परिवार के कारण कपल के बीच मनमुटाव
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मजबूरी में नहीं हंसी-खुशी लें अलग रहने का फैसला
महानगरों में कई माता-पिता बच्चों को अपनी ही सोसाइटी या आस-पास ही अलग घर दिला देते हैं, ताकि बच्चे मनमर्जी से रह सकें और उन पर कोई बंदिश या निजता की समस्या न हो। माता-पिता भी खुश और बच्चे भी खुश! लेकिन ऐसा बहुत कम है, अधिकतर मामलों में तो पारिवारिक अनबन, निजता, आजादी, घर के खर्चे और सामाजिकता आदि मुद्दे ही आधार होते हैं। दरअसल, माता-पिता से अलग रहने का फैसला कहीं हंसी-खुशी से होता है तो कहीं मजबूरीवश। जहां यह फैसला हंसी-खुशी से होता है, वहां इसके कई फायदे हैं और जहां मजबूरीवश होता है, वहां कई तरह के नुकसान!
एक-दो कमरे का फ्लैट और उसमें शादी के बाद सास-ससुर के साथ रहना है। अपने लिए स्पेस तलाशना, मनचाहे कपड़े पहनना, दोस्तों का आना-जाना, सब कुछ सहज और आसान नहीं। सास-ससुर की तरफ से कोई बंदिश न होते हुए भी कई तरह की बंदिशें और औपचारिकताएं निभानी पड़ती हैं। उस पर माता-पिता के नियम-कायदे भी बीच-बीच में अपनी भूमिका निभाते हैं। अब इन सबमें तालमेल बिठा लिया तो ठीक, नहीं तो धीरे-धीरे यही मनमुटाव का कारण बन जाते हैं। लेकिन अगर लड़के-लड़की, दोनों जॉब करते हैं और माता-पिता भी शारीरिक एवं आर्थिक रूप से स्वस्थ-संपन्न हैं तो अलग रहने में कोई बुराई नहीं।