लखनऊ के कोरोना अस्पतालों में ड्यूटी के दौरान किसी ने बीमार मां को घर छोड़कर वार्ड में ड्यूटी निभाई तो कोई अपने सालभर के बच्चे को दादा-दादी के पास पहुंचाकर वार्ड पहुंच गया। पेश है, कुछ ऐसे ही चिकित्सकों की कहानी जो कर्तव्यमार्ग पर डटे रहने के लिए परिजनों को तमाम तरह के कष्ट सहने के लिए छोड़ने को विवश हुए।
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डॉ दर्शन बजाज
- फोटो : amar ujala
मां बेहद बीमार थी...घर में छोड़ ड्यूटी पर निकल पड़ा
डॉ. दर्शन बजाज, एसो. प्रोफेसर, रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग- केजीएमयू
जब मेरी ड्यूटी कोरोना वार्ड में लगी तो उस वक्त मां बेहद बीमार थी। पत्नी की ड्यूटी क्वीनमेरी में थी। छोटे बच्चे घर में थे। काम करने वाली बाई का आना बंद हो गया था। ऐसे में दुविधा बहुत थी। मां से जिक्र किया तो उन्होंने हौसला बढ़ाया। उन्होंने कहा-मेरी चिंता छोड़ो, ड्यूटी पर जाओ। आखिरकार मां को दवा देने के बाद कोरोना वार्ड आ गया। सात दिन वार्ड की ड्यूटी करने के बाद 15 दिन क्वारंटीन में रहा। कॅरियर में यह ड्यूटी सबसे कठिन इसलिए थी कि मां और बच्चे दोनों अकेले थे। फिर भी वार्ड में आने के बाद पता चला कि टीम के कई सदस्य मेरी तरह ही समस्या झेल रहे थे। ऐसे में वीडियो कॉलिंग के जरिए बात कर उन्हें दिलासा दिया तो वह खुद कहने लगीं कि कर्तव्य से कभी पीछे मत हटना। मां और पत्नी के हौसला बढ़ाए रखने की वजह से पूरे मनोयोग से ड्यूटी पर डटे रहे। मेरी सबसे अपील है कि सरकार की ओर से लिए गए फैसले का पालन करें।
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डॉ शिवली अपनी टीम के साथ
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ड्यूटी से पहले बच्चे को मां-बाप के पास भेजा
- शिवली, फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग- केजीएमयू
जब कोरोना वार्ड में ड्यूटी की जानकारी मिली तो उत्साहपूर्वक उसे स्वीकार कर लिया। छोटे बच्चे का हवाला देकर छुट्टी लेने के बजाय उसे माता-पिता के पास भोपाल छोड़ आई। आखिर घर परिवार के साथ मरीजों का इलाज करने का मैंने संकल्प जो लिया है। इसे पूरा करने के लिए अपने बच्चे को खुद से दूर रखा। जब बच्चे की याद आती है तो वीडियो कॉल के जरिए बात कर लेती थी। वार्ड में ड्यूटी करते वक्त मैं मुखिया की भूमिका में रही। ऐसे में यहां कार्यरत सभी डॉक्टर व कर्मचारियों का हौसला बनाए रखना बड़ी चुनौती रही। मेरे साथ डॉ. सोनल सचान, डॉ. अभय, डॉ. अरुण, डॉ. सौरभ डॉ रुचि आदि का पूरा सहयोग मिला।
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डॉ उमेश त्रिपाठी
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पिता की कुछ दिन पहले ही बाईपास सर्जरी हुई थी...पर उन्होंने मुस्कुराते हुए ड्यूटी पर जाने को कहा
- डॉ. उमेश त्रिपाठी, कार्डियोलॉजिस्ट- एसजीपीजीआई
कुछ दिन पहले ही पिता की बाईपास सर्जरी हुई थी। घर में उनकी देखरेख करना वाला कोई नहीं था। उनकी हालत गंभीर थी, लेकिन ड्यूटी पर जाने का आदेश हुआ। डरते हुए पिता से शेयर किया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए ड्यूटी पर जाने को कहा। उनके चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास दिखा। ऐसा लगा कि जैसे वह कह रहे हों कि उनका बेटा देश के लिए कुछ करने जा रहा है। घर से निकला तो आशीष दिया। वार्ड में देखा कि तमाम ऐसे लोग भर्ती हैं, जो पिताजी की उम्र के हैं। मैंने तय किया कि पिताजी को कुछ हो जाता है तो भी मैं इन मरीजों को अपने पिता का दर्जा देकर बचाने का प्रयास करूंगा। मेरे कार्यकाल के दौरान चार गंभीर मरीज ठीक हुए। यह मेरे लिए सबसे बड़ी विजय थी। ड्यूटी पूरी करने के बाद अब घर लौट आया हूं। पिता स्वस्थ हैं। वह कहते हैं कि वार्ड में ड्यूटी करके तुमने जितने लोगों की जान बचाई है, उनका आशीर्वाद मिला है। यही वजह है कि मैं स्वस्थ हो रहा हूं।
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डॉ अनिल गंगवार
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मेरे इंतजार में ही नानी की सांसें उखड़ गई
- डॉ. अनिल गंगवार, एसजीपीजीआई
मैं कोरोना वार्ड में ड्यूटी कर रहा था, इसी दौरान नानी की तबीयत खराब हुई। परिवार के लोगों ने कहा कि वह तुम्हारा इंतजार कर रही हैं। इसके बाद भी मैं नहीं पहुंच पाया। इसी दौरान आइसोलेशन वार्ड में ड्यूटी लग गई। ड्यूटी के दो दिन बाद ही उनकी मौत हो गई। मन विचलित हुआ, लेकिन अंतिम संस्कार में जाने का कोई चांस नहीं था। खुद पर गुस्सा भी आया, लेकिन दोस्तों ने समझाया कि यहां भर्ती मरीजों को अपनी नानी के रूप में देखो और उन्हें ठीक करने का प्रयास करो। आखिरकार मैं पूरे मनोयोग से लगा। वार्ड में भर्ती हर वृद्ध मरीज में मुझे नानी का चेहरा नजर आने लगा। ड्यूटी पूरी होने के बाद करीब पांच मरीज स्वस्थ होकर घर गए। इसे मैं अपनी बड़ी कामयाबी मानता हूं। नानी से नहीं मिल पाया, लेकिन मरीजों के ठीक होकर घर जाने से गजब का आत्म संतोष मिला है।
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डॉ उजमा
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मां ने कहा-बेटी तुम्हारी परीक्षा चल रही है...इस हौसले ने कभी डिगने नहीं दिया
डॉ. उजमा, मेडिकल ऑफिसर, रामसागर मिश्रा अस्पताल
एक महीने पहले मेरी कोरोना मरीजों के इलाज में ड्यूटी लगी। परिवार वाले कोरोना के फैल रहे प्रभाव से बहुत डरे थे। छोटा बेटा भी था। उसे भी घर पर छोड़कर जाना था। जब मैं ड्यूटी पर जाने लगी तो मेरी मां रईस फातिमा ने कहा, बेटी यह तुम्हारी परीक्षा है। तुम्हें पूरी ईमानदारी से मरीजों की सेवा करनी है। ये वो हौसला था जिसने मुझे कभी कमजोर पड़ने नहीं दिया।
एक महीने तक मैं अपने बेटे से अलग रही। मां ही उसे संभालती। वह मुझे याद कर जब बिलखने लगता, मां उसे दुलारकर चुप करा देती। जब मौका मिलता उसे वीडियो कॉल करती। परिवार से भी इसके जरिए जुड़ी रहती। सबको कहती कि मैं ठीक हूं। मेरी चिंता न करें। ड्यूटी के दौरान हमेशा संक्रमित मरीजों के बीच घिरी रहती। मैं बचाव के लिए पूरे प्रोटोकॉल का पालन करती। मां का दिया हौसला ही था कि दिन में तीन बार मरीजों का हालचाल लेती थी। यह सब जब मां को बताती तो वह कहतीं, मरीजों का अच्छे से ख्याल रखना। मैं ऐसे वक्त में अपने सैनिकों को याद करती। वे कितनी बहादुरी से देश की रक्षा कर रहे हैं। इससे मुझे अपनी परेशानियां छोटी लगने लगती।
जब अपने ही घर में खिंच गई लक्ष्मण रेखा...सबने बना ली दूरियां
डॉ. पूनम, गाइनेकोलॉजिस्ट, लोकबंधु अस्पताल
मेरे पास मुंबई और गोंडा से दो प्रसव के मामले आए। दोनों कोरोना पॉजिटिव थीं। दोनों प्रसव सीजेरियन से होने थे। हमारी सबसे बड़ी चुनौती थी जच्चा से बच्चे में संक्रमण न पहुंचे। मुझे खुशी और गर्व है कि दोनों केस में मैं ऐसा कर पाने में कामयाब रही। कोशिशें रंग लाईं और दोनों प्रसूताएं भी कोरोना से जंग जीत गईं। पर, मेरी चुनौतियां अभी कम नहीं हुई थीं। इस बीच मैं खुद संक्रमण की चपेट में आ गई। कोरोना की चपेट में आने के बाद एक नई जंग शुरू हुई। पांच दिन अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में रही। आइसोलेशन वार्ड में दिन तो किसी तरह कट जाता, पर रात में नींद नहीं आती। परिवार की चिंता नींद आने ही नहीं देती। बहरहाल पांच दिन में दो रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद अस्पताल से घर पहुंची। पर, यहां भी लक्ष्मण रेखा खिंची हुई थी। रिश्तेदार, मुहल्ले के लोगों ने मुझसे दूरियां बना लीं। नौकर ने भी आना बंद कर दिया। इसलिए घर का सारा कामकाज खुद ही करना पड़ता। बहरहाल... एक डॉक्टर का फर्ज होता है कि वह मरीजों की जान बचाने में कोई कसर न छोडे़। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं इसमें कामयाब रही।