो
‘हम मनुष्य हैं, इंसान हैं या भारतीय हैं।’ अज्ञेय की डपट से अरोड़ा जी का सिर झुक गया। अगले दिन शाम को जब अज्ञेय अपनी छत पर आए तो उन्हें पड़ोस से आवाज सुनाई पड़ रही थी, ‘मुन्नी कोई पूछे तो बताना हम अरोड़ा नहीं भारतीय हैं।’
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें