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कब शुरु हुई आईवीएफ तकनीक, कैसे हुआ था इसका इजाद और क्या है इसका इतिहास?

Fri, 07 Feb 2020 05:03 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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IVF Inventor - फोटो : Social Media
आईवीएफ तकनीक उन करोड़ों महिलाओं के लिए क्रांति की तरह है, जो कुछ कारणों से मां नहीं बन पाती थीं। आज आईवीएफ तकनीक के जरिए लाखों मां-बाप संतान सुख पाने में सक्षम रहे हैं। इस तकनीक के बिना लाखों-करोड़ों महिलाएं मां बनने के सुख से वंचित रह जाती थीं। महिला को यह सुख दे पाने की तकनीक इजाद करने के पीछे भी एक महिला का ही हाथ है। आइए जानते हैं, क्या है इस आईवीएफ तकनीक का इतिहास, कौन थी वह महिला वैज्ञानिक और कैसे हुआ इस तकनीक का इजाद:
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मिरियम मेनकिन - फोटो : BBC
ये कहानी उस महिला वैज्ञानिक की है जिसने मां न बन पाने के दर्द को समझा और इसके खात्मे के लिए दवा भी तलाशी। इस महिला वैज्ञानिक का नाम है- मिरियम मेनकिन। मिरियम, हॉवर्ड में फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉ. जॉन रॉक के साथ एक तकनीशियन के तौर पर काम करती थीं। उनका मकसद इंसान के शरीर के बाहर प्रजनन करने वाले ऐसे अंडाणुओं को उपजाऊ बनाना था, जिनमें बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं होती। खुद डॉक्टर रॉक का मकसद भी बांझपन का निदान ढूंढना था। वो असल में अपनी रिसर्च से ऐसी औरतों की मदद करना चाहते थे जिनकी बच्चेदानी तो सेहतमंद थी लेकिन फैलोपियन ट्यूब गड़बड़ थी। इस काम में मिरियम ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। 
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मिरियम मेनकिन - फोटो : BBC / Harvard University
करीब 6 साल की मशक्कत और लगातार मिलने वाली नाकामियों के बाद फरवरी 1944 में मिरियम को कामयाबी मिली। जब उन्होंने अपनी लैब में देखा कि जिस स्पर्म को उन्होंने अंडे के साथ रखा था, वो एक हो गए हैं और कांच की डिश में इंसानी भ्रूण बनना शुरू हो गया है। मिरियम मेनकिन की इस कामयाबी से बच्चे पैदा करने की तकनीक में एक नए युग का आगाज हुआ। ऐसी कई महिलाओं के का मां बनने का सपना साकार होने लगा जो इसकी उम्मीद खो चुकी थीं। आज इस तकनीक को दुनियाभर में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक के नाम से जाना जाता है।

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मिरियम मेनकिन (फाइल फोटो) - फोटो : BBC / Harvard University
डॉक्टर रॉक ब्रूकलिन के एक खैराती अस्पताल में भी अपनी सेवाएं देते थे, जहां मिरियम सुबह आठ बजे ही पहुंच जाती थीं और ऑपरेशन थिएटर के बाहर टहलती रहती थीं। डॉक्टर रॉक अंडाशय का एक छोटा सा टुकड़ा मिरियम को देते थे, जिसे वो दौड़कर चौथे माले पर बनी लैब में ले जाती थीं और फिर उसमें अंडा तलाशती थीं। ये कोई आसान काम नहीं था। इस अंडे को तलाशने के लिए अक्सर शोधकर्ताओं को सूक्ष्मदर्शी कांच की जरूरत होती है। लेकिन मिरियम इसे नंगी आंखों से ही तलाश लेती थीं। यही नहीं, वो ये भी बता देती थीं कि अंडा सही आकार का है कि नहीं। 
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दुनिया में पहली बार आईवीएफ तकनीक से पैदा हुईं लुईस ब्राउन (फाइल फोटो) - फोटो : social Media
मिरियम के लिए ये हर हफ्ते का काम हो गया। वो मंगलवार को अंडा खोजतीं, बुधवार को उसे स्पर्म के साथ मिलाती और शुक्रवार के दिन उसे माइक्रोस्कोप से देखतीं। ये काम वो 6 साल से भी ज्यादा समय तक करती रहीं। फरवरी 1944 में एक शुक्रवार को उन्हें कामयाबी मिल ही गई। हालांकि मिरियम खुद इस तरीके से बच्चा पैदा करने के हक में नहीं थीं। ये बात खुद उन्होंने एक बार एक रिपोर्टर को बताई थी। 1978 में दुनिया का पहली बार इन विट्रो फर्टिलाइजर (आईवीएफ) तकनीक से बच्चा पैदा हुआ था। उसका नाम है लुईस ब्राउन। 2017 में अमेरिका में सबसे ज्यादा 2,84,385 महिलाओं ने इस तकनीक से गर्भ धारण किया। इनसे 78,052 बच्चे दुनिया में आए। मेडिकल साइंस के इतिहास में ये कोई रातों-रात होने वाला करिश्मा नहीं था। बल्कि वर्षों की मेहनत, तकनीकी महारत और सब्र का नतीजा था।
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डॉ. जॉन रॉक - फोटो : BBC / Harvard
लेकिन बहुत मेहनत के बावजूद, डॉक्टर रॉक की तरह मिरियम मेनकिन एक बड़ा नाम नहीं बन पाईं। लोग उन्हें डॉक्टर रॉक की सहायक के तौर पर ही जानते रहे। अमेरिका की रटगर्स यूनिवर्सिटी की इतिहासकार मारग्रेट मार्श का कहना है कि डॉ. रॉक एक चिकित्सक थे। लेकिन मिरियम अपने मिजाज से भी वैज्ञानिक थीं। मारग्रेट मार्श ने वेंडा रोनर के साथ मिलकर 2008 में डॉ. रॉक की जीवनी लिखी है। लेकिन उन्हें अफसोस है कि इस किताब में उन्होंने मिरियम का जिक्र डॉ. रॉक की सहायिका के तौर पर ही किया है। हालांकि अब वो एक और किताब लिख रही हैं, जिसमें मिरियम के काम को भरपूर श्रेय दे रही हैं।
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सांकेतिक तस्वीर
मिरियम फ्राइडमेन का जन्म 8 अगस्त 1901 को यूरोप के बाल्टिक देश लैटविया में हुआ था। बचपन में ही वह अपने परिवार के साथ लैटविया से अमेरिका आ गई थीं। उनके पिता डॉक्टर थे। बच्चपन में वो अपने पिता से कहानियां सुनती थीं कि कैसे विज्ञान जल्द ही डायबिटीज जैसी बीमारी का इलाज ढूंढ निकालेगा। मिरियम ने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से ऊतक विज्ञान (सेल साइंस) और तुलनात्मक शारीरिक रचना विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद आनुवांशिकी विज्ञान में कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री ली। साथ ही न्यूयॉर्क में जीव विज्ञान और शरीर क्रिया विज्ञान की भी शिक्षा ग्रहण की।

मिरियम की यह खोज लाखों-करोड़ों महिलाओं के जीवन में मां बनने की खुशी लेकर आई। आज इस तकनीक के जरिए कई महिलाएं मां बन पाती हैं। 
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