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ब्लैक फंगस: तेजी से बढ़ रहे हैं मामले, विशेषज्ञों ने निकाला इलाज का 100 गुना सस्ता तरीका

Tue, 08 Jun 2021 06:19 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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ब्लैक फंगस (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Social media
देश में कोरोना वायरस संक्रमण के साथ पिछले दिनों ब्लैक फंगस (म्यूकोरमाइकोसिस) के मामले भी तेजी से सामने आए हैं। ब्लैक फंगस को कई राज्यों ने महामारी तक घोषित कर दिया है। देश में ब्लैक फंगस के अब तक 28 हजार से ज्यादा सामने आ चुके हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक महाराष्ट्र और गुजरात में संक्रमण के सबसे ज्यादा मामले देखे जा रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक पहले भी ब्लैक फंगस संक्रमण के मामले आते रहें हैं, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर में स्टेरॉयड के ज्यादा इस्तेमाल के कारण यह ज्यादा चर्चा में आ गया है। सामान्य तौर पर एंफोटेरिसिन जैसी कुछ दवाइयों के साथ इसका इलाज किया जा सकता है, हालांकि गंभीर रोगियों को ऑपरेशन की आवश्यकता होती है। ब्लैक फंगस की दवाइयां और ऑपरेशन दोनों ही मंहगे हैं, इसी को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों ने इलाज का एक ऐसा तरीका निकाला है जो पारंपरिक इलाज से 100 गुना तक सस्ता हो सकता है।
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ब्लैक फंगस की दवा - फोटो : Social media
एंफोटेरिसिन का लिपोसोमल फ्रॉम
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक कोविड-19 से ठीक होने के बाद ब्लैक फंगस संक्रमण से जूझ रहे रोगियों के ब्लड क्रिएटिनिन के स्तर की जांच और सावधानी पूर्वक निगरानी समस्याओं को कम करने में सहायक हो सकती है। ब्लैक फंगस का इलाज कर रहे सर्जनों ने पाया कि एंफोटेरिसिन इंजेक्शन के लिपोसोमल फ्रॉम का प्रयोग 100 गुना तक सस्ता हो सकता है। एंफोटेरिसिन के इस्तेमाल के दौरान विशेष सावधानी रखने के साथ खून की जांच करते रहना आवश्यक हो जाता है, जिससे किडनी में क्रिएटिनिन के स्तर का पता लगाया जा सके। क्रिएटिनिन एक अपशिष्ट उत्पाद है जिसे किडनी शरीर से बाहर निकालती रहती है।
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एंफोटेरिसिन-बी - फोटो : Social media
दोनों ही तरह से प्रभावी है दवा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि एंफोटेरिसिन के कारण किडनी की खराबी के मामले ज्यादा सामने आ रहे हैं। जिसके चलते इस दवा के लिपोसोमल फ्रॉम की मांग ज्यादा बढ़ गई है। डॉक्टरों का कहना है कि एंफोटेरिसिन के दोनों रूपों की प्रभावकारिता समान है। जिन रोगियों को पहले से ही किडनी फेलियरल या डायबिटिक कीटोएसिडोसिस की समस्या है उन्हें कंवेशनल फ्रॉम में एंफोटेरिसिन देने से बचना चाहिए। 

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ब्लैक फंगस को पहचानें - फोटो : Social media
ब्लैक फंगस संक्रमण की पहचान कैसे करें?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक ब्लैक फंगस संक्रमण का असर शरीर के कई अंगों पर देखा जा सकता है। इसमें प्रमुख रूप से आंखों और नाक के आसपास दर्द और लालिमा, बुखार-सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ और कुछ लोगों को उल्टी के साथ खून आने की समस्या हो सकती है। इस तरह के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस बारे में तुरंत अपने डॉक्टर से सलाह लें।
 
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ब्लैक फंगस से बचने के लिए ब्लड शुगर की जांच करते रहें - फोटो : Social media
म्यूकोरमाइकोसिस से बचाव के लिए क्या करें?
स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से जारी एडवाइजरी के अनुसार ब्लैक फंगस संक्रमण से बचाव के लिए हाइपरग्लेसेमिया (हाई ब्लड शुगर) को नियंत्रित रखने के साथ कोविड-19 से ठीक होने के बाद तथा सभी डायबिटिक रोगियों को अपने ब्लड शुगर के स्तर की जांच करते रहना चाहिए। स्टेरॉयड का प्रयोग न करें या डॉक्टर के सलाह के अनुसार बहुत कम मात्रा में करें। जिन लोगों को ऑक्सीजन थेरेपी या ह्यूमिडिफ़ायर की आवश्यकता हो रही है उन्हें इसके लिए स्वच्छ और जीवाणुरहित पानी का ही उपयोग करना चाहिए। संक्रमण के लक्षण दिखने पर डॉक्टर की सलाह से ही एंटीबायोटिक/एंटीफंगल दवाओं का प्रयोग करें।
 
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संक्रमण के प्रति बरतें सावधानी - फोटो : Social media
क्या गलती नहीं करनी चाहिए
स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से जारी एडवाइजरी के अनुसार संक्रमण के संभावित लक्षणों को नजरअंदाज न करें।  अगर आपकी नाक बंद है तो इसे हर बार की तरह बैक्टीरियल साइनोसाइटिस न मानें, विशेष रूप से यदि आप कोविड-19 संक्रमित हैं या कोविड से ठीक होकर लौटे हैं। लक्षणों के संदेह में संक्रमण का पता लगाने के लिए जांच कराने से हिचकिचाएं नहीं। यदि आपको संक्रमण हो गया है तो इसका तुरंत इलाज शुरू कर दें, महत्वपूर्ण समय न गंवाएं।

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नोट: यह लेख एक अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया है। खबर का कुछ हिस्सा स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से जारी एडवाइजरी के आधार पर बनाया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 
 
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