प्रतीकात्मक तस्वीर
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वैक्सीन का उत्पादन महंगा और सवाल ये भी है कि गरीब देशों को ये वैक्सीन हासिल करने में कोवैक्स से कैसे मदद मिल पाएगी? इस पर डॉक्टर सौम्या स्वामीनाथन कहती हैं, 'दुनियाभर के देशों के दो समूह हैं। इनमें से एक स्ववित्त पोषित हैं, जो वैक्सीन के लिए भुगतान करेंगे। दूसरे समूह में बानवे देश हैं जो कुछ भुगतान कर सकते हैं लेकिन वो बाहरी मदद पर निर्भर रहेंगे। उन्हें वैक्सीन मुफ्त या फिर बहुत कम कीमत पर मिलेगी।'
आंकड़ों की बात करें तो सभी देश महामारी से उबर सकें इसके लिए कोवैक्स को 38 अरब डॉलर यानी करीब 28 खरब रुपयों की जरूरत होगी। ये बहुत बड़ी रकम है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर महीने जितना नुकसान हुआ है, ये रकम उसकी महज दस फीसदी है। डॉक्टर सौम्या स्वामीनाथन इसे लेकर कहती हैं, 'अगर आप महामारी को देखेंगे तो समझ जाएंगे कि सिर्फ अपने देश और अपने लोगों को सुरक्षित कर लेने भर से समस्या का समाधान नहीं होगा। वैश्विक स्तर पर व्यापार, अर्थव्यवस्था और यात्राओं को लेकर रुकावट बनी रहेगी। पूरी दुनिया के हर देश तक वैक्सीन पहुंचे, ये तय करना हर देश के हित में है, नहीं तो सामान्य स्थिति नहीं आ पाएगी।' वो ये दावा भी करती हैं कि कोवैक्स इसलिए बनाया गया है कि गरीब मुल्कों को वैक्सीन के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।