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तस्वीरें: ...जब ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार ने लखनऊ में जड़े थे चौके-छक्के, मैच के टिकट के लिए टूट पड़े थे दर्शक

Thu, 08 Jul 2021 02:00 PM IST
ishwar ashish आरिफ, अमर उजाला, लखनऊ
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दिलीप कुमार - फोटो : अमर उजाला
अभिनय के बेताज बादशाह दिलीप कुमार बुधवार सुबह दुनिया भर में फैले अपने फैंस को रोता-बिलखता छोड़ जमाने से विदा हो गए। उन्होंने छह दशक के फिल्मी सफर में 63 फिल्मों में अभिनय करके कला को नए आयाम तक पहुंचा दिया था। पूरे आलम में उनके दीवानों की भरमार थी, लखनऊ भी इससे अछूता नहीं है। वे कई बार लखनऊ तशरीफ लाए और हर बार अपने चाहने वालों को पहले से अधिक बेकरार कर चले गए। पेश है लखनऊ से जुड़ी ट्रेजडी किंग की कुछ यादें।

केडी सिंह बाबू में दिखाए बल्लेबाजी के जौहर
रंगकर्मी सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ बताते हैं कि ‘जवानी के दिनों की बात है, सन 1971 की। दिलीप कुमार उस दौर में हम जैसे नवजवानों के लिए एक ख्वाब सरीखे थे। उस वक्त ओडियन सिनेमाहाल में उनकी फिल्म ‘गोपी’ लगी थी। कई बार फिल्म देखी और दीवानगी बढ़ती गई। तभी खबर मिली कि दिलीप कुमार साहब लखनऊ आ रहे हैं, वो भी क्रिकेट मैच खेलने। उन्हें रुपहले पर्दे पर नहीं बल्कि रूबरू देखने का मौका मिलेगा। यह सोच कर ही मेरी नींद और चैन उड़ गया। हालांकि मुझ जैसे तमाम उनके फैंस को जैसे ही पता चला कि मशहूर क्रिकेटर मुश्ताक अली के सहायतार्थ होने वाले मैच में दिलीप सर देसाई, बापू नाडकर्णी और सलीम दुर्रानी जैसे नामचीन खिलाड़ियों संग दिलीप कुमार भी मैदान पर हाथ आजमाएंगे। लोग मैच के टिकट और पास पाने के लिए टूट पड़े। खैर बड़ी मुश्किल से एक दोस्त राकेश निगम की मदद से पास का जुगाड़ हुआ। पैड, ग्लब्स पहन कर जब बल्ला थाम कर दिलीप कुमार मैदान में उतरे तो लोग जैसे पागल हो गए। स्टेडियम में सिर्फ दिलीप कुमार और उनके दीवाने.....। अपने चाहने वालों को उन्होंने मायूस भी नहीं किया। छक्के-चौव्वों की बौछार और उनकी जयजयकार....। एक खिलाड़ी की मदद के लिए उन्होंने जो जज्बा दिखाया उससे मेरे दिल में उनकेलिए जगह और भी बढ़ गई।
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- फोटो : social media
लखनवीं खानपान के दीवाने
1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के स्टार प्रचारक के तौर पर दिलीप कुमार ने लखनऊ में एक लंबा वक्त बिताया। आसपास के जिलों में प्रचार के बाद वे शाम को होटल ताज के कमरा नंबर 240 में वापस लौट आते। होटल के मैनेजर शबाहत हुसैन बताते हैं कि उनके जैसा सुलझे और नर्म तबीयत के इंसान से मिल कर लगता ही नहीं था कि यह करोड़ों दिलों की धड़कन दिलीप कुमार हैं। खाने-पीने के वे जितना ज्यादा शौकीन थे उससे ज्यादा उसके बारे में समझ रखते थे। शाम को चाय के साथ प्याज और मिर्च की पकौड़ी के दौरान मुझसे रात के खाने के बारे में पूछते, फिर कहते अगर शेफ को बुला लें तो बेहतर होगा। उस वक्त के हमारे शेफ गुलाम रसूल तो जैसे उनके बुलावे के ही इंतजार में रहते थे। झट से हाजिर हो जाते, फिर दिलीप साहब बिरयानी में फलां और कोरमे में फलां किस्म की बोटियां जैसी बारीक बातें गुलाम रसूल को बतातें। वे पारंपरिक खानों के बेहद शौकीन थे, गुलाम रसूल के हाथों से बना भिंडी गोश्त उनको बहुत पसंद था।
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- फोटो : अमर उजाला
छोटे बच्चों से थी खास मोहब्बत
शबाहत बताते हैं कि दिलीप कुमार बहुत नर्म मिजाज थे, उन्हें बच्चों से बेइतेहा प्यार था। एक बार उन्होंने मुझसे मेरे बेटे जोरेन हुसैन से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की। मेरे लिए तो यह लॉटरी निकलने जैसा था। उस वक्त जोरेन महज ढाई बरस का था। घंटो उसे गोद में लेकर वे खेले और इस शर्त पर जाने दिया कि जब तक वे यहां हैं रोजाना जोरेन की उससे रोज मुलाकात कराई जाएं। जोरेन और वह रोजाना ऐसे खेलते जैसे हम उम्र हो। लखनऊ से वापस जाने के बाद वे लगातार उससे बात करते उसके सपने और भविष्य की योजनाएं पूछते। यहां तक की जब भी हम मुम्बई जाते वो हमको घर बुलाते। यह सिलसिला अब तक जारी था।

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अस्मां हुसैन के साथ दिलीप कुमार। - फोटो : अमर उजाला
सायरा बानो के लिए लखनऊ से ले गए गरारा
फैशन डिजाइनर अस्मां हुसैन बतातीं हैं कि 1998 में अस्मां हुसैन इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नालॉजी के दीक्षांत समारोह में दिलीप कुमार मुख्य अतिथि थे। जब उनसे इसमें शिरकत करने की गुजारिश की तो बहुत ही गर्मजोशी से उन्होंने हामी भरी। होटल ताज में हुए समारोह में हमारी हर स्टूडेंट को उन्होंने सर्टिफिकेट दिया और उससे बातें की। लग ही नहीं रहा था कि इतना बड़ा सुपर स्टार हम लोगों के बीच मौजूद है। उन्होंने अपनी जिंदगी के कठिन दिनों के बारे में बता कर कहा कि ईमानदारी से मेहनत जरूर करनी चाहिए नतीजा यकीनन अच्छा ही आएगा। हम लोगों ने उन्हें टुकड़ी के काम का गरारा भेंट किया। जिसे वे अपनी शरीके हयात सायरा बानो के लिए ले गए।
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दिलीप कुमार अपने अंतिम दिनों में - फोटो : social media
मेरी रूह अवध नगरी की कर्जदार
मेरी रूह अवध नगरी की कर्जदार है। यहां की जुबान और गंगा-जमुनी तहजीब, दोनों ही इंसानियत की एक पूरी की पूरी किताब है, जरूरत इसे पढ़ने और जिंदगी में उतारने की है। ये बातें स्व. दिलीप कुमार ने 1998 में तब कही थी जब अवध सम्मान लेने लखनऊ आए थे। समारोह का आयोजन लखनऊ नगर निगम अवध सम्मान समिति और हिंदी उर्दू साहित्य अवॉर्ड की ओर से किया गया था।

आयोजन समिति के संयोजक अतहर नबी इस समारोह के साक्षी थे। हजरत महल पार्क में आयोजित समारोह में मोतीलाल बोरा, अखिलेश दास, सुनील दत्त, नौशाद, जावेद अख्तर और तात्कालिक सीएम मुलायम सिंह यादव भी मौजूद थे। सम्मान लेने के बाद उन्होंने कहा था कि लखनवी जुबान हमेशा कुछ सिखाती है और यहां की तहजीब इंसानियत का पाठ पढ़ाती है। अतहर नबी के मुताबिक, 1997 में नेशनल मुस्लिम ओबीसी कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन दिलीप कुमार साहब ने ही किया था।
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अवध सम्मान समारोह के दौरान लखनऊ में दिलीप कुमार। - फोटो : अमर उजाला
कवि अस्थाना ने भेंट की थी अनूठी कविता
स्माइल मैन सर्वेश अस्थाना कहते हैं कि अवध सम्मान लेने जब वे आए थे, तब मैंने उनके लिए एक कविता लिखी थी, दिलीप की अभिनय गाथा। इसकी खासियत ये है कि इसमें दिलीप साहब की पहली फिल्म से लेकर सौदागर, किला तक का जिक्र किया गया। यानी उनके फिल्मों के नाम को मिलाकर ही कविता लिखी गई, जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं... ‘सगीना’ में ‘बैराग’ था ‘क्रांति और शक्ति’ बीच, ‘विधाता’ ने ‘आग का दरिया’ भी बहाया था, ‘मजदूर’ ‘दुनिया’ में ‘मशाल’ ले के खड़ा हुआ, ‘धर्म अधिकारी’ से जो ‘कर्मा’ बन आया था। ‘कानून अपना अपना ’ कहते हैं ‘इज्जतदार’, ‘सौदागर’ ने ही ‘किला’ ये बनाया था...।
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