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संघर्ष का सिला: बेटियों ने आखिर जीत ली सेना में स्थायी कमीशन की जंग

Fri, 24 Jul 2020 05:32 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

  • सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में सुनाया था फैसला
  • महिलाओं के हक के खिलाफ खड़ी रहीं सरकारें...लेकिन लंबे संघर्ष के बाद मिली सफलता
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भारतीय सेना की महिला अधिकारी - फोटो : PTI
सेना के दस विभागों में महिलाओं के स्थायी कमीशन के आदेश जारी होने के साथ ही बेटियों ने हक और समानता की एक बड़ी जंग जीत ली है। देश की सर्वोच्च अदालत ने महिलाओं के स्थायी कमीशन के पक्ष में फैसला  2011 में ही सुना दिया था, पर सरकारें उनके कमजोर होने की दलीलें देती रहीं। 

सेना में महिलाओं को बराबरी का हक न देने के लिए सरकार ने तो यह तक कह दिया था कि पुरुष अफसर महिलाओं की बात नहीं सुनेंगे। लंबी लड़ाई के बाद जीत महिलाओं की हुई है और वे अब पुरुषों के बराबर सेना में कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगी और कमान पोस्ट भी संभालेंगी। 17 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का फैसला सुनाया था। केंद्र सरकार ने आखिरकार बृहस्पतिवार को इसे लागू करने का आदेश जारी कर दिया।
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Women in Indian Army
हाईकोर्ट पहुंची बराबरी की लड़ाई
सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन और बराबरी की लड़ाई जनहित याचिका के जरिये 2003 में दिल्ली हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंची। इसके बाद मेजर लीना गुराव ने 16 अक्तूबर 2006 को याचिका दायर कर महिलाओं को स्थायी कमीशन देने की मांग की। 

सितंबर 2008 में रक्षा मंत्रालय ने आदेश जारी किया कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) से आने वाली महिला अधिकारियों को जज एडवोकेट जनरल और सैन्य शिक्षा कोर में स्थायी नियुक्ति दी जाएगी। सरकार के इस फैसले को मेजर संध्या यादव ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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delhi high court
तीन याचिकाओं पर सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2003, 2006 और 2008 में दायर याचिकाओं पर सुनवाई की और 2010 में फैसला सुनाया। अदालत ने एसएससी के तहत भर्ती होने वाली महिलाओं को 14 वर्ष की सेवा पूरी करने पर पुरुषों की तरह स्थायी कमीशन देने को कहा। 

महिलाओं को सेवा से जुड़े दूसरे लाभ भी देने के आदेश भी दिए। हाईकोर्ट के फैसले को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। दो सितंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सही माना और उसे लागू करने का आदेश दिया।

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वायुसेना में महिलाएं - फोटो : Amar Ujala
जब अदालत ने कहा... महिलाओं के लिए ऐसा नजरिया मत रखिए
  • सरकार (सुप्रीम कोर्ट में) : सेना के ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां महिलाएं काम करने में सक्षम नहीं होगी।
  • सुप्रीम कोर्ट (फटकार लगाते हुए) : महिलाओं के लिए ऐसा नजरिया मत रखिए। आपके पक्ष में लिंगभेद की बू आ रही है और ऐसा करना महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करने के बराबर है। सेना में समानता के लिए नजरिया बदलना होगा। महिलाओं को सीमित क्षेत्र तक रखेंगे तो उनकी पदोन्नति पर असर पड़ेगा और संभव है कि वो कर्नल रैंक से आगे नहीं बढ़ पाएंगी। इसी को देखते हुए महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर कमान पोस्ट भी संभालने की जिम्मेदारी दें, जिससे वे अपने काम के दम पर उच्च पदों पर पहुंच सकें।
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supreme court - फोटो : ANI
मार्च 2019 में रक्षा मंत्रालय ने चला नया पैंतरा
मार्च 2019 में रक्षा मंत्रालय ने नया पैंतरा चला। रक्षा मंत्रालय ने आदेश जारी किया कि सेना के 10 विभागों में स्थायी कमीशन मिल सकता है, लेकिन ये भी कहा कि इसका लाभ उन्हें नहीं मिलेगा, जो महिलाएं पहले से सेवा में हैं। मार्च 2019 के बाद से जो महिलाएं सेना में आएंगी, उन्हें ही यह लाभ मिलेगा।

इस फैसले का सीधा असर उन महिलाओं पर पड़ा, जो बराबरी की लड़ाई लंबे समय से लड़ रही थीं। मामला दोबारा अदालत पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कहा कि वह समान नीति लेकर आए। इसके बाद 17 फरवरी 2020 को सेना में शामिल महिलाओं के लिए ऐतिहासिक फैसला आया।
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सेना में महिलओं को स्थायी कमीशन - फोटो : Amar Ujala
सुप्रीम कोर्ट ने कर दी थीं सारी दलीलें खारिज...कहा था-......
  • सरकार महिलाओं की शारीरिक क्षमताओं पर सवाल उठाती है। 70 साल बाद भी मानसिकता में बदलाव नहीं किया। सेना में सच्ची समानता लानी होगी।
  • 30% महिलाएं युद्धक्षेत्रों में हैं। स्थायी कमीशन से इनकार पुरातनपंथी है। महिलाएं बराबर हैं, पुरुषों की सहायक नहीं।
  • आजादी के 70 वर्ष बाद महिला अधिकारियों को लेकर दिए जा रहे तर्क लकीर के फकीर जैसे लगते हैं।
  • गर्भावस्था, मातृत्व, घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से सैन्य सेवा में ज्यादा चुनौतियां हैं। यह उस मानसिकता का उपजा तर्क है जो मानता है कि महिलाएं केवल घरेलू काम के लिए हैं।
  • सामाजिक व मानसिक कारण बता महिलाओं को अवसर से वंचित करने की कोशिश दिखती है। जबकि कैप्टन तान्या शेरगिल और कर्नल सोफिया कुरैशी ने देश का मान बढ़ाया है।
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Avani Chaturvedi - फोटो : Amar Ujala
भेदभाव नहीं झलके
महिलाओं को कमान में नियुक्ति न देना और केवल स्टाफ अपॉइंटमेंट तक सीमित रखना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। समानता के अधिकार में दो वर्गों के प्रति अतार्किक और गैर-वाजिब भेदभाव नहीं झलकना चाहिए। - जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ व जस्टिस अजय रस्तोगी, 17 फरवरी 2020

बढ़ते चले गए कामयाबी के कदम
  • 1990 की शुरुआत में शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) के जरिए 14 वर्ष के लिए सेना में महिलाओं का आना शुरू
  • 2011 में एसएससी से आने वाली महिलाओं को न्यायिक और शिक्षा से जुड़ी तीन सेवाओं में स्थायी कमीशन का आदेश
  • 15 अगस्त 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि महिलाएं स्थायी कमीशन के लिए गैर युद्ध सेवा क्षेत्र के लिए पात्र
  • 25 फरवरी 2019 में सरकार ने एसएससी से आने वाली महिला अधिकारियों को युद्ध में मदद करने वाले सिग्नल्स, इंजीनियर्स, आर्मी एविएशन, एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मेकेनिकल इंजीनियर्स, आर्मी सर्विस कोर, आर्मी ऑर्डिनेंस कोर और इंटैलिजेंस में स्थायी कमीशन का आदेश किया।
तीनों सेनाओं में स्थिति
  • थल सेना ; 3.89% महिलाएं हैं वर्तमान में
  • नौ सोना : 6.70% महिलाएं वर्तमान में
  • वायु सेना : 13.28% महिलाएं हैं वर्तमान में
(नोट: जून 2019 तक का आंकड़ा)
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Indian Navy - फोटो : Amar Ujala
1990 के बाद सेना में महिला शक्ति पर नजर
  • 1653: महिलाओं को थलसेना में आने का मौका मिला
  • 490 महिलाएं भारतीय  नौसेना में कार्यरत हैं
  • 1905 महिलाओं को वायुसेना में आने का अवसर मिला
  • 70%  सैन्यबल युद्धक्षेत्र से जुड़ा है जिसमें इन्फैंट्री, आर्टिलरी, आर्मर्ड कोर शामिल हैं
  • लेकिन इनमें महिलाएं नहीं हैं
  • 8 महिला फाइटर पायलटों की नियुक्ति हुई 2016 के बाद
  • 65,000 सैन्य अधिकारियों के पद हैं सैन्यबल में
आधी आबादी से ही नाइंसाफी
  • 40,825  कुल अधिकारी हैं भारतीय फौज में
  • 1653 महिला अधिकारी हैं
  • 157 को 54 साल के बाद पुनर्नियुक्ति
  • 77 की बीस साल से अधिक सेवा      
  • 255 को 14 से 20 साल सेवा
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