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हो जाएं सतर्कः रुमैटिक बुखार से खराब हो रहे बच्चों के दिल के वॉल्व, शरीर में सूजन समेत ये हैं लक्षण

Tue, 14 May 2019 12:54 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
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डेमो - फोटो : डेमो
बच्चों में दिल की बीमारियों को जन्मजात बीमारी मान लिया जाता है, लेकिन बड़ी संख्या में रुमैटिक बुखार की वजह से भी दिल की बीमारियां हो रही हैं। गले में स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया के संक्रमण के बाद तेज बुखार होता है। साथ ही शरीर में सूजन आ जाती है।

यह संक्रमण दिल के वॉल्व को भी नुकसान पहुंचाता है। कई बार यह हृदय को स्थायी रूप से बंद भी कर देता है, जिसमें बच्चे की तत्काल मौत हो जाती है। इसका असर होने पर बच्चे के छाती में दर्द, सांस फूलता है और शरीर नीला पड़ जाता है।

फेफड़े में बार-बार संक्रमण, पानी या दूध पीने में दिक्कत होती है। यह पांच से 14 साल की उम्र वाले बच्चों को ज्यादा होता है। यह जानकारी नई दिल्ली से आए पीडियाट्रिक कार्डियक सर्जन डॉ. असीम आर श्रीवास्तव ने दी। वह कार्डियोथोरेसिस एंड वस्कुलर सर्जन्स प्रोग्रेसिव वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से राजधानी में आयोजित कांफ्रेंस को संबोधित करने आए थे।
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डेमो
डॉ. श्रीवास्तव ने बताया कि इस रुमैटिक हार्ट डिजीज में बच्चे के शरीर में बनने वाले एंटी बॉडीज प्रभावित होते हैं। इसलिए बच्चों के गले में संक्रमण, तेज बुखार को गंभीरता से लेना चाहिए। हालांकि मिनिमल सर्जरी शुरू होने से इसका इलाज काफी आसान हो गया है।

अब हार्ट को खोलने की जरूरत नहीं पड़ती है। हाथ के नीचे और छाती के पास छोटा सा छेद करके भी वॉल्व दुरुस्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि तत्काल इलाज शुरू हो जाए तो इन बीमारियों से बचाया जा सकता है। बाल रोग विशेषज्ञों को हार्ट डिजीज के बारे में भी प्रशिक्षित करने की जरूरत है।

एक मंच पर अलग-अलग विधा के विशेषज्ञों को लाने से चिकित्सकीय व्यवस्था में सुधार होगा। कार्यशाला का उद्घाटन लोहिया संस्थान के निदेशक प्रो. एके त्रिपाठी ने किया। उन्होंने संस्थान में हृदय रोग संबंधी सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त करने का वादा किया।

इस दौरान एसजीपीजीआई के सीटीवीएस विभागाध्यक्ष डॉ. निर्मल गुप्ता, केजीएमयू के डॉ. शैलेंद्र कुमार, डॉ. एसवी सिंह, डॉ. केएस दवे, डॉ. जेएल साहनी ने संबोधित किया। कार्यशाला में करीब 150 कार्डियक सर्जन ने हिस्सा लिया।
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डॉ धर्मेंद्र श्रीवास्तव, लोहिया संस्थान - फोटो : अमर उजाला
वक्त पर इलाज से बचेगा दिल
अचानक सिर में तेज दर्द होने लगे और सीने के साथ ही पीठ में भी दर्द हो तो यह एओटिक डिफेक्शन नामक बीमारी के लक्षण हैं। इसमें दिल से शरीर को खून की आपूर्ति करने वाले नर्स क्षतिग्रस्त हो जाती है। अंगों को ठीक से खून नहीं मिल पाता है। ऐसे मरीजों को तुरंत कार्डियक सर्जन की सलाह लेनी चाहिए। जितनी जल्दी चिकित्सक के पास पहुंचेंगे, दिल के बचने की संभावना उतनी अधिक होती है। - डॉ. धर्मेंद्र श्रीवास्तव, लोहिया संस्थान

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डॉ अमित चौधरी, सैफई - फोटो : अमर उजाला
किसी भी अंग में दर्द को हल्के में न लें
हृदय रोग की मूल वजह तनाव, ब्लड प्रेशर, खानपान और बेढंगी जीवनशैली है। कई बार ब्लड प्रेशर व तनाव के कारण दिल से शरीर के अंगों को खून पहुंचाने वाली नस क्षतिग्रस्त हो जाती है। इससे अंगों को भरपूर खून नहीं मिल पाता है। सबसे ज्यादा दिक्कत गुर्दा, आंत, पैर, दिमाग, पेट समेत दूसरे अंगों को होता है। किसी भी अंग में अचानक तेज दर्द हो तो उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। - डॉ. अमित चौधरी, सैफई
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डॉ शांतनु पांडेय - फोटो : अमर उजाला
धड़कन बढ़े तो सावधान हो जाएं
अचानक घबराहट होने लगे और दिल की धड़कन बढ़कर 100 से अधिक हो जाए। पसीना छूटने लगे और सांस फूलने लगे तो दिल की धड़कन की जांच करानी चाहिए। करीब 30 फीसदी मरीजों में इस तरह की समस्या पाई जाती है। ऐसे मरीजों को नियमित रूप से अपनी जांच कराने के साथ के ब्लड प्रेशर को सामान्य रखने का प्रयास करना चाहिए।  - डॉ. शांतनु पांडेय, एसजीपीजीआई
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डॉ भुवन चंद्र तिवारी, लोहिया संस्थान - फोटो : अमर उजाला
वक्त रहते बीमारी की पहचान जरूरी
हृदय संबंधी बीमारियों की वजह कई है। इन्हें सही समय पर पहचानना जरूरी है। तनाव को कम करके हृदय संबंधी बीमारियों से बचा जा सकता है। अब कार्डियोलाजिस्ट और कार्डियक सर्जन का संयुक्त समूह बनाया जा रहा है। दोनों मिलकर मरीज का उपचार करेंगे तो ज्यादा फायदा होगा। 70 फीसदी मरीजों में एंडियोप्लास्टी की जरूरत होती है, जबकि 10 फीसदी में बाईपास सर्जरी करनी होती है। बाकी मरीज दवाओं से ठीक हो जाती हैं। - डॉ. भुवन चंद तिवारी, लोहिया संस्थान
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डाॅ विजयंत देवराजन - फोटो : अमर उजाला
छोटे से चीरे से हो रही है सर्जरी
दिल में सुराख व वॉल्व प्रत्यारोपण के लिए अब मरीजों का सीना काटने की जरूरत नहीं है। पसलियों के बीच छोटा चीरा लगाकर दिल के सुराख को बंद किया जा सकता है। वॉल्व भी बदला जा सकता है। 15 से 18 सेमी का चीरा लगाना पड़ता था। छाती की हड्डियां कटने से मरीजों को कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ती थीं। मरीज को ज्यादा दिन अस्पताल में रहना पड़ता था। - डॉ. विजयंत देवराजन लखनऊ

 
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डॉ धमेंंद्र श्रीवास्तव और डॉ शांतनु पांडेय - फोटो : अमर उजाला
प्रदेश में सिर्फ 57 कार्डियक सर्जन
कार्डियोथोरेसिक एंड वस्कुलर सर्जन्स प्रोग्रेसिव वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. शांतनु पांडेय एवं सचिव डॉ. धर्मेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि प्रदेश में सिर्फ 57 कार्डियक सर्जन हैं, जबकि मरीजों की संख्या हजारों में है। कार्डियक सर्जरी के लिए ओटी से लेकर अन्य तरह के बड़े सेटअप की जरूरत होती है। सरकारी संस्थानों में इस तरह के सेटअप नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो राजधानी में एसजीपीजीआई, केजीएमयू, लोहिया संस्थान, कानपुर में कार्डियोलॉजी संस्थान, सैफई रिम्स के बाद पूर्वी इलाके में सिर्फ बीएचयू है। इन छह संस्थानों में एमसीएच की नौ सीटें हैं। यानी हर साल सिर्फ नौ कार्डियक सर्जन तैयार हो रहे हैं और मरीजों की संख्या हजारों में है। यही वजह है कि वेटिंग लिस्ट लगातार बढ़ती जा रही है। प्राइवेट संस्थानों में भी ज्यादातर दिल्ली के आसपास है। ऐसी स्थिति में कार्डियोलॉजिस्ट और कार्डियक सर्जन एक मंच पर संयुक्त रूप से मरीजों का इलाज करेंगे। एसोसिएशन इसके लिए लोगों प्रोत्साहित करेंगी। उन्होंने कहा कि कार्डियक सर्जरी में लोगों की रुचि कम होने की एक बड़ी वजह सरकारी नीति भी है।
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