डॉ अनुराग दीप
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इस तरह समझिए हिंदू उत्तराधिकार कानून के निहितार्थ
भारतीय विधि संस्थान, नई दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.अनुराग दीप कहते हैं कि उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायधीशों (पूर्ण पीठ) का हिन्दू पैतृक संपति के संबंध में दिया गया फैसला बहुत महत्वपूर्ण है। इस मामले का नाम है विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में संसद ने 2005 में संशोधन कर बेटी को भी बेटे के बराबर का अधिकार पैतृक संपति में दिया था। उस समय यह विवाद उठा था कि यह संशोधन कब लागू होगा। क्या यह 2005 के पूर्व से भी लागू हो सकता है। इस विषय पर प्रकाश बनाम फूलवती में 2016 में दो न्यायाधीश की पीठ ने निर्णय दिया कि बेटी को यह अधिकार 2005 के बाद ही मिलेगा। लेकिन दानम्मा सुमन सुरपुर बनाम अमर में 2018 में एक अन्य पीठ ने यह निर्णय दिया कि बेटी को अधिकार 2005 के पहले से मिलेगा। दो विरोधी निर्णय में कौन सा सही है, इसलिए तीन जजों की पीठ बनाई गई। विनीता शर्मा के मामले में न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह 2005 के पहले से लागू होगा। इससे चार प्रमुख बातें स्पष्ट हैं। पहला, अब कानून से पूरी तरह से तय हो गया कि बेटी को अधिकार 1956 से उसी प्रकार प्राप्त है जैसे बेटे को। दूसरा, 9 सितंबर 2005 के पहले जन्मी बेटी को भी पैतृक संपति में बराबर का हक है। तीसरा, यह आवश्यक नहीं है कि पिता 9 सितंबर,.2005 को जीवित हो। चौथा, 1956 का कानून 2005 का संशोधन या 11 अगस्त 2020 का विनीता शर्मा मामले निर्णय केवल पैतृक सम्पत्ति पर लागू है। इसमें न तो स्व अर्जित संपत्ति शामिल है और न ही कृषि संपत्ति। इस निर्णय को लेकर कई आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। मसलन, इस निर्णय के कारण परिवार में कलह और वैमनस्य बढ़ेगा। लड़की की शादी में भी बड़ा खर्च होता है, फिर उसे बेटे के बराबर का हक देना, उचित है? एक आलोचना यह की जा रही है कि बेटी की शादी के बाद उसकी संपति का उत्तराधिकारी उसके पति आदि हो जाते हैं। इस तरह यदि विवाहित बेटी की मृत्यु होती है तो दामाद उस संपति का अधिकारी होगा। यह भी तर्क किया जा रहा है कि लड़कियों पर खतरा बढ़ जाएगा। उसे संपति में एक हिस्सेदार के रूप में देखा जाएगा जो विवाह पश्चात दूसरे घर जाएगी। ये आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं। लेकिन हर चीज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष हैं। विवाद बढ़ेगा, झगड़ा बढ़ेगा यह एक पक्ष है। पैतृक सम्पत्ति में जन्म से बराबर की हिस्सेदारी से बेटी ज्यादा सशक्त होगी, सम्मान पाएगी, यह उससे बड़ा पक्ष है। हो सकता है कि कुछ समय लगे लेकिन उम्मीद है कि सकारात्मक पक्ष प्रबल रहेगा। .