अमृत
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मोहन कुमार को फिल्म अमृत का विचार कैसे और कहां से आया, इसके बारे में तो ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन, ऐसी ही कहानी या इससे मिलती जुलती कहानी पर तमाम फिल्में बनी हैं। इसका सबसे आखिरी उदाहरण तो अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी की फिल्म बागबान ही है। लेकिन इस कहानी पर बनी फिल्मों का सिलसिला साल 1937 से चला आ रहा है जब हॉलीवुड निर्देशक लिओ मैककैरी ने फिल्म बेक वे फॉर टुमारो बनाई थी। फिल्म में बुजुर्ग दंपती के रूप में दिखे विक्टर मूर और बेउला बोंडी के कमाल के अभिनय ने इस फिल्म को अमर कर दिया। दंपती के पांच बच्चे होते हैं लेकिन कोई भी दोनों को एक साथ रखना नहीं चाहता। निर्देशक मैककैरी का हमेशा यही मानना रहा कि ये फिल्म उनके करियर की सबसे अच्छी फिल्म बनी। और, इसका जिक्र उन्होंने ऑस्कर पुरस्कार समारोह के मंच पर भी किया जब उन्हें बेस्ट डायरेक्टर का ऑस्कर फिल्म द ऑफुल ट्रुथ के लिए मिला था। मेक वे फॉर टुमारो और द ऑफुल ट्रुथ एक ही साल रिलीज हुई फिल्में हैं। द ऑफुल ट्रुथ के लिए पुरस्कार लेने के बाद मैककैरी ने मंच से कहा, ‘धन्यवाद, लेकिन आपने ये पुरस्कार मुझे गलत पिक्चर के लिए दिया।’
इस फिल्म का सिरा भारत से जुड़ता दिखता है कन्नड़ में 1958 में बनी फिल्म स्कूल मास्टर से। फिल्म को तमिल में एंगल कुदुंबम् पेरिसु के नाम से साथ में ही डब करके रिलीज किया गया। फिल्म बाद में तेलुगू में अलग से भी बनी। इसका मलयालम और हिंदी में भी रीमेक हुआ। डिक्की माधवराव, उदय कुमार, सिवाजी गणेशन, जेमिनी गणेशन और बी सरोजा देवी अभिनीत ये पहली कन्नड़ फिल्म है जो सिनेमाघरों में 25 हफ्ते लगातार चली। फिल्म के मेकर्स के मुताबिक उन्होंने ये फिल्म मराठी के मशहूर साहित्यकार कुसुमाग्रज की कहानी वैष्णवी पर बनाई।