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Stop Creating Problems: क्या आप समस्याएं खोजते हैं? जानिए अपने लिए परेशानियां पैदा करना कैसे रोकें

Tue, 27 Feb 2024 03:16 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

‘ये सब तो ठीक है, लेकिन यह भी होता तो और अच्छा होता!’ जैसे वाक्य आप आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में किसी न किसी से अवश्य सुनती होंगी। दरअसल, यह संतोष, सब्र का मामला है। असंतोष ने समाज और दुनिया में अजीब-सी बेचैनी पैदा कर दी है। यह बेचैनी उन्हें भी हो जाती है, जो संतोषी हैं। ‘जो है, पर्याप्त है’ की सोच वालों के आस-पास भी यदि असंतोषी होते हैं तो वे भी अनजाने में इसका शिकार होने लगते हैं।
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समस्याएं खुद खोजते हैं? - फोटो : istock
लक्ष्मी कुमारी

समस्याएं सबकी जिंदगी में आती हैं। कभी छोटी तो कभी बड़ी। लेकिन कई बार एक समस्या खत्म होने के बाद हम दूसरी समस्या में उलझ जाते हैं। हमारा मन समस्याओं में रमता है। लेकिन ऐसे में हमारी खुशियां अक्सर हमसे दूर चली जाती हैं।

रीना के पास अच्छा घर है, नौकरी-पैसा है और सेहत भी ठीक है, लेकिन एक समस्या है। रीना का पति के साथ विदेश घूमने का मुहूर्त नहीं निकल रहा! उधर, मिसेज मालती की तो एक नहीं, कई-कई समस्याएं हैं। एक सुलझती है तो दूसरी आ जाती है। मसलन, बेटे का मनपसंद स्कूल में एडमिशन हो गया, लेकिन सेक्शन ठीक नहीं मिला। पांच साल में ही होम लोन उतार दिया, लेकिन खुश नहीं हैं। अब पति पहले की तरह बाहर खिलाने-पिलाने नहीं ले जाते। आप सोचेंगी कि भला ये भी कोई समस्याएं हैं? तो आपके लिए न सही, बहुत-सी महिलाओं के लिए ये गंभीर समस्याएं हैं।

क्या आपको नहीं लगता कि ये समस्याएं, दरअसल समस्या नहीं, दिमाग पर लदा बोझ है, जिसे आप बढ़ाती जाती हैं। जो आपकी समस्या थी, वह सुलझ गई। आपको खुश होना चाहिए, लेकिन आपने एक दूसरी समस्या दिमाग में बिठा ली। जो खुशियां हासिल हुईं, उन्हें आपने नई-नई समस्याओं से रिप्लेस कर दिया।

‘ये सब तो ठीक है, लेकिन यह भी होता तो और अच्छा होता!’ जैसे वाक्य आप आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों में किसी न किसी से अवश्य सुनती होंगी। दरअसल, यह संतोष, सब्र का मामला है। असंतोष ने समाज और दुनिया में अजीब-सी बेचैनी पैदा कर दी है। यह बेचैनी उन्हें भी हो जाती है, जो संतोषी हैं। ‘जो है, पर्याप्त है’ की सोच वालों के आस-पास भी यदि असंतोषी होते हैं तो वे भी अनजाने में इसका शिकार होने लगते हैं। सब कुछ होने के बाद भी रोते रहने की आदत एक मानसिक बीमारी है, जो पूरे परिवार और आस-पास के परिवेश को शिकंजे में ले लेती है। जो आपके पास है, साथ है, जाने-अनजाने वह कम लगने लगता है और धीरे-धीरे खुशियां आपसे दूर होती चली जाती हैं।
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सब्र रखें - फोटो : istock
सब्र की सीमा

संतोष सबसे बड़ा धन है। गौतम बुद्ध के इस विचार से लाखों-करोड़ों मनुष्य जीवन में तमाम अभावों, कमियों, कमजोरियों और असफलताओं से लड़ने की शक्ति पाते हैं। जो है, वही काफी है। जिसमें यह भावना जग गई, जिसने संतोष कर लिया, वही सबसे बड़ा धनवान है। लेकिन उनका क्या, जो असंतोषी हैं! जिनके पास सब-कुछ है, फिर भी दिन-रात ‘यह नहीं, वह नहीं’ के चक्कर में पड़े रहते हैं।

मिसेज दत्ता जब भी मिलती हैं, उनके पास बताने के लिए एक उपलब्धि होती है। यह उपलब्धि मनपसंद साड़ी, डायमंड की रिंग या फिर जन्मदिन पर पति का दिया आईफोन हो सकती है। लेकिन खुश होते-होते वह मायूस होकर कहने लगती हैं कि बच्चे का एडमिशन उस स्कूल में हो जाता तो बड़ी खुशी होती या फिर वह इस बात से दुखी हो जाती हैं कि एक और बड़े फ्लैट के लिए पैसे कम पड़ रहे हैं, इसलिए पुराने प्लॉट को बेचना पड़ेगा। असंतोष का राइडर उनके साथ हमेशा रहता है। वह अकेली नहीं हैं। असंतोष हम और आप में भी होता है, फिर चाहे किसी रूप में हो, लेकिन उसकी एक सीमा होती है, जिसे सब्र की सीमा कह सकते हैं।

किसी मोड़ पर आकर तो आपको संतोष करना पड़ेगा और जो नहीं कर पाते, वे सब-कुछ होते हुए भी जीवन भर दुखी रहते हैं। जो है, उसका भी आनंद नहीं उठा पाते। आखिर ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता’, मगर वे लोग जमीं को आसमां से मिलने की होड़ में कहीं के नहीं रहते।
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मन पर काबू - फोटो : Istock
मन पर काबू

देखा जाए तो यह एक बीमारी है, जो सर्वव्यापी और सर्वकालिक है। यह आधुनिक समय में ही नहीं, हमेशा रही है। इसका विश्लेषण करें तो कोई समाजशास्त्री इसे सामाजिक बीमारी कहेगा तो मनोवैज्ञानिक मानसिक बीमारी। कोई इसकी चपेट में अपने आस-पास के माहौल से आ जाता है तो किसी में परिवार की देन होती है, तो कोई जन्मजात भी हो सकता है। लेकिन एक बात तय है कि यह एक बीमारी है और भयंकर बीमारी है, जो दवाओं से नहीं ठीक होती।

अपनी सोच-समझ को विकसित करने और अपने मन पर काबू रखने से ही इससे बचा जा सकता है। कहीं न कहीं हम सभी, सब कुछ मिलने के बाद भी जीवन में आभार प्रकट करना बंद कर देते हैं। जहां पहले छोटी-छोटी चीजों पर खुशियां मनाते थे, अब हम ऐसा नहीं करते, बल्कि उन्हें छोटी बात मानकर छोड़ देते हैं, फिर चाहे वह अपनों के लिए समय देना हो या खुद को समय देकर रिफ्रेश करना हो। अपनी खुशियों को छुपाना, दूसरों के साथ शेयर न करना, अपने में ही सिमटकर रहना और फिर यह कहना कि हमारी तो किसी को जरूरत ही नहीं है और फिर इसे अपने मन में बिठा लेना भी एक तरह से असंतोष ही माना जाएगा।

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तुलना से बचें - फोटो : Istock
एक-दूसरे से तुलना

आज के दौर में असंतोष इतना बढ़ गया है कि हमने सकारात्मक सोच को ही पीछे छोड़ दिया है। इसके कारण हम कुछ भी सही नहीं देख पाते। हमें अपनी जिंदगी को अपने हिसाब से तय करना चाहिए। सोशल मीडिया के आने के बाद अधिकतर लोग उन सभी बातों की कॉपी करना चाहते हैं, जिनसे उनका भले ही कोई वास्ता न हो। नए गैजेट, फैशन, लाइफस्टाइल या फिर किसी की बड़ी सफलता या उपलब्धि को देखकर हम भी तुलना करने लगते हैं और उसी तरह की सफलता हासिल करने की सोचने लगते हैं, लेकिन जब ऐसा नहीं होता तो हमारा सब्र टूट जाता है, जबकि सबकी सफलता एक जैसी नहीं हो सकती। इसके कारण हम परेशान होने लगते हैं।

जो तुलना नहीं करते, वे सुखी रहते हैं। हमें उन जैसा ही बनना है। आज दुख का सबसे बड़ा कारण एक-दूसरे से तुलना करना माना जाता है, जिसकी वजह से हम कहीं न कहीं बेवजह परेशान रहने लगते हैं। यहां तक कि अगर विश्वास की बात करें तो वह भी हम एक-दूसरे पर नहीं कर पाते हैं, जिसके कारण हम सभी परेशान और तनाव में रहते हैं। पहले हमारा आस-पड़ोस बहुत महत्व रखता था, लेकिन आज हमारे पास न तो वह पड़ोस है और न ही वे संयुक्त परिवार हैं। अगर हमको किसी भी तरह की जरूरत होती थी तो हमारे पास कोई न कोई हमेशा उपलब्ध रहता था। कहने का मतलब यह कि जब हमें अपने आस-पास वाले तनाव में देखते थे तो सही सलाह मिल जाती थी, जिसकी वजह से हम तनावमुक्त रहते थे।
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कुछ पल ठहरकर - फोटो : Istock
कुछ पल ठहरकर

सबसे बड़ी खुशी तो हमें अपने जैसा बने रहने में ही मिलती है। कहते हैं न कि अपना ‘ट्रू सेल्फ’ हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए। तुलना हमें मन से कमजोर बनाती है, जिससे हमें बचना चाहिए। नाखुश रहने का एक कारण यह भी है। चीजों को लेकर हमें स्वीकार्यता रखनी चाहिए। ‘जो है, वह क्या कम है’ की भावना होनी चाहिए। जितना हमें मिलता जाता है, हम उससे अधिक पाने की सोच का शिकार हो जाते हैं।

अधिक पाने की चाहत बुरी नहीं, लेकिन जो है, उसकी खुशियां तो मना लें। लोग मान बैठते हैं कि जो हम सोच रहे हैं, वही सही है। खुद का खुद के साथ हर समय कठोर बने रहना सही नहीं है। यह जब आदत बन जाती है तो सुख-चैन छीन लेती है। इतनी मेहनत के बाद जो कुछ हासिल किया, उसे खुद के लिए, अपनों के साथ महसूस कर सकें, हम ऐसा नहीं करते, बल्कि उसे छोड़ आगे भागना शुरू कर देते हैं। अगर कोई पूछे क्यों तो किसी को नहीं पता। इसलिए कभी-कभी जिंदगी में कुछ पल ठहर कर उन लम्हों को महसूस करना चाहिए। जीवन में जो अच्छा हो रहा है, उसका जश्न मनाना चाहिए।
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सोच को सकारात्मक रखें - फोटो : istock
सोच को सकारात्मक रखें

वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज, दिल्ली, मनोरोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. अभिलाषा यादव के मुताबिक, कहते हैं कि मन की स्थिति बदले तो हलात बदलें। कुछ लोग जिंदगी में सभी कुछ जैसे अच्छा स्वास्थ्य, धन-दौलत, रिश्ते-नाते, समाज में अच्छी पैठ, स्थायी नौकरी वगैरह होने के बावजूद हर वक्त शिकायत करते नजर आते हैं। कभी ऊपर वाले से, कभी घर वालों से और कभी अपने कार्य स्थल पर लोगों से। ऐसे लोगों में कृतज्ञता की कमी होती है। वह आभार जताना भूल जाते हैं उस परमपिता परमेश्वर का, जिसने उन पर इतनी नेमत बख्शी है। इस तरह के लोगों में संतोष की कमी होती है।

जहां संतोष नहीं, वहां सुख का अनुभव होना मुश्किल है। दूसरा कारण दुखी रहने का यह है कि लोग लालच-लालसा से ग्रसित होते हैं। थोड़ा और, थोड़ा और, जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें ‘थोड़ा और’ की चाह होती है। यही ‘थोड़ा और’ मिलना उनके सुखी रहने की शर्त होती है। संक्षेप में, मैं यही कहना चाहूंगी कि सुख या दुख अनुभव करना यह आपकी सोच, आपकी मानसिक अवस्था पर निर्भर करता है। आप अपनी सोच को सकारात्मक, आशावादी रखें। यह सोचें कि आज अभी इस पल में हम लाखों-करोड़ों लोगों से बहुत बेहतर स्थिति में हैं और अगर तुलना करनी ही है तो अपनी तुलना अपने से कम पाने वाले लोगों से करें। यकीन मानें, आप स्वयं को बहुत सुखी पाएंगी।
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असली खुशी भौतिक चीजों में नहीं - फोटो : istock
असली खुशी भौतिक चीजों में नहीं

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट और फैमिली रिलेशनशिप काउंसलर शिल्पी शर्मा बताती हैं, आपकी नजर में खुशी की परिभाषा क्या है? मैं तभी खुश रहूंगी, जब मेरी दोस्त ऐसी होगी, मेरे पास अगर ऐसी गाड़ी होगी, मनपसंद घर होगा, नौकरी होगी। आप बहुत सारी मटेरियलिस्टिक चीजों को अपने आस-पास रखकर एक खुशी की परिभाषा दे देती हैं और जब वे मिल जाती हैं तो आप खुश और संतुष्ट हो जाती हैं।

जाने-अनजाने आप जीवन को मटेरियलिस्टिक चीजों पर ज्यादा प्रोजेक्ट करती हैं।आपकी आधी जिंदगी तो इसी में निकल जाती है, एक ही तरह से सोचते-सोचते। जब ये अचीवमेंट कुछ दिन बाद खत्म हो जाते हैं, उसके बाद जिंदगी फिर वहीं। अब आगे क्या? बड़े घर में शादी हो गई, मनपसंद लड़का भी मिल गया, लेकिन हमने वहां काम नहीं किया, जहां असली खुशी है। हमें संबंधों पर काम करना चाहिए था, मटेरियलिस्टिक चीजों पर नहीं।

सोशल मीडिया ने एक हाइप और दे दी है कि यह तो आपने कर लिया। इससे ज्यादा यह करके देख लो। चाहे वह शादी हो या उत्सव हो, कोई अहसास ही नहीं रहा है। अब हर चीज का अहसास खत्म हो गया है। आपको लगता है कि असली खुशी सिर्फ स्टेटस मेंटेन करने से आती है, लेकिन इन से असली खुशी नहीं आती। इसीलिए लोग सब कुछ हासिल होने के बाद भी दुखी रहते हैं। सब कुछ होने के बाद भी आप उसे फील नहीं करती हैं, क्योंकि आप क्लियर ही नहीं हैं कि आपको जीवन में क्या चाहिए।
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