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आतंकियों ने दोहराई तारीख: बीते साल नौ अगस्त को अब्दुल की तरह आज रसूल को मार डाला, पढ़ें नेताओं पर कब-कब हुए हमले

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आतंकी हमलों में जान गंवाने वाले भाजपा नेता - फोटो : अमर उजाला
जम्मू-कश्मीर में जम्हूरियत की मजबूती से आतंकी संगठन बौखलाए और हताश हैं। इसी के चलते आतंकी तंजीमें जन्नत को जहन्नुम बनाने की साजिशें रच रही हैं। लोगों में खौफ उत्पन्न करने के लिए आतंकी संगठन नेताओं को निशाना बना रहे हैं। आतंकियों की यही हताशा और कायरता सोमवार को अनंतनाग जिले में देखने को मिली। घात लगाकर आतंकियों ने भाजपा सरपंच गुलाम रसूल डार और उनकी पत्नी की हत्या कर दी। बीते साल इसी तारीख को आतंकियों ने बडगाम में भाजपा जिलाध्यक्ष पर हमला किया था। आतंकियों ने इस हमले वो उस वक्त अंजाम दिया जब अब्दुल सुबह सैर पर निकले थे। आतंकियों की फायरिंग का शिकार हुए अब्दुल ने उपचार के दौरान अस्पताल में दम तोड़ दिया था।

अब्दुल की हत्या के तीन दिन पहले कुलगाम जिले में आतंकियों ने भाजपा से जुड़े सरपंच सज्जाद खांडे की हत्या कर दी थी। इससे पहले चार अगस्त को कुलगाम में पंच पीर आरिफ अहमद शाह को गोली मार दी गई थी।

अगली स्लाइड में पढ़ें- आतंकियों ने घाटी में नेताओं को कब-कब बनाया निशाना
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सरपंच अजय पंडिता की हत्या, फाइल फोटो - फोटो : सोशल मीडिया
वहीं जुलाई महीने में भाजपा के बांदीपोरा जिलाध्यक्ष वसीम बारी और उनके दो परिजनों की हत्या कर दी गई थी। 15 जुलाई को सोपोर में भाजपा नेता मेहराजुद्दीन मल्ला को अगवा किया गया था, हालांकि इन्हें दस घंटे में ही मुक्त करा लिया गया था। इस घटना के करीब एक माह पूर्व आठ जून को अनंतनाग में कांग्रेस नेता और सरपंच अजय पंडिता की हत्या कर दी गई थी।

 
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कश्मीर - फोटो : अमर उजाला
इतना ही नहीं घाटी में भाजपा के मुख्य प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर भी आतंकियों के निशाने पर हैं। अल्ताफ ठाकुर ने वर्ष 2002 से भाजपा की पकड़ घाटी में मजबूत बनाई हुई है। अल्ताफ आतंकियों के गढ़ त्राल से संबंध रखते हैं लेकिन उसके बावजूद भी उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना तिरंगे की शान को बरकरार रखा है।

 

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कश्मीर - फोटो : अमर उजाला
गौरतलब है कि घाटी में जम्हूरियत की मजबूती में जुटे नेताओं, कार्यकर्ताओं से लेकर पंचायती नुमाइंदों पर पहले भी आतंकी हमले होते रहे हैं। वर्ष 1990 से 2009 तक 587 सियासी लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
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आतंकवाद - फोटो : अमर उजाला
सर्वाधिक राजनीतिक हत्याएं चुनावी वर्ष 2002 में हुई थीं। इसके अलावा चुनावी वर्ष 1996 में 75, 1998 में 45, 1999 में 53 और 2004 में 60 राजनीतिक हत्याएं हुईं।
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