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कोरोना का कहर: टीकाकरण के कितने दिनों बाद तक शरीर में बनी रहती हैं एंटीबॉडीज? आईसीएमआर का बड़ा खुलासा

Fri, 17 Sep 2021 04:19 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना संक्रमण से सुरक्षा - फोटो : Pixabay
कोरोना संक्रमण के बढ़ते हुए खतरे को देखते हुए देशभर में वैक्सीनेशन की रफ्तार को तेज कर दिया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में अब तक 77.24 करोड़ से अधिक लोगों को वैक्सीन की कम से कम एक डोज मिल चुकी है। हालांकि लोगों के मन में अब भी एक सवाल बना हुआ है कि वैक्सीनेशन के बाद कितने दिनों तक शरीर में सुरक्षात्मक एंटीबॉडीज बनी रह सकती हैं?  इसी बारे में अध्ययन कर रही वैज्ञानिकों की एक टीम ने बड़ा खुलासा किया है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के शोधकर्ताओं ने हालिया अध्ययन में पाया  कि टीकाकरण के बाद 4 महीने के भीतर कोविड एंटीबॉडीज के स्तर में कमी आ सकती है। इस अध्ययन के बाद एक बार फिर से लोगों में संक्रमण के खतरे को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि वैक्सीन कोरोना संक्रमण के गंभीर मामले और उससे होने वाली मौत के खतरे को कम करने में सहायक हैं, हालांकि जिस तरह से शरीर में बनी एंटीबॉडीज के स्तर में गिरावट देखने को मिली है, उसने चिंता का जरूर बढ़ा दिया है। आइए आगे की स्लाइडों में अध्ययन के बारे में विस्तार से जानते हैं।
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टीकाकरण से बनी एंटीबॉडीज - फोटो : पीटीआई
कितने दिनों तक असरदार रहती हैं वैक्सीन?
आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में बताया, वैक्सीन लेने के कुछ ही महीनों में लोगों के शरीर में बनी एंटीबॉडीज में गिरावट देखने को मिली है। कोवैक्सीन और कोविशील्ड, दोनों ही वैक्सीन लेने वाले लोगों में यह गिरावट देखी गई है। कोविशील्ड लेने वालों में पहले शॉट के 6 महीने बाद एंटीबॉडीज के स्तर में कमी दर्ज की गई है। भुवनेश्वर स्थित आईसीएमआर के स्थानीय चिकित्सा अनुसंधान केंद्र में वैक्सीन की दोनों डोज ले चुके 614 स्वास्थ्य कर्मियों पर किए गए अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पूरी तरह से वैक्सीनेटेड लोगों में चार महीने के भीतर कोविड एंटीबॉडी में कमी देखी गई है।
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एंटीबॉडीज का स्तर जानने के लिए अध्ययन - फोटो : Pixabay
अध्ययन में क्या पता चला?
भारत में कोरोना के डेल्टा वैरिएंट के बढ़ते मामलों के समय में शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। अध्ययन में शामिल प्रतिभागियों में से 308 ने कोविशील्ड जबकि 306 ने कोवैक्सिन की दोनों खुराक ली हुई थी। इन 614 में से 81 लोग पहली बार कोविड-19 से संक्रमित हुए थे। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन 257 लोगों को पहले भी कोरोना का संक्रमण हो चुका था, उनमें से वैक्सीन की दोनों डोज लेने के बाद भी 33 लोगों में कोरोना का संक्रमण हो गया। इस आधार पर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि वैक्सीन से बनी एंटीबॉडीज के स्तर में समय के साथ कमी आ जाती है।

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समय के साथ कम हो जाती हैं एंटीबॉडीज (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
क्या कहते हैं अध्ययनकर्ता?
अध्ययन के लेखकों में से एक डॉ भट्टाचार्य कहते हैं, कोवैक्सीन ले चुके लोगों में टीकाकरण के दूसरे महीने के बाद से ही एंटीबॉडीज के स्तर में कमी देखने को मिली है। वहीं जिन लोगों ने कोविशील्ड वैक्सीन लगवाई है उनमें टीकाकरण के चौथे महीने के बाद एंटीबॉडीज कम होती पाई गई हैं। हालांकि एंटीबॉडीज के घटते स्तर का मतलब यह नहीं है कि आप कोरोना से सुरक्षित नहीं है।
वहीं आईसीएमआर अध्ययन के सह-लेखक डॉ संघमित्रा कहते हैं, यह अध्ययन एंटीबॉडीज के कम होते स्तर को जरूर दिखाता है पर हमें हमेशा यह भी ध्यान रखना चाहिए कि टी और बी कोशिकाएं भी महत्वपूर्ण कारक हैं जो वायरस से लड़ने के लिए स्मृति बनाने में मदद करती हैं। यह लोगों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सहायक हो सकती हैं। 
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एंटीबॉडीज कितने दिनों तक रहती हैं प्रभावी? - फोटो : pixabay
एंटीबॉडीज को लेकर अन्य देशों के अध्ययन क्या कहते हैं?
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल के अंत तक इस अध्ययन का फॉलोअप भी आ जाएगा, जिसमें स्थिति और स्पष्ट होगी। इसके अलावा यूके में किए गए एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने फाइजर या एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की दो खुराक ले चुके लोगों में कुछ समय बाद एंटीबॉडीज के स्तर में कमी आने के बारे में बताया था। यूएस एफडीए ने हाल ही में एक समीक्षा में बताया कि 
फाइजर-बायोएनटेक वैक्सीन की प्रभावशीलता हर दो महीने के बाद 6 प्रतिशत तक कम हो जाती है। वहीं यूके के अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि वैक्सीन की दोनों डोज ले चुके लोगों में एंटीबॉडीज के स्तर में  5-6 महीनों के बाद 12 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 


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नोट: यह लेख भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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