गीता प्रेस के प्रबंधक लालमणि बताते हैं कि स्वअध्याय के दौरान जयदयालजी को प्रेरणा मिली की गीता सभी के लिए सर्वसुलभ होनी चाहिए। सेठजी ने गोविंद भवन सोसाइटी की तरफ से कोलकाता के ही वणिक प्रेस से गीता की प्रतियां छपवाईं। लेकिन, मुद्रण में कईं त्रुटियां थी। उन्होंने इसे कई बार दुरुस्त करने के लिए कहा तो प्रेस संचालक ने बार-बार संशोधन को मुमकिन नहीं बताते हुए कहा कि- आप इतनी शुद्ध पुस्तक चाहते हैं तो अपनी निजी प्रेस लगवाकर छपवाएं...। इस घटना के बाद ही गीता प्रेस की गोरखपुर में स्थापना की नींव पड़ी। आइए इसे लाइव पढ़ते हैं...
गोरखपुर में दोपहर के एक बजे थे। बीस से 25 फीट चौड़ी सड़क पर पहिए में पहिया फंसाए दौड़ रहे रिक्शा, ऑटो रिक्शा और गाड़ियों के चिल्ल-पों के बीच बचते हुए गीता प्रेस गेट के बाहर अभी गाड़ी रुकी ही थी कि भीतर से टन...टन की घंटी की आवाज ने थोड़ा चौंका दिया। मुख्य द्वार के पास खड़े एक बुजुर्ग सुरक्षा गार्ड ने शायद चेहरे के भाव पढ़ लिए। तपाक से बोल पड़े- यह स्कूल की घंटी नहीं, लंच टाइम का अलार्म है। मुख्य द्वार से भीतर दाखिल हुए तो बाहर जितना शोर था, अंदर उतनी ही खामोशी पसरी मिली। सब कुछ पहले जैसा ही।