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नवाब शुजाउद्दौला ने बनवाई थी हनुमान गढ़ी, जानें- इसको बनवाने के पीछे की रोचक कहानी

Sat, 19 Oct 2019 04:18 PM IST
ishwar ashish धीरेंद्र सिंह/अमर उजाला, अयोध्या
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हनुमान गढ़ी - फोटो : अमर उजाला
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बजरंगबली की प्रधान पीठ हनुमानगढ़ी के प्रति जनमानस में अगाध आस्था है। देश-विदेश से भी बड़ी संख्या में लोग यहां दर्शन करने पहुंचते हैं। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि आलीशान हनुमानगढ़ी को अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने बनवाया था। इसके पहले वहां हनुमानजी की एक छोटी सी मूर्ति को टीले पर पेड़ के नीचे लोग पूजते थे। हनुमानगढ़ी बनवाने के पीछे सद्भाव की एक रोचक कहानी है। बाबा अभयराम ने नवाब शुजाउद्दौला के शहजादे की जान बचाई थी, तब नवाब के बार-बार मिन्नत करने पर उन्होंने हनुमानगढ़ी बनवाने का प्रस्ताव रखा, जिसे नवाब ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। 
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हनुमान गढ़ी - फोटो : अमर उजाला
अयोध्या जो भी जाता है वह हनुमानगढ़ी के दर्शन जरूर करता है। रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान राम जब अयोध्या लौटे तो हनुमानजी ने यहां रहना शुरू किया। इसी कारण इसका नाम हनुमानगढ़ या हनुमान कोट पड़ा। यहीं से हनुमानजी रामकोट की रक्षा करते थे। मुख्य मंदिर में माता अंजनी की गोद में पवनसुत विराजमान हैं। अयोध्या के मध्य में स्थित हनुमानगढ़ी तक पहुंचने के लिए 76 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यही अयोध्या की सबसे ऊंची इमारत भी है जो चारों तरफ से नजर आती है। इस विशाल मंदिर व उसका आवासीय परिसर करीब 52 बीघे में फैला है। वृंदावन, नासिक, उज्जैन, जगन्नाथपुरी समेत देश के कई नगरों में इस मंदिर की संपत्तियां, अखाड़े व बैठक हैं।
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हनुमान गढ़ी - फोटो : अमर उजाला
हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास बताते हैं कि साहित्यरत्न व साहित्य सुधाकर से विभूषित रायबहादुर लाला सीताराम ने 1933 में अपनी पुस्तक श्री अवध की झांकी में विस्तार से हनुमानगढ़ी का प्रामाणिक जिक्र किया है। उनका कहना है कि त्रेतायुग की रामनगरी के जीर्णोद्धार के समय महाराजा विक्रमादित्य ने 360 मंदिर बनवाए। औरंगजेब के समय इसमें से कई तहस-नहस हो गये। राममंदिर भी तभी तोड़ा गया, बाबर तो कभी अयोध्या आया ही नहीं। इस बात का जिक्र लेखक किशोर कुणाल ने भी किया है।

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हनुमान गढ़ी - फोटो : अमर उजाला
17वीं शताब्दी में हनुमानगढ़ी एक टीला रह गया था। हनुमानजी की छोटी मूर्ति जो आजकल फूलों से ढकी हुई बड़ी मूर्ति के आगे रखी है, एक पेड़ के नीचे पूजी जाती थी। बाबा अभयराम दास जी यहां रहते थे। उन्हीं दिनों नवाब शुजाउद्दौला (1739-1754) का पुत्र बीमार हो गया। हकीम व वैद्य सब हार गये और रोग बढ़ता ही गया। नवाब परेशान हो गये तो हिंदू मंत्रियों ने बाबा अभयराम की महत्ता व उन पर हनुमत कृपा के बारे में बताया। नवाब मान गये।
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हनुमान गढ़ी - फोटो : अमर उजाला
मंत्रियों ने आकर बाबा से बड़ी अनुनय-विनय की तब उन्होंने फैजाबाद आकर नवाब के बेटे को देखा। अभयराम ने कुछ मंत्र पढ़कर हनुमानजी के चरणामृत का जल छिड़का। जिसके बाद वह उठकर बैठ गया। थोड़े ही दिनों में वह ठीक भी हो गया। नवाब बहुत प्रसन्न हुए, बाबा से बोले- हम आपको कुछ देना चाहते हैं, बाबा बोले- हम साधु हैं हमें कुछ नहीं चाहिए। नवाब बार-बार अनुरोध करने लगे तो बाबा ने कहा कि हनुमान जी की कृपा से यह ठीक हुए हैं, आपकी श्रद्धा है तो हनुमानगढ़ी बनवा दीजिए।
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महंत - फोटो : अमर उजाला
आज भी हनुमानगढ़ी में कायम हैं पुरानी परंपराएं
कुछ साल पहले हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास के आवास पर रोजा इफ्तार कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मुसलमान पहुंचे थे और इसकी खबर सुर्खियों में आयी थी। अयोध्या के इतिहास में पहली बार ऐसा आयोजन किया गया था। इसी के बाद अयोध्या के प्रमुख मुसलिम नेता सादिक अली के घर पर ईद मिलन समारोह में बड़ी संख्या में साधु और महंत शामिल हुए।
 
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हनुमान गढ़ी - फोटो : अमर उजाला
वाजिद अली शाह ने की थी भंडारे की शुरूआत
माह के पहले मंगल को नवाब वाजिद अली शाह ने भंडारे की परंपरा शुरू की थी। जब कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों ने बवाल करने का प्रयास किया तो नवाब ने हिंदुओं का साथ दिया और उत्पाती लोगों को सजा दी। घोषणा की गयी थी कि मुसलमान वहां 28 जुलाई 1855 को नमाज पढ़ेंगे। इस घटना से काफी तनाव बढ़ा पर नवाब वाजिद अली शाह ने इससे जुड़े तथ्यों की बाकायदा जांच करायी और पाया गया कि केवल तिल का ताड़ बनाने का प्रयास किया गया।
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