75 साल की इस अमृत यात्रा में यह जानना जरूरी है कि नागरिकों के लिए रोटी-कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों के अलावा रक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल भुगतान, उद्योग व अन्य ऐसे क्षेत्रों में देश कहां खड़ा है, जिनके पैमाने पर दुनिया किसी देश की तरक्की को आंकती है। इन्हीं पैमानों पर हम देखेंगे कि विकसित भारत के लिए हमें कितने कदम और तय करने हैं। हमारा सपना शताब्दी वर्ष 2047 तक विकसित देश बनने का है।...बता रहे हैं सुमन कुमार
देश आज गणतंत्र का अमृतकाल मना रहा है। संविधान को लागू हुए आज 75 साल पूरे हो गए। यह संविधान ही है, जिसने तमाम राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद देश को चौतरफा प्रगति और उन्नति की ओर अग्रसर किया। हमारे संविधान ने ही सरकारों को जनता के हित में नीतियां बनाने और बिना किसी भेदभाव के लागू करने के लिए प्रेरित किया। यह संविधान ही है, जो आम जनता को सरकार की नीतियों से लाभ उठाने का अधिकार और मौका देता है।
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धान की खेती
- फोटो : अमर उजाला
दुनिया का अन्नदाता भारत
कृषि क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां किसी को भी अचंभित कर सकती हैं। ऐसे दौर से निकलकर जब अनाज के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, आज भारत अनाज, फल और सब्जियों का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण जब भारत ने गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध की घोषणा की, तो दुनिया के कई देशों में अनाज का संकट पैदा हो गया। भारत आज चीनी का भी दुनिया में दूसरे सबसे बड़ा निर्यातक देश है। वर्ष 2022-23 के तीसरे आकलन के अनुसार देश में अनाज का रिकॉर्ड 33 करोड़ 5 लाख टन उत्पादन हुआ है। जाहिर है देश ही नहीं, विदेशियों के लिए भी भारतीय कृषि क्षेत्र भोजन की व्यवस्था कर रहा है।
सिर्फ दालों की बात करें, तो पूरी दुनिया का एक चौथाई दाल उत्पादन भारत में होता है। हालांकि तथ्य यह भी है कि भारत दुनिया में एक चौथाई से अधिक (27 फीसदी) दाल का उपभोग भी करता है। ऐसे में वह दुनिया का सबसे बड़ा (14 फीसदी) दाल आयातक भी है।
अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। दूसरे शब्दों में उद्योगों व अन्य स्रोतों से आय बढ़ रही है। 2022-23 में जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 20 फीसदी से घटकर 18.3 फीसदी रह गई। कृषि क्षेत्र 3.3 फीसदी की दर से वृद्धि कर रहा है।
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स्टार्टअप
- फोटो : अमर उजाला
अर्थव्यवस्था को पांच लाख करोड़ डॉलर की ओर ले जाते स्टार्टअप
केंद्र सरकार अर्थव्यवस्था को पांच लाख करोड़ डॉलर के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को लेकर चल रही है। यहां तक पहुंचने का बीड़ा युवा उद्यमियों ने उठाया है। स्टार्टअप यानी पहली पीढ़ी की कंपनियां पूरी दुनिया में पहचान बना रही हैं। 1,17,000 पंजीकृत स्टार्टअप कंपनियों ने सिर्फ 2022 में पूरी दुनिया से 3,48,600 करोड़ का निवेश जुटाया है। इनमें 10 लाख से अधिक भारतीयों को प्रत्यक्ष और इससे कहीं अधिक संख्या में परोक्ष नौकरियां मिली हैं। फिनटेक, प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में नई कंपनियां उम्दा काम कर रही हैं। ईवी की 500 स्टार्टअप कंपनियों ने 2030 तक 1.7 करोड़ यूनिट वाहन बेचने का लक्ष्य तय किया है, जो जलवायु परिवर्तन की गति थामने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
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भारत का बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण
- फोटो : PTI
रक्षा उत्पादन में आयातक से निर्यातक की ओर बढ़ते कदम
बहुत अधिक समय नहीं हुआ है, जब भारत में हथियारों की चर्चा आरंभ होते ही पूछा जाता था कि किस देश से खरीदा गया है क्योंकि भारत में कुछ छोटे आग्नेयास्त्रों और गोलों के अलावा कुछ नहीं बनता था। यह कल्पना भी नहीं की जाती थी कि देश में उच्च प्रौद्योगिकी वाले विश्वस्तरीय हथियार बनाए जा सकते हैं। कोई देश अपनी तकनीक देने के लिए तैयार नहीं था, पर स्थितियां तेजी से बदलीं। 2022-23 में देश में बने हथियारों का 16 हजार करोड़ रुपये का निर्यात हुआ है। 2016-17 के मुकाबले यह करीब 10 गुना है। पांच साल में सरकार ने इसे बढ़ाकर 41 हजार करोड़ रुपये के पार ले जाने का लक्ष्य तय किया है। देश की अर्थव्यवस्था में रक्षा उत्पादन की हिस्सेदारी बढ़कर 3.3 फीसदी हो गई है। 2022-23 में 1,08,333 करोड़ रुपये का रक्षा उत्पादन हुआ, जो अब तक का रिकॉर्ड है। इनमें से अधिकांश की खरीदारी भारत के अपने सैन्य बलों ने की है। 2022 में भारत का रक्षा खर्च 6.75 लाख करोड़ रुपये रहा जो दुनिया में चौथा सबसे अधिक खर्च है। इससे आगे सिर्फ अमेरिका, चीन और रूस हैं
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स्वास्थ्य
- फोटो : अमर उजाला
स्वास्थ्य: इलाज के लिए अब घर-जमीन नहीं बेचना पड़ता
नागरिकों की सेहत ऐसी चीज है जिसके बारे में सोचना हर सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है। देश में चिकित्सा क्षेत्र पर यूं तो पहले भी खासा काम हुआ लेकिन पिछले 10 वर्षों में इस क्षेत्र ने जो उछाल भरी है वह अभूतपूर्व है। 2014 तक देश में कुल मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 और एमबीबीएस की सीटें 51,348 थीं। आज मेडिकल कॉलेज 695 हो चुके हैं और इनमें एमबीबीएस की सीटें 1,06,333 हैं। 2024-25 में यह संख्या क्रमश: 725 और 1,25,000 हो जाएगी। कभी देश की प्रति 8,000 आबादी पर एक डॉक्टर होते थे और आज यह आंकड़ा 834:1 का है। देश में आधुनिकतम चिकित्सा उपलब्ध होने के कारण दूसरे देशों के मरीज सस्ते इलाज के लिए यहां आ रहे हैं। कोरोना से पहले 2020 में मेडिकल टूरिज्म से देश को 2.89 लाख करोड़ की कमाई हुई।
चिकित्सा क्षेत्र में व्यापक बदलाव सिर्फ मेडिकल कॉलेजों या डॉक्टरों की संख्या तक सीमित नहीं है बल्कि नागरिकों तक चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच के मामले में भी हुआ है।
प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जिसे आयुष्मान भारत योजना भी कहते हैं, ने देश की करीब 50 करोड़ आबादी को बड़ी बीमारियों में भी मुफ्त इलाज की सुविधा दी है। अब तक देश में करीब 25.4 करोड़ आयुष्मान कार्ड बने हैं।
इस योजना के तहत 27,343 अस्पतालों में गरीब तबके के मरीजों को पांच लाख रुपये से अधिक का इलाज किया जा रहा है।
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भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अक्षय ऊर्जा उत्पादक
भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता है, जबकि तीसरा सबसे बड़ा अक्षय ऊर्जा उत्पादक है। भारत के 4,00,000 मेगावाट बिजली की खपत में से 1,60,000 मेगावाट बिजली अक्षय या नवीकरणीय ऊर्जा से आती है। नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में सिर्फ अमेरिका और चीन हमसे आगे हैं। 2030 तक भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा से 5,00,000 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। इस दिशा में तेजी से काम भी चल रहा है। वित्त वर्ष 2023-24 पूरा होने से पहले सरकार पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और हाइब्रिड ऊर्जा से 50 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य पूरा करने जा रही है। वहीं, पीएम नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी को सूर्योदय योजना आरंभ की है। इसके तहत एक करोड़ घरों की छतों पर सोलर पैनल से बिजली उत्पादन की तैयारी की गई है। यह क्रांतिकारी योजना पूरी होने पर जीवाश्म ईंधन से निर्मित बिजली पर निर्भरता बेहद कम हो जाएगी।
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दुनिया की फार्मेसी में 4.15 लाख करोड़ का है भारतीय दवा बाजार
यूं तो भारतीय दवा कंपनियां दुनिया के गरीब देशों के लिए दशकों से जीवनदाता की भूमिका निभाती रही हैं लेकिन कोरोना काल ने हमारी कंपनियों के मानवीय पहलू को दुनिया के सामने रखा। भारत ने कोरोना से बचाव के लिए अपनी 140 करोड़ की आबादी को तो टीका लगाया ही, दुनिया के अन्य देशों को भी मुफ्त में टीका पहुंचाया।
भारत का दवा बाजार अभी 4.15 लाख करोड़ रुपये का है जिसके 2030 तक 5.40 लाख करोड़ रुपये पहुंचने का अनुमान है। खास बात यह है कि भारत के कुल दवा उत्पादन का आधा विदेशों को जाता है। पूरी दुनिया में बिकने वाले कुल जेनरिक दवाओं का 20 फीसदी अकेले भारत निर्यात करता है। ऐसे में भारत को अगर दुनिया की फार्मेसी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
डिजिटल भुगतान सबसे आगे हम
जिस राष्ट्र की छवि किसी समय पूरी दुनिया में सपेरों के देश की बना दी गई हो, अगर वह दावा करे कि दुनिया में सबसे अधिक डिजिटल लेन-देन उसके लोग करते हैं, तो अचरज से लोगों के मुंह खुले रह ही जाएंगे। अभी दुनिया का यही हाल है। चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन उपभोक्ता देश भारत, डिजिटल लेन-देन के मामले में पूरी दुनिया में नंबर वन है। पूरी दुनिया के कुल डिजिटल भुगतान का 46 फीसदी अकेले भारत में होता है।
भारत सरकार के आधिकारिक डाटा के अनुसार 2023 में 11 दिसंबर तक 11,660 करोड़ डिजिटल लेन-देन हो चुका है। 2022-23 में यूपीआई के जरिये 139 लाख करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ।
सरकार का आकलन है कि देश में 2026-27 तक खुदरा भुगतान का 90 फीसदी हिस्सा यूपीआई का होगा। यही नहीं यूपीआई भारत की सीमाएं तोड़कर विदेशों में भी तेजी से अपनी जगह बना रहा है।
ब्रिटेन, फ्रांस, यूएई सिंगापुर समेत 11 देश भारतीय यूपीआई को अपने भुगतान प्रणाली में शामिल कर चुके हैं। कई और देश इसे अपनाने की तैयारी कर रहे हैं। भारत ने प्रौद्योगिकी का सही उपयोग दुनिया को दिखाया है।