दुनिया में भला कौन सा ऐसा व्यक्ति है जो हंसना या खुश होना नहीं चाहता। हास्य-व्यंग्य में लिपटे लेख और कविताएं श्रोताओं व पाठकों की पहली पसंद होती हैं। इस विधा के लेखकों और कवियों का मानना है कि हिंदी के प्रति बच्चों और युवाओं में आकर्षण बढ़ाने के लिए ‘हास्य-व्यंग्य’ काफी कारगर सिद्ध हो सकता है। आज हम बात कर रहे हैं राजधानी के प्रतिष्ठित ‘हास्य-व्यंग्य’ लेखकों और कवियों से जिन्होंने हिंदी के उत्थान के लिए इस विधा की उपयोगिता बताई।
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मुकुल महान
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हंसना-हंसाना एक तरह की चिकित्सा पद्धति: मुकुल महान
राजधानी के लोकप्रिय कवि मुकुल महान मानते हैं कि हास्य-व्यंग्य एक तरह की चिकित्सा पद्धति है जो व्यक्ति को स्वस्थ और प्रसन्न रखने में कारगर सिद्ध होती है। यह विद्यार्थियों के लिए तो बहुत ही जरूरी है। एक ओर जहां हास्य रोचकता पैदा करता है तो वहीं दूसरी ओर व्यंग्य समझ को बढ़ाता है। हालांकि आजकल देखा यह गया है कि अंग्रेजी माध्यम के बच्चे हिंदी की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं और अच्छा लिख रहे हैं क्योंकि वे न सिर्फ हिंदी को एक विषय के तौर पर देखते हैं बल्कि उनमें मातृभाषा के प्रति आकर्षण भी रहता है। मुकुल महान की अब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और उन्हें राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान से हाल ही में उनकी पुस्तक ‘यमलोक में घोटाला’ के लिए शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ पुरस्कार दिया गया है। इसके पहले उन्हें अट्ठहास सम्मान समेत कई पुरस्कार मिल चुके हैं।
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सर्वेश अस्थाना
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बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल हो हास्य-व्यंग्य: सर्वेश अस्थाना
पूरी दुनिया में अपनी हास्य कविताओं से लाखों लोगों को गुदगुदाने वाले कवि इस्माइलमैन सर्वेश अस्थाना किसी परिचय केमोहताज नहीं हैं। यश भारती और काका हाथरसी सम्मान समेत करीब साढे़ छह सौ सम्मानों से नवाजे जा चुके सर्वेश अस्थाना की आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वहीं पांच अन्य पुस्तकें जल्द प्रकाशित होने वाली हैं। वे बताते हैं कि विद्यार्थी रोचकता चाहता है और जब उसे अपने विषयों में रोचकता नहीं मिलती तो वह पढ़ाई से ऊबने लगता है। इसलिए मेरा विचार है कि ‘हास्य-व्यंग्य’ की रचनाओं को भी बच्चों के पाठ्यक्रम के शामिल किया जाए। सरकार इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल करे। बच्चों के लिए समर्पित सर्च फाउंडेशन केसंस्थापक सर्वेश अस्थाना खिलौना, छत्र छाया, बाल उत्सव और सृजन पीठ जैसी संस्थाओं के भी जनक हैं। वे करीब डेढ़ दर्जन विदेश यात्राएं कर वहां भी हास्य के माध्यम से हिंदी का डंका बजा चुके हैं और ये सिलसिला बदस्तूर जारी है।
55 के हो गए इस्माइलमैन, आज मनाएंगे मुस्कान दिवस
10 सितंबर को जन्मे सर्वेश अस्थाना 55 वर्ष के हो गए हैं। खास बात ये है कि उनकी पुत्री काव्या और पुत्र सर्वज्ञ का भी जन्मदिन गुरुवार को ही है। पूरा परिवार मिलकर तीनों का जन्मदिन मुस्कान दिवस के रूप में मनाता है।
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अनिल बांके
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अनिल बांके ने हास्य को बनाया हिंदी के प्रचार का माध्यम
नगर निगम से 2011 में सेवानिवृत्त हुए राजधानी के मशहूर हास्य कवि अनिल बांके कई दशक से हिंदी मंचों की शान हैं। उन्होंने हास्य-व्यंग्य को हिंदी के प्रचार का माध्यम बनाया। उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और ‘ठहाका श्री’ व साहित्य गौरव समेत कई सम्मान भी मिल चुके हैं। अनिल बांके बताते हैं कि हिंदी के विकास में हास्य-व्यंग्य बहुत अहम भूमिका निभा सकता है। बच्चों को सरल और सहज भाषा में विषय की पढ़ाई कराने की जरूरत है। वे हिंदी के प्रचार के लिए हास्य और व्यंग्य का कुछ इस तरह से प्रयोग करते हैं : पोस्टमार्टम कर रहे बनकर सबके बाप। हिंदी में घुस आए हैं डॉक्टर झोलाछाप।
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श्याम मिश्रा
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श्याम की कलम से इमरजेंसी में जन्मा व्यंग्य
राजधानी के वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य रचनाकार श्याम मिश्र बताते हैं कि जब देश में इमरजेंसी लगी तो काफी पाबंदियां थीं। वे कहते हैं कि मैं पहले गीत, मुक्तक व कविताएं लिखा करता था लेकिन इमरजेंसी के दौरान हास्य और व्यंग्य ने जन्म लिया और तब से अब तक यह सिलसिला चला आ रहा है। उन्होंने ‘सारेगामापा’ के नाम से एक पुस्तक का संपादन भी किया जिसमें देश के शीर्ष हास्य-व्यंग्य कवियों को शामिल किया। श्याम मिश्र बताते हैं कि हंसना स्वाभाविक प्रक्रिया है, सभी हंसना चाहते हैं जिसमें हास्य कविताएं काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बस देखना यह होगा कि कहीं हास्य अपनी सीमाएं लांघकर अश्लीलता की ओर न जाने पाए।
जब एक इंजीनियर को हुआ हास्य कविताओं से प्रेम
पेशे से इंजीनियर रहे शाहजहांपुर के मूल निवासी 72 वर्षीय राजेश अरोड़ा ‘शलभ’ को बचपन से ही हिंदी से लगाव रहा जो धीरे-धीरे लेखन की ओर मुड़ गया। वे अब तक 16 पुस्तकें लिख चुके हैं जिनमें से 12 हास्य-व्यंग्य की हैं। राजेश अरोड़ा का मानना है कि हास्य ऐसी विधा है जो लोगों के उदास चेहरों पर मुस्कान लाती है। अपनी मातृभाषा में हास्य-व्यंग्य का साहित्य लोगों को ज्यादा आकर्षित करता है। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद से 2006 में सेवानिवृत्त हुए राजेश अरोड़ा ने हास्य गीतों की पहली पुस्तक 1968 में लिखी थी जिसे अपनी पॉकेटमनी से प्रकाशित करवाया था। वर्ष 2018 में अंतरराष्ट्रीय साहित्य मंच की ओर से उन्हें बैंकाक में आयोजित हिंदी सम्मेलन में 30 साहित्यकारों के शिष्ट मंडल में शामिल किया गया। इसके अलावा उन्होंने कम्बोडिया और वियतनाम में भी हिंदी का प्रचार किया। गत 12 जून को शलभ का एक कोरोना विषयक हिंदी गीत कैलीफोर्निया के एफएम रेडियो से प्रसारित किया गया।