लक्ष्मी कुमारी
समस्याएं सबकी जिंदगी में आती हैं। कभी छोटी तो कभी बड़ी। लेकिन कई बार एक समस्या खत्म होने के बाद हम दूसरी समस्या में उलझ जाते हैं। हमारा मन समस्याओं में रमता है। लेकिन ऐसे में हमारी खुशियां अक्सर हमसे दूर चली जाती हैं।
रीना के पास अच्छा घर है, नौकरी-पैसा है और सेहत भी ठीक है, लेकिन एक समस्या है। रीना का पति के साथ विदेश घूमने का मुहूर्त नहीं निकल रहा! उधर, मिसेज मालती की तो एक नहीं, कई-कई समस्याएं हैं। एक सुलझती है तो दूसरी आ जाती है। मसलन, बेटे का मनपसंद स्कूल में एडमिशन हो गया, लेकिन सेक्शन ठीक नहीं मिला। पांच साल में ही होम लोन उतार दिया, लेकिन खुश नहीं हैं। अब पति पहले की तरह बाहर खिलाने-पिलाने नहीं ले जाते। आप सोचेंगी कि भला ये भी कोई समस्याएं हैं? तो आपके लिए न सही, बहुत-सी महिलाओं के लिए ये गंभीर समस्याएं हैं।
क्या आपको नहीं लगता कि ये समस्याएं, दरअसल समस्या नहीं, दिमाग पर लदा बोझ है, जिसे आप बढ़ाती जाती हैं। जो आपकी समस्या थी, वह सुलझ गई। आपको खुश होना चाहिए, लेकिन आपने एक दूसरी समस्या दिमाग में बिठा ली। जो खुशियां हासिल हुईं, उन्हें आपने नई-नई समस्याओं से रिप्लेस कर दिया।
‘ये सब तो ठीक है, लेकिन यह भी होता तो और अच्छा होता!’ जैसे वाक्य आप आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में किसी न किसी से अवश्य सुनती होंगी। दरअसल, यह संतोष, सब्र का मामला है। असंतोष ने समाज और दुनिया में अजीब-सी बेचैनी पैदा कर दी है। यह बेचैनी उन्हें भी हो जाती है, जो संतोषी हैं। ‘जो है, पर्याप्त है’ की सोच वालों के आस-पास भी यदि असंतोषी होते हैं तो वे भी अनजाने में इसका शिकार होने लगते हैं। सब कुछ होने के बाद भी रोते रहने की आदत एक मानसिक बीमारी है, जो पूरे परिवार और आस-पास के परिवेश को शिकंजे में ले लेती है। जो आपके पास है, साथ है, जाने-अनजाने वह कम लगने लगता है और धीरे-धीरे खुशियां आपसे दूर होती चली जाती हैं।