कैफी आजमी की शुरुआती जिंदगी संघर्षपूर्ण रही। मैला सा खद्दर का कुर्ता-पायजामा, पैर में गंदी सी चप्पल, सिर पर बड़े-बड़े बाल। कुर्ते की जेब में बीड़ी का बंडल व माचिस और अंगुलियों में हमेशा फंसी हुई सुलगती हुई एक बीड़ी। पूर्व विधायक, सांसद व पूर्व मंत्री काजी जलील अब्बासी से उनकी पहली भेंट कानपुर के चमनगंज में खलीलर्रब के घर हुई।
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कैफी आजमी
- फोटो : डेमो
खलीलर्रब व अब्बासी अच्छे दोस्त थे। कैफी अपनी किताब ‘झंकार’ छपवाने को लेकर जद्दोजहद कर रहे थे। तब अब्बासी लखनऊ के वजीरगंज में रहा करते थे। अब्बासी की पुस्तक ‘क्या दिन थे!’ का एक संस्मरण बताता है, ‘कानपुर में मुलाकात में मैंने कैफी से लखनऊ चलने को कहा। कैफी बोले, ‘मैं तो बेकार हूं, चलता हूं।’ लखनऊ में उनकी मुलाकात कम्युनिस्ट साथियों से कराई।
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कैफी आजमी
- फोटो : डेमो
मेरे घर के सामने बड़ा मैदान था जिसमें मुशायरा हुआ। इत्तेफाक से मुईन अहसन जज्बी और सलाम मछली शहरी भी लखनऊ में ही थे। जज्बी का नाम बड़ा हो चुका था। मुशायरे में आने को कहा तो शर्त लगा दी, ‘चलूंगा तो लेकिन शायरी नहीं पढ़ूंगा।’
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कैफी आजमी
- फोटो : डेमो
सुनकर खराब तो लगा लेकिन हां कह दी। मुशायरा में स्थानीय शायरों के बाद कैफी ने अपनी दो नज्में पढ़ीं। उस वक्त अंजान कैफी की नज्में सुन लोग वाह-वाह करने लगे। बेचारे जज्बी बेचैन होने लगे। रहा नहीं गया तो बोल पड़े, ‘एक गजल मैं भी पढ़ना चाहता हूं।’
मुशायरे में लोगों ने सिर्फ कैफी और जज्बी को सुना। मुशायरा समाप्त हुआ तो कुछ कम्युनिस्ट साथियों ने मुझसे कहा, ‘कैफी को हमे दे दीजिए। मुंबई भेजूंगा।’ आखिर एक दिन कैफी को लखनऊ से मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी पर बैठाकर विदा कर दिया। कैफी ने वहां कितना बड़ा मुकाम बनाया, यह बताने की जरूरत नहीं।