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कारगिल विजय दिवस के 21 साल: इन जवानों ने गोली लगने के बाद भी नहीं छोड़ी युद्धभूमि

Sun, 05 Jul 2020 04:10 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कारगिल विजय दिवस - फोटो : Indian Army Twitter
कारगिल के युद्ध को 21 साल हो चुके हैं लेकिन आज भी उस दिन को याद करके लोगों की आंखें नम हो जाती है। 26 जुलाई हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है क्योंकि इस दिन हमारे भारतीय सैनिकों ने कारगिल पर विजय हासिल कर वहां देश का झंडा लहराया था। 

लेकिन 26 जुलाई तो अभी दूर है, अभी हम क्यों कारगिल विजय दिवस की बात कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि कारगिर पर फतह हासिल करने से पहले टाइगर हिल पर भारतीय सैनिकों ने कब्जा किया था, जिसे ऑपरेशन विजय के तहत रखा गया था। चार जुलाई को ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने टाइगर हिल पर जीत हासिल की थी।

ढाई महीने तक चले इस युद्ध में देश ने अपने 527 से ज्यादा सपूतों को खोया था और 1,300 से ज्यादा वीर योद्धा घायल हो गए थे। हर साल 26 जुलाई के दिन मनाया जाने वाला विजय दिवस दरअसल ऑपरेशन विजय के सफल होने के बाद मनाया जाता है। चार जुलाई के बीच ही भारत ने टाइगर हिल फतह की थी। आइए जानते हैं कि ऑपरेशन विजय में किन वीर सपूतों ने अपना योगदान दिया था।
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ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव - फोटो : Indian Army Twitter
ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को 'घातक' कमांडो पलटन के नेतृत्व में टाइगर हिल के अतिमहत्वपूर्ण दुश्मन के तीन बंकरों पर कब्जा करने का दायित्व सौंपा गया था। 16,500 फीट की ऊंचाई जो कि बर्फ से ढकी थी और चट्टानों से घिरी थी। योगेंद्र सिंह यादव ने अपनी टीम का नेतृत्व करने का फैसला किया और सदस्यों के लिए चट्टानों पर रस्सी बांधने का काम किया। 

जैसे ही दुश्मनों ने देखा कि भारतीय टीम पहाड़ी की ऊपर चढ़ रही है उन्होंने वहां से गोलीबारी, ग्रेनेड और तोप चलानी शुरू कर दीं। जगह के गुरुत्वाकर्षण को देखते हुए योगेंद्र सिंह और उनकी टीम ने रेंगते हुए शांति से पहाड़ी पर चढ़ना शुरू किया लेकिन इस दौरान वो गोलियां लगने की वजह से घायल हो गए थे।

हालांकि योगेंद्र सिंह यादव चार दुश्मनों को मार गिराने में सफल हुए, लेकिन योगेंद्र यादव को 15 गोली लगी थी और उसके बाद भी उन्होंने युद्ध का मैदान ना छोड़ने के लिए कहा था। योगेंद्र सिंह यादव की वीरता की वजह से भारत टाइगर हिल कब्जाने में सफल रहा और इसके लिए योगेंद्र सिंह यादव को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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मेजर दीपक रामपाल - फोटो : Indian Army Twitter
चार जुलाई 1999 यानि ऑपरेशन विजय के दौरान 17 जेएटी की डेल्टा कंपनी को मेजर दीपक रामपाल के नेतृत्व में व्हैल-ब्लैक, प्वाइंट 4875 का एक हिस्सा को कब्जाने का काम दिया गया। व्हैल-ब्लैक एक ऐसी जगह हैं जहां से मश्कोह घाटी पर निगरानी रखी जा सकती है। यहां से दुश्मनों से तोपों के जरिए गोलीबारी की थी।

चार जुलाई 1999 को रात दस बजे दीपक रामपाल ने आगे आकर हमला करने की रणनीति बनाई। चार घंटे के लगातार युद्ध के बाद दीपक रामपाल की टीम ने दुश्मन के पांच जवानों को मार गिराया था। व्हैल ब्लैक के दूसरी तरफ दुश्मनों के 30-40 सैनिक तैनात थे और वो काउंटर अटैक करने की योजना बना रहे थे।

उसी दिन दुश्मनों की ओर से दो बार काउंटर अटैक किया गया लेकिन दीपक रामपाल ने दुश्मनों को खदेड़ डाला। इससे पिंपल कॉम्पलेक्स को कब्जाने में मदद मिली और पाकिस्तान के पांच जवान मारे गए। दीपक रामपाल के वीर कार्य के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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राइफलमैन संजय कुमार - फोटो : Indian Army Twitter
चार जुलाई 1999 को मश्कोह घाटी में प्वाइंट 4875 को जीतने के लिए राइफलमैन संजय कुमार ने नेतृत्व किया था। युद्ध के दौरान संजय कुमार ने तीन दुश्मनों को मार गिराया और गंभीर रूप से घायल हो गए। घायल होने के बाद भी संजय कुमार ने यूनिवर्सल मशीन गन की मदद से भाग रहे दुश्मनों पर गोली चलाई।

गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने युद्ध क्षेत्र से जाने के लिए मना कर दिया। संजय कुमार के इस रवैये इस बाकी के कॉमरेड्स को प्रेरणा मिली और इस तरह कारगिल पर विजय प्राप्त करने में सैनिकों को सफलता मिली। राइफल मैन संजय कुमार को इसके लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
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Captain Anuj Nayyar
कैप्टन अनुज नैय्यर जाट रेजिमेंट की 17वीं बटालियन में थे। सात जुलाई 1999 को वह टाइगर हिल पर दुश्मनों का दांत खट्टे करते हुए शहीद हुए। कैप्टन अनुज की वीरता को सरकार ने मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। 
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Lieutenant Keishing Clifford Nongrum
लेफ्टिनेंट शींग क्लिफोर्ड नोंग्रुम जम्मू कश्मीर लाइट इनफेंट्री की 12वीं बटालियन में थे। वह एक जुलाई 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए, लेफ्टिनेंट शींग क्लिफोर्ड नोंग्रुम उस समय शहीद हुए जब कारगिल युद्ध के दौरान प्वांइट 4812 को कब्जा कर रहे थे। नोंगुर्म को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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Captain Manoj Kumar Pandey
कैप्टन मनोज कुमार पांडे गोरखा राइफल्स के फर्स्ट बटालियन में थे। वह ऑपरेशन विजय के महानायक थे, उन्होंने 11 जून को बटालिक सेक्टर में दुश्मनों को खदेड़ा था। वहीं तीन जुलाई 1999 तो उनके ही नेतृत्व में सेना की टुकड़ी ने जॉबर टॉप और खालुबर टॉप पर सेना ने वापस कब्जा किया था। पांडेय ने अपनी चोटों की परवाह किए बिना तिरंगा लहराया और परम वीर चक्र से सम्मानित किए गए। 
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कारगिल शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा
कैप्टन विक्रम बतरा वही हैं जिन्होंने कारगिल के प्वांइट 4875 पर तिरंगा फहराते हुए कहा था यह दिल मांगे मोर। वह वीर गति को भी वहीं प्राप्त हुए। विक्रम बतरा 13वीं जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में थे। विक्रम बतरा तोलोलिंग पर पाकिस्तानियों द्वारा बनाए गए बंकर पर न केवल कब्जा किया बल्कि गोलियों की परवाह किए बिना ही अपने सैनिकों को बचाने के लिए सात जुलाई 1999 को पाकिस्तानी सैनिकों से सीधे भिड़ गए और तिरंगा फहरा कर ही दम लिया। सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र का सम्मान देकर सम्मानित किया। 
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