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इस क्रांतिकारी के सामने कांपते थे अंग्रेजी अफसर, पीछा छुड़ाने के लिए सात बार दी थी फांसी

Tue, 26 Jan 2021 07:28 AM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
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तरकुलहा देवी - फोटो : अमर उजाला।
अमर शहीद बंधु सिंह देश के ऐसे शहीद का नाम है, जिन्होंने 1857 की क्रांति में अहम योगदान दिया। गोरखपुर और आसपास के क्षेत्र के युवाओं के दिल में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई की ऐसी चिंगारी जगाई, जो बाद में ज्वाला बन गई। ऐसे युवाओं के देश प्रेम के जज्बे के कारण ही देश आजाद हुआ। आज गणतंत्र दिवस पर हम आपको उनसे जुड़ी एक ऐसी कहानी के बारे में बताने जा रहे हैं। जिसको जानकर आप भी गर्व करेंगे। 
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तरकुलहा देवी - फोटो : अमर उजाला।
गोरखपुर के चौरीचौरा क्षेत्र में स्थापित तरकुलहा देवी का मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर के महिमा की चर्चा जिले तक ही सिमित नहीं है बल्कि पूरे पूर्वांचल में इसकी ख्याति फैली हुई है। तरकुलहा देवी मंदिर का महत्व स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह को माता का विशेष आशीर्वाद प्राप्त था। वह यहां माता के समक्ष अंग्रेजों की बलि देकर उन्हें प्रसन्न किया करते थे। यहां आम दिनों में बकरे की बलि दी जाती है।
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तरकुलहा देवी - फोटो : अमर उजाला।
तरकुलहा देवी मंदिर का इतिहास  
तरकुलहा देवी मंदिर का इतिहास चौरीचौरा तहसील क्षेत्र के विकास खंड सरदारनगर अंतर्गत स्थित डुमरी रियासत के बाबू शिव प्रसाद सिंह के पुत्र व 1857 के अमर शहीद बाबू बंधू सिंह से जुड़ी है। कहा जाता कि बाबू बंधू सिंह तरकुलहा के पास स्थित घने जंगलों में रहकर मां की पूजा-अर्चना करते थे तथा देश को अंग्रेजों से छुटकारा दिलाने के लिए उनकी बलि मां के चरणों में देते थे।

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तरकुलहा देवी - फोटो : अमर उजाला।
फांसी पर लटकाते ही टूट गया फंदा
बंधू सिंह से अंग्रेज अफसर घबराते थे। उन्होंने बंधू सिंह को धोखे से गिरफ्तार कर उन्हें फांसी पर लटकाने का आदेश दे दिया। जल्लाद ने बंधू सिंह को जैसे ही फांसी के फंदे पर लटकाया, फांसी का फंदा टूट गया। यह क्रम लगातार छह बार चला। जिसे देखकर अंग्रेज आश्चर्य चकित रह गए। तब बंधू सिंह ने मां तरकुलहा से प्रार्थना किया कि हे मां मुझे अपने चरणों में ले लो। सातवीं बार बंधू सिंह ने स्वयं फांसी का फंदा अपने गले में डाला। इसके बाद उन्हें फांसी हो सकी।
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तरकुलहा देवी - फोटो : अमर उजाला।
मंदिर की विशेषता
तरकुलहा देवी मंदिर में चैत्र नवरात्र से एक माह का मेला लगता है। पूरे पूर्वांचल से लोग मेले में पहुंचते हैं। मुंडन व जनेऊ व अन्य संस्कार भी स्थल पर होते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर लोग बकरे की बलि देते हैं।
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