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जम्मू-कश्मीर: पारंपरिक फसलें छोड़ कर लैवेंडर की खेती से जुड़ रहे हैं किसान, जानिए वजह

Fri, 18 Jun 2021 05:05 PM IST
करिश्मा चिब न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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लैवेंडर की खेती - फोटो : .

लैवेंडर की खेती प्रदेश के छोटे और सीमांत किसानों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही है। वर्षों से चली आ रही पारंपरिक मक्के और गेहूं की खेती को छोड़ कर अब किसान बड़े पैमाने पर लैवेंडर की खेती कर रहे हैं। चिनाब वैली के डोडा और किश्तवाड़ जिलों में दस हजार से अधिक परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लैवेंडर की खेती से जुड़े हैं। इनमें ऐसे भी किसान हैं, जो लैवेंडर की खेती के साथ-साथ लैवेंडर की नर्सरी लगा रहे हैं, ताकि क्षेत्रों के लोगों को आसानी से पौधे उपलब्ध हो सकें। सीएसआईआर-आईआईआईएम जम्मू ने अगले तीन वर्षों में प्रदेश में नौ हजार हेक्टेयर भूमि पर लैवेंडर की खेती को बढ़ावा देने के लिए अरोमा मिशन फेज-2 की शुरुआत की है। पिछले वर्ष लैवेंडर की खेती से जुड़े विंकल कुमार ने बीटेक की है। डोडा और किश्तवाड़ जिलों में 10 हजार से ज्यादा किसान इससे जुड़े हुए हैं।

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लैवेंडर का तेल - फोटो : Pixabay
कोविड के कारण पिछले वर्ष गोवा में अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी थी। इसके बाद उन्होंने लैवेंडर के पौधे लगाए।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
पौधे लगाने के साथ-साथ उन्होंने नर्सरी भी लगाई और वह इससे अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। सेना से सेवानिवृत्त मनसा राम ने भी पिछले वर्ष लैवेंडर की खेती शुरू की है।

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उन्होंने कहा कि पारंपरिक खेती की तुलना में लैवेंडर की खेती काफी फायदेमंद है। हम मक्की की खेती ही करते हैं, इसमें काफी श्रम बल की जरूरत होती है और मुनाफ भी कम होता है।
 
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किसान - फोटो : पिक्साबे
लैवेंडर की खेती में शुरुआती एक वर्ष में अधिक ध्यान देने की जरूरत होती है, उसके बाद इसका लाभ मिलना शुरू हो जाता है।

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