समाजवादी साइकिल को कांग्रेस का हाथ मिल गया है। यूपी चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को सफलता मिलेगी, यह फिलहाल कहा नहीं जा सकता है। लेकिन जो साइकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह बनी, और जिसके लिए हाल ही के दिनों में पार्टी के दो धड़ों के बीच भयंकर लड़ाई चली, आखिर उस साइकिल के पीछे कहानी क्या है? कैसे साइकिल समाजवादी विचारधारा की वाहनी बन गई? आगे की स्लाइड्स में पढ़ें पूरी दिलचस्प कहानी।
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समाजवादी साइकिल की दिलचस्प कहानी, कैसी बनी पार्टी का चिन्ह
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साल 1960, समाजवादी पार्टी का चेहरा और मुखिया मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के इटावा में जब कॉलेज की पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्हें रोजाना करीब 20 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था।
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मुलायम के घर की आर्थिक हालात इतनी ठीक नहीं थी कि वह एक साइकिल खरीद पाते। पैसों की कमी के चलते वह मन मसोस कर रह जाते थे और कॉलेज जाने के लिए संघर्ष करते थे।
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कहते हैं, जो चीज सच्चे मन से चाहो तो सारी कायनात उसे दिलाने में जुट जाती है, कुछ ऐसा ही उस दिन हुआ जब मुलायम सिंह अपने बचपन के दोस्त के साथ उस गांव में पहुंचे।
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आत्मकथा पर आधारित फ्रैंक हुजूर की किताब द सोशलिस्ट के मुताबिक मुलायम अपने बचपन के दोस्त रामरूप के साथ एक दिन किसी काम से उजयानी गांव पहुंचे।
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दोपहर का वक्त था, गांव की चौपाल में कुछ लोग ताश खेल रहे थे।
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मुलायम और रामरूप भी ताश के खेल में शामिल हो गए। वहीं, गांव गिंजा के आलू कारोबारी लाला रामप्रकाश गुप्ता भी ताश खेल रहे थे। गुप्ता जी ने खेल में शर्त रख दी कि जो भी जीतेगा उसे रॉबिनहुड साइकिल दी जाएगी।
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मुलायम के लिए गुप्ता की शर्त उनका सपना पूरा करने का जरिया बनी। मुलायम ने बाजी जीती और इसी के साथ रॉबिन हुड साइकिल भी। मुलायम साइकिल पर ऐसे सवार हुए कि जब 4 नवंबर 1992 को समाजवादी पार्टी बनी तो साइकिल उसका चुनाव चिन्ह बनाई गई।