देश शुक्रवार को 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध की 51वीं वर्षगांठ विजय दिवस के रूप में मना रहा है। यह युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का विश्व का ऐसा युद्ध था, जो कई बातों के लिए मिलिट्री इतिहास में अपनी अलग पहचान रखता है।
देश शुक्रवार को 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध की 51वीं वर्षगांठ विजय दिवस के रूप में मना रहा है। यह युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का विश्व का ऐसा युद्ध था, जो कई बातों के लिए मिलिट्री इतिहास में अपनी अलग पहचान रखता है। यह अनोखा युद्ध भी माना जाता है। इस युद्ध में हमारे जांबाजों के पराक्रम का दुश्मन ने भी लोहा माना है। इस युद्ध के कई हीरो में एक हैं सूबेदार दुर्गा दास (से.नि.)। पिछले युद्ध की यादें और भविष्य को लेकर उनसे हुई विस्तृत चर्चा के अंश यहां प्रस्तुत हैं।
सूबेदार दुर्गा दास (से.नि.) ने बताया कि 1971 के युद्ध के समय चुनौतियां काफी कड़ी थीं। संसाधन कम थे। उस वक्त सूचनाओं का आदान प्रदान देरी से होता था। ड्रेस नार्मल थी, उसमें जवान अकड़ जाते थे। जवानों के पैर में बर्फ लग जाती थी। यानी युद्ध के साथ मौसम की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता था। खाने-पीने का सामान भी मुश्किल से पहुंचता था। कई बार तो ऊपर से राशन गिराया जाता, तो किसी नाले में जा गिरता था। राशन का स्टॉक भी तीन महीने का होता था। हमने वह जंग अपने हौसलों से जीती थी।
विज्ञापन
2 of 6
Vijay Diwas
- फोटो : सेना
1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस युद्ध के कई कारण थे। इनमें प्रमुख कारण था तत्कालीन पाकिस्तान की फौज द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली लोगों पर बर्बरता व अत्याचार करना, जो 1971 में चरम सीमा तक पहुंच चुके थे। 1970 में पूर्वी पाकिस्तान के चुनाव के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो ने शेख मुजीब-उर रहमान के नेतृत्व को स्वीकार न करना भी युद्ध का प्रमुख कारण रहा था। मुक्ति वाहिनी ने भारत से पूर्वी पाकिस्तान को आजाद करवाने के लिए सहायता मांगी थी, भारत सरकार ने सहायता की। जब भारत पर ये युद्ध पाकिस्तान द्वारा 3 दिसंबर को थोपा गया, तो भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया।
विज्ञापन
3 of 6
vijay diwas
- फोटो : अमर उजाला
पूर्वी हिस्से के बंगालियों के साथ किया भेदभाव
बहुत से लोगों का मत है कि 1971 के युद्ध का मुख्य कारण था पाकिस्तान की उस समय की सरकारों की विफलता, जिसने अपने पूर्वी हिस्से के बंगालियों के प्रति भेदभाव और अलगाववाद को बढ़ावा दिया। दरअसल पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली बहुमत में थे। 1947 के दौरान पूर्वी पाकिस्तान ही ऐसा क्षेत्र था, जहां पाकिस्तान की मुस्लिम लीग सत्ता में थी। पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली मुख्य वर्ग पश्चिम पाकिस्तान की तुलना में लोकतांत्रिक राजनीति में कहीं अधिक सक्रिय था।
1958 में सैन्य शासन आने के बाद पूर्वी पाकिस्तान में अलगाववाद का दौर शुरू हुआ। युद्ध शुरू होने से पहले ही 8 से 10 लाख पाकिस्तानी रिफ्यूजी भारत में शरण ले चुके थे और भी आ रहे थे। भारत की भूमिका सिर्फ इतनी थी कि उसने बंगालियों की सहायता की या कह सकते हैं कि भारत ने बंगलादेश को स्वतंत्र देश बनने में सहायता की।
4 of 6
Vijay Diwas
- फोटो : सेना
न ऐसा युद्ध हुआ न कभी होने की उम्मीद
ये युद्ध सिर्फ 13 दिन चला था और असल में युद्ध की पहल भी पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 की शाम को भारत के 11 सैन्य हवाई अड्डों पर अचानक हमला कर की थी। आज के दिन इस युद्ध में भारत ने अभूतपूर्व विजय पाई, पश्चिमी पाकिस्तान का 15010 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रफल भी जीता था। युद्ध का परिणाम था बंगला देश अस्तित्व में आया। इस युद्ध में भारत ने 93000 पाकिस्तानी सैनिक युद्ध बंदी बनाए जो एक अभूतपूर्व उपलब्धि थी। युद्ध शुरू होने के कुछ दिन बाद पाकिस्तान ने हार सामने देख अपना पश्चिमी मोर्चा गुजरात, राजस्थान, पंजाब व जम्मू-कश्मीर में खोल दिया, लेकिन वहां भी उसे मुंह की खानी पड़ी।
तब हमारे सामने थीं 3 बड़ी चुनौतियां
अमेरिका पाकिस्तान का बहुत अच्छा और ताकतवर मित्र देश था और भारत को यकीन था कि अमेरिका जरूर पाकिस्तान की युद्ध जीतने में सहायता करेगा और उसने सहायता की भी। दूसरी चुनौती थी पूरे पश्चिमी पाकिस्तान के बॉर्डर पर फौज की तैनाती और अंतिम चुनौती थी समुद्री रास्ते से पाकिस्तान को रोकना। इन सभी चुनौतियों का राजनीतिक, रणनीतिक व सामरिक तौर पर तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने जनरल सैम मानेक शॉ की अगुवाई में बड़ी सूझबूझ से किया।
विज्ञापन
5 of 6
Vijay Diwas
- फोटो : सेना
सुनहरा अवसर जिसे हमने गंवा दिया
जून 1972 की शिमला संधि के अनुसार भारत ने अधिकतर पश्चिमी पाकिस्तान का एरिया (15000 वर्ग किलोमीटर ) वापस कर दिया, जो युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान से जीता था, हालांकि भारत ने कुछ रणनीतिक लद्दाख के क्षेत्र (तुर्तुक, थांग, त्याक्षी और चोरबत घाटी के चुलुंका सहित) को अपने पास ही रखा जो 804 वर्ग किमी का था। पाकिस्तान ने भारत का पश्चिमी पाकिस्तान से जुड़ता जीता हुआ एरिया नहीं लौटाया न ही हमें हमारे युद्ध बंदी लौटाए, जबकि हमने उनके सभी युद्ध बंदी लौटा दिए थे। हमने संधि की मेज पर कश्मीर मसले पर हमने कोई बात नहीं की, हालांकि ये एक सुनहरा अवसर था, जो हमने गंवा दिया।
... और अलग-थलग पड़ गया पाकिस्तान
इस युद्ध की हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि थी पाकिस्तान विश्व स्तर पर राजनीतिक स्तर पर अलग-थलग पड़ गया। वह अपने ही देश में शर्मसार हुआ। उधर, इस युद्ध के बाद एशिया में भारत की पैंठ मजबूत हुई। -मेजर उमाकांत शर्मा (से.नि.)।
युद्ध से पहले दरबार में मानेक शॉ ने कहीं तीन बातें
तब हम 11 डोगरा रेजिमेंट में थे। 3 दिसंबर को फील्ड मार्शल जनरल मानेक शॉ आए। हमें खुले मैदान में बैठा दिया गया। पीटी के बाद पूरे ब्रिगेड का दरबार था। यह राजस्थान में गंगानगर की बात है। चार दिसंबर को युद्ध शुरू होने से पहले उन्होंने दो-तीन बातें कहीं। इसमें एक था कि अगर कोई कीमती सामान मिले तो उसे राख समझना। दूसरा यह कि दुश्मन से युद्ध के दौरान उस क्षेत्र की महिला को मां एवं बहन के समान समझना। इसके बाद उन्होंने कहा कि आपके साथ हम दूसरी चाय लाहौर में पीयेंगे। - सूबेदार मेजर बान सिंह (से.नि.)।
चांदपुरी ने दुश्मन को पूरी रात रोके रखा खाड़ी में
राजस्थान के जैसलमेर स्थित लोंगेवाला में टैंकों का अद्वितीय युद्ध हुआ था। तब कुलदीप सिंह चांदपुरी 23 पंजाब रेजिमेंट में थे। उन्होंने और 120 सैनिकों की उनकी कंपनी ने 22 वीं आर्मर्ड रेजिमेंट द्वारा समर्थित, पाकिस्तान की 51 वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड की 2000-3000 सैनिकों के आक्रमण के बावजूद पोस्ट का बचाव किया। चांदपुरी और उनकी कंपनी ने पूरी रात पाकिस्तानियों को खाड़ी में घेरे रखा। इसके बाद भारतीय वायु सेना सुबह हवाई सहायता प्रदान करने के लिए पहुंची। लोंगेवाला का युद्ध तीन दिन तक चला था। इस दौरान दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया और बारह टैंकों को छोड़ते हुए उन्हें हटने पर मजबूर कर दिया। इस पराक्रम के लिए चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। वह ब्रिगेडियर के पद से सेवानिवृत्त हुए।
सियाल गांव उधमपुर की रहने वाली वीर नारी विष्णो देवी पत्नी बलिदानी सिपाही राइफलमैन गौरी के अनुसार राइफलमैन गौरी 1 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के 1971 के युद्ध में सिपाही थे। उन्होंने कहा कि उनके पति बंगला देश के चिटागांग फ्रंट पर 4 दिसंबर 1971 से तैनात थे। 16 दिसंबर की सुबह लगभग 5 बजे उनके कंपनी कमांडर गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिन्हें कंधे पर उठाकर राइफल मैन गौरी अपने बंकर की ओर ले जा रहे थे, तभी पीछे से गोलियों की बौछार हुई और वे शहीद हो गए। मेजर साहब भी बाद में चल बसे। देश के लिए उनकी शहादत गौरवान्वित करती है।