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विशेषज्ञ से जानें: कोरोना से ठीक होने के बाद किन बातों का ध्यान रखें, मास्क के बिना हम कब घूमना शुरू करेंगे?

Mon, 12 Jul 2021 04:14 PM IST
सोनू शर्मा हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
कोरोना वायरस आखिर कब खत्म होगा? यह एक बड़ा सवाल है, जिसका जवाब अब तक नहीं मिल पाया है और आगे कब मिलेगा, यह भी एक सवाल ही है। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, देश में राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान के तहत अब तक 37 करोड़ 73 लाख से अधिक टीके लगाए जा चुके हैं। बीते 24 घंटे में 12 लाख 35 हजार से अधिक टीके लगाए गए हैं। वही, देश में संक्रमण से स्वस्थ होने की दर भी 97.22 फीसदी हो गई है। लेकिन अभी भी दैनिक मामले की संख्या बहुत अधिक है। बीते 24 घंटे में 37 हजार से अधिक लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई है। विशेषज्ञ कहते हैं कि संक्रमण से बचने का सबसे अच्छा उपाय है मास्क पहनना और ये तो लोग पिछले डेढ़ साल से करते आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मास्क के बिना हम कब घूमना शुरू करेंगे? आइए विशेषज्ञ से जानते हैं कोरोना से जुड़े ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब... 
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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
मास्क के बिना हम कब घूमना शुरू करेंगे? 
  • दिल्ली स्थित एम्स की डॉ. पद्मा श्रीवास्तव कहती हैं, 'पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना से जूझ रही है और सभी इसी के इंतजार में हैं कि कब कोरोना खत्म होगा और लोग मास्क से निजात पाएं। हालांकि इसके लिए एक-एक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वो कोरोना के नियमों का पालन करें और वैक्सीन जरूर लगवाएं। इसके अलावा ऐसा नहीं सोचें कि मास्क एक मजबूरी है, क्योंकि मास्क इस वक्त भले ही कोरोना वायरस से बचने के लिए लगा रहे हैं, लेकिन ये अन्य संक्रामक बीमारी से भी बचाता है। खासतौर पर प्रदूषण और धूल से भी हमारी सुरक्षा करता है। आपने देखा होगा कि जापान जैसे देश में मास्क लगाना लोगों के लिए आम बात है। इसलिए अगर मास्क को अपना लेंगे, तो अन्य बीमारी से भी दूर रहेंगे।' 
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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
कोविड से ठीक होने के बाद किन बातों का ध्यान रखें? 
  • डॉ. पद्मा श्रीवास्तव कहती हैं, 'कोविड का संक्रमण लोगों को कई प्रकार से हो रहा है, माइल्ड (हल्का), मोडरेट (मध्यम) और सीवियर (गंभीर)। माइल्ड में लोग घर में ही दवा लेकर ठीक हो जाते हैं। मॉडरेट में लोगों को 2-4 हफ्ते तक का वक्त लग जाता है, जो सीवियर होते हैं, उन्हें 4 से 8 हफ्ते तक ठीक होने में लग जाता है। ऐसे लोग आईसीयू में पहुंच जाते हैं और फेफड़े की समस्या भी हो सकती है। अब ठीक होने के बाद तुरंत भारी व्यायाम न करें। अगर ठीक होने के बाद कोई समस्या आ रही है, जैसे खांसी, सांस फूलना आदि तो खुद से दवा न लें बल्कि पोस्ट कोविड अस्पताल में जाकर दिखा लें। बहुत ज्यादा तनाव न लें। हेल्दी (स्वस्थ) खाना खाएं। कई लोगों की स्मेल-टेस्ट भी चली जाती है और महीने दो महीने तक नहीं आती है। ऐसे में घबराएं नहीं, इसे आने में कई लोगों में वक्त लगता है।' 

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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
वैक्सीन की मिक्स डोज को कैसे समझें, किस तरह की वैक्सीन की डोज दी जा रही हैं? 
  • डॉ. पद्मा श्रीवास्तव कहती हैं, 'अलग-अलग डोज यानी मिक्स वैक्सीन लगाने को लेकर जो शोध हो रहा है, उनमें एक डोज वेक्टर आधारित और दूसरी डोज एमआरएनए वैक्सीन की दी गई है। ऐसा फैसला कुछ देशों द्वारा तब लिया गया, जब कुछ लोगों को पहली डोज लेने के बाद रिएक्शन हुए। ऐसे में दूसरी डोज उन्हें दूसरी कंपनी की वैक्सीन की लगाई गई। इससे उन्हें कुछ रिएक्शन नहीं हुआ, तब इससे एंटीबॉडी कितने बनते हैं, कितने दिन तक एंटीबॉडी शरीर में मौजूद रहेंगे, आदि को लेकर ट्रायल किया जा रहा है। लेकिन अभी ये प्रयोग में नहीं है।' 
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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
वैक्सीन लगवाने से क्या हम पूरी तरह से सुरक्षित हैं? 
  • डॉ. पद्मा श्रीवास्तव कहती हैं, 'अभी हमारे देश में जो वैक्सीन लगाई जा रही है, उसकी दोनों डोज लगवानी है। इसके अलावा हमारे पास खुद के भी वैक्सीन रूपी हथियार हैं, जो हमें वायरस से बचाते हैं, वो हैं मास्क, हाथ साफ करना और सुरक्षित दूरी का पालन करना। वैक्सीन के साथ अगर इन तीनों का पालन करेंगे, तो आपके सुरक्षित रहने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।' 
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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air
जो वैक्सीन लगाई जा रही हैं, क्या वो नए वैरिएंट पर भी प्रभावी हैं? 
  • डॉ. पद्मा श्रीवास्तव कहती हैं, 'वायरस से संबंधित जो भी नई चीजें सामने आ रही हैं, उसपर कई शोध हो रहे हैं। जहां तक वैरिएंट पर प्रभावी की बात है, अभी तक यह साबित हुआ है कि वैक्सीन गंभीरता को कम करती हैं। अब नए वैरिएंट पर कितना काम करती हैं, इसे लेकर भी अभी रिसर्च हो रहा है। लेकिन हमें इस चक्कर में नहीं पड़ना है, बल्कि वैक्सीन की दोनों डोज लगवानी है। इससे कहीं न कहीं बीमारी की गंभीरता कम होती है।' 
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