प्रतीकात्मक तस्वीर
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पीजीआई के न्यूरो ऑटोलॉजी यूनिट के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमित केसरी ने बताया कि प्री मेच्योर प्रेग्नेंसी वाले बच्चों, एनआईसीयू में रहने वाले बच्चों या जो गर्भवती अधिक दवाओं का सेवन करती हैं, उनके बच्चों में कान से जुड़ी बीमारियां ज्यादा पाई गई हैं। ऐसे लोगों को सावधानी बरतने की जरूरत होती है। लोग इस उम्मीद में समय गंवा देते हैं कि उम्र बढ़ने पर बच्चा सुनने और बोलने लगेगा। बाद में ऐसे बच्चों का इलाज मुश्किल हो जाता है। इसी तरह स्ट्रोक और वायरल इंफेक्शन से ग्रसित लोगों में भी सुनाई पड़ना बंद हो जाता है। इसी तरह कुछ बच्चोें में अनुवांशिक समस्या भी होती है। ये बच्चे समय से आ जाएं तो उनका इलाज आसान रहता है, क्योंकि उम्र बढ़ने पर ब्रेन विकसित होता है और आवाज की वजह से सिग्नल देने वाले सर्किट सुषुप्तावस्था में चले जाते हैं।