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महिलाओं का दिमाग पुरुषों से होता है अलग? स्टडी में सामने आई अनोखी बात

Fri, 22 Nov 2019 05:32 PM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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- फोटो : social media
कॉग्निटिव न्यूरो साइंटिस्ट गिना रिप्पन की ज़िंदगी में साल 1986 में 11 जून सबसे हसीन दिन था।इस दिन उन्होंने अपनी बेटी को जन्म दिया था।और यही वो दिन था जब मशहूर फ़ुटबॉलर गैरी लिनेकर ने मर्दों के फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप में हैट्रिक बनाई थी। उस रात रिप्पन के वॉर्ड में 9 बच्चे पैदा हुए थे। सभी रोते हुए नवजातों को बारी-बारी से उनकी मां को सौंपा जा रहा था।
जब रिप्पन को उनकी बच्ची सौंपी गई तो नर्स ने कहा, "ये बच्ची सबसे ज़्यादा शोर कर रही है।लड़की जैसी आवाज़ ही नहीं लग रही।" नर्स की बात सुनकर रिप्पन सोच में पड़ गईं कि अभी उनकी बच्ची को पैदा हुए 10 मिनट भी नहीं हुए और उसे लड़की और लड़के की श्रेणी में बांट दिया गया। लड़का-लड़की में भेद वाली ऐसी सोच पूरी दुनिया फैली है।
जबकि ईश्वर ने दोनों को एक जैसा बनाया है।ख़ुद इंसान भी यही मानता है कि मर्द और औरत ज़िंदगी की गाड़ी के दो पहिए हैं। फिर भी दोनों आपस में ही फ़र्क़ करते हैं।मर्द और औरत के ज़हन बुनियादी तौर पर एक दूसरे से अलग हैं। इस विचार को चुनौती देने के लिए रिप्पन कई दशकों से काम कर रही हैं।उनका काम 'द जेंडर्ड ब्रेन' नाम की किताब में दर्ज हैं।


 
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- फोटो : pixa
महिलाओं और पुरुषों का दिमाग
रिप्पन ख़ुद इस बात की वक़ालत करती हैं कि इंसान का दिमाग़ लिंग की बुनियाद पर एक दूसरे अलग नहीं होता। बल्कि समाज इसका एहसास कराता है।ऐसे में उनकी किताब का शीर्षक थोड़ा गुमराह करने वाला सा लगता है। पैदाइश से लेकर बुढ़ापे तक हमारे बर्ताव, चाल-ढाल और सोच-समझ के तरीके को आधार बनाकर ही मान लिया गया है कि औरत और मर्द के दिमाग़ में बुनियादी फ़र्क़ है। रिप्पन को इस बात की तकलीफ़ ज़्यादा है कि वर्ष 2019 में भी हम ऐसी दक़ियानूसी सोच को आगे बढ़ा रहे हैं।लैंगिक भेदभाव आज भी जारी है।भले ही इसका रंग-रूप बदल गया है।



 
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- फोटो : pixa
क़रीब 200 बरसों से हम ये जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या मर्द का दिमाग़ औरत के दिमाग़ से अलग है।लेकिन हमेशा ही इस सवाल का जवाब नहीं में रहा है।साइंस और तकनीक की मदद लेने के बाद भी कुछ पुराने ख़याल पूरी तरह ग़लत साबित हुए हैं।फिर भी समाज से ये फ़र्क़ नहीं मिट रहा है। एक सच ये भी है कि महिलों का मस्तिष्क पुरूषों के मुक़ाबले औसतन छोटा होता है।औरतों के मस्तिष्क का आकार पुरुषों से क़रीब 10 फ़ीसद छोटा होता है।और इसी की बुनियाद पर महिलाओं की समझ को कम कर के आंका जाता है। रिप्पन कहती हैं अक़्ल औऱ समझ का संबंध अगर मस्तिष्क के आकार से होता, तो हाथी और स्पर्म व्हेल का दिमाग़ आकार में इंसान से कहीं ज़्यादा बड़ा होता है।तो फिर उनमें इंसान जैसी समझ क्यों नहीं होती।बताया जाता है कि मशहूर वैज्ञानिक आईंस्टाइन का मस्तिष्क औसत मर्दों के मुक़ाबले छोटा था।लेकिन उनकी समझ और अक़्ल का कोई सानी नहीं था।


 

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- फोटो : pixa
दिमाग़ के आकार का अक्ल से रिश्ता
इस बुनियाद पर कहा जा सकता है कि दिमाग़ के आकार का अक़्लमंदी से कोई लेना देना नहीं है।फिर भी, समाज में फ़र्क़ करने वाली सोच अपनी जड़ मज़बूत किए हुए है। नक़्शे पढ़ने का काम पूरी तरह समझ की बुनियाद पर आधारित है।लेकिन अक्सर ये काम मर्दों को ही दिया जाता है क्योंकि माना जाता है कि वही इस काम को बेहतर कर सकते हैं। रिप्पन का कहना है कि मस्तिष्क के आकार के अंतर को कुछ ज़्यादा ही बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है।ये तो हम जानते हैं कि हमारा मस्तिष्क दो गोलार्ध में बंटा होता है। इन दोनों हिस्सों को बीच होता है कॉर्पस कैलोसम जो दिमाग़ के दोनों हिस्सों के बीच पुल का काम करता है। इसे इंफ़ॉर्मेशन ब्रिज या सूचना का पुल भी कहते हैं।और ये ब्रिज पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं में ज़्यादा व्यापक होता है।


 
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क्या कहता है विज्ञान?
साइंस की ये रिसर्च महिलाओं को अतार्किक बताने वालों को आईना दिखाती है।अक्सर कहा जाता है कि महिलाओं में सोचने समझने की क्षमता कम होती है। क्योंकि, उनकी सोच पर जज़्बात ज़्यादा हावी रहते हैं।जबकि रिसर्च इन सभी बातों को ग़लत साबित करती है। रिप्पन अपनी क़िताब में लिखती हैं, 'आम धारणा ये है कि पुरुष गणित और विज्ञान के अच्छे जानकार होते हैं।इन दो मुश्किल विषयों को उनका दिमाग़ ज़्यादा बेहतर समझता है।इसलिए नोबेल पुरस्कार या ऐसे ही अन्य बड़े पुरस्कार जीतने पर उनका पहला हक़ है।जबकि ये दावे सरासर ग़लत हैं। दशकों की रिसर्च के बाद साबित हो गया है कि दिमाग़ एक ही तरह से काम करता है।यहां तक कि मर्द और औरत के मस्तिष्क की बनावट में फ़र्क़ कर पाना भी मुस्किल है।'

 
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- फोटो : Pixabay
हमारी सोच को शक्ल देने में हार्मोन का बड़ा रोल होता है।औरतों को हर महीने मासिक धर्म की बायोलॉजिकल साइकिल से गुज़रना पड़ता है।इस वक़्त उनके शरीर में कई तरह के हार्मोन रिसते हैं।और इसी बुनियाद पर उन्हें कई अहम मौक़ों पर काम करने से रोक दिया जाता है। यहां तक कि अमरीका के स्पेस प्रोग्राम में महिलाओं को इसी आधार पर शामिल नहीं किया गया।प्री मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम की धारणा वर्ष 1930 में सबसे पहले सामने आई थी। आज भी बहुत से लोग यही मानते हैं कि माहवारी शुरू होने से पहले महिलाओं के शरीर में होने वाले बदलाव उनकी सोचने समझने की क्षमता पर भी असर डालते हैं। रिप्पन एक अन्य रिसर्च के आधार पर कहती हैं कि, माहवारी शुरू होने से पहले महिलाओं में बड़ी मात्रा में एस्ट्रोजन नाम का हार्मोन सक्रिय हो जाता है।और ये महिलाओं की सोचने समझने की शक्ति पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।


 
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- फोटो : pixa
क्या महिलाओं और पुरुषों का दिमाग़ एक जैसा काम करता है?
रिप्पन कहती हैं कि बहुत सी धारणाएं समाज में इतनी गहरी जड़ जमा लेती हैं कि अगर उन पर रिसर्च की जाए तो नतीजे उन धारणाओं के मुताबिक़ आते हैं।आख़िर रिसर्चर भी तो इसी समाज का हिस्सा हैं।सामाजिक विचार उन्हें भी प्रबावित करते हैं।यहां तक कि ख़ुद महिलाओं की सोच उन्हीं धारणाओं के अनुसार रूप लेने लगती है। इसमें कोई शक नहीं कि बुनियादी तौर पर हम सभी का मस्तिष्क एक जैसा काम करता है।लेकिन, आगे चलकर ये वैसे ही काम करता है जैसी उसे ट्रेनिंग दी जाती है। मगर, समाज सदियों से औरतों और मर्दों के बीच फ़र्क़ करता आया है।हद तो ये है कि हम बच्चे को खिलौने भी उसके लिंग के आधार पर देते हैं।अगर कोई लड़का गुड़ियों से खेलने लगता है तो परिवार वालों को चिंता सताने लगती है कि बेटा किसी और दिशा में तो नहीं जा रहा है।यही बात लड़की के संदर्भ में भी लागू होती है।


 

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हालांकि बहुत से लोगों का कहना है कि खिलौनों में लिंग का भेद नहीं करना चाहिए।जबकि रिप्पन का कहना है कि बच्चों को ऐसे खेल और खिलौनों से खिलाया जाएं जिससे उनके मस्तिष्क का विकास ज़्यादा से ज़्यादा हो सके।वो शुरुआत में ही लड़की-लड़के के बीच भेदभाव के चक्रव्यूह में ना फंस जाएं।बच्चों की ट्रेनिंग बिना किसी भेदभाव के होनी चाहिए।और ये काम एक मुहिम के तहत किए जाने की ज़रूरत है। ब्रिटेन में इसी के लिए Let Toys Be Toys नाम की मुहिम चलाई गई है।जबकि ऑस्ट्रेलिया में Play Unlimited नाम का अभियान चला कर लोगों को बच्चों में लड़की-लड़के का भेद ख़त्म करने के लिए प्रेरित किया जा सके।ऐसे अभियानों से आंशिक सफलता मिली भी है।लेकिन इसे व्यापक स्तर पर किए जाने की ज़रूरत है।

 
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सच यही है कि हर इंसान का दिमाग़ बुनियादी तौर पर एक जैसा होता है।लेकिन उसके काम का तरीक़ा हर इंसान में अलग-अलग होता है।दिमाग़ लड़की या लड़का होने की बुनियाद पर काम नहीं करता।हमारे मस्तिष्क को ये काम समाज और उसे दी जाने वाली ट्रेनिंग सिखाती है।
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