बदहाली की रुदाली सुनना है तो कभी गोमती रिवर फ्रंट पर चले जाइए। वही रिवरफ्रंट जिसका नाम ही कभी आकर्षण का केंद्र हुआ करता। दावा किया जाता कि ये शहर की नई झांकी पेश करेगा। 2000 करोड़ रुपये इस प्रोजेक्ट पर खर्च भी हुए। फिर भी करीब 8.5 किमी. में रिवरफ्रंट का अधूरा ही विकास हुआ। पर, पिछले छह साल में रिवरफ्रंट का रखरखाव सीबीआई जांच और प्रोजेक्टों के सिंचाई विभाग को हैंडओवर नहीं होने के पेंच में ऐसा फंसा कि जो विकास हुआ भी था वह बदहाल हो गया। गोमती बैराज के पास टूटी पड़ी बेंच, जलकुंभी व कूड़े से अटी जेट्टी (नाव पर चढ़ने के लिए तैरता हुआ प्लेटफॉर्म) और टूटी रेलिंग, ये सब अब बदहाली की रुदाली ही गा रहे हैं।
सपा सरकार में गोमती रिवरफ्रंट विकास की परियोजना पर काम शुरू हुआ। बिना पर्यावरणीय अनापत्ति के साथ शुरू हुई इस परियोजना पर शुरू से ही वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे। 2017 में सरकार बदली तो सीबीआई जांच शुरू हुई। इसके साथ ही रिवरफ्रंट को संवारे जाने का काम भी बंद हो गया।
नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने से लेकर इसके किनारों को संवारने का काम भी इसमें अटक गया। जो काम पूरे हुए भी उनका रखरखाव नहीं होने और अधिकारियों की अनदेखी से बदहाली हर तरफ दिखने लगी है। सुकून की तलाश में पहुंचने वाले अगर बैठना भी चाहें तो टूटी पड़ीं बेंच मुंह चिढ़ाती हैं। शौचालय, जनसुविधा परिसर, वाटर कूलर तक बिना उपयोग के ही कंडम हो चुके हैं।