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किस्सागोई: मीडिया ने दो बार मारा इस मशहूर सिंगर को जिसने गाया, ‘पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली..’

Tue, 14 Apr 2020 03:02 AM IST
Mishra Mishra पंकज शुक्ल, मुंबई
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Shamshad begum - फोटो : Social Media

कालजयी गीतकार शकील बदायूंनी ने जब अपनी कलम से दुलार का दरिया बहाते हुए लिखा, भैया बाबा ने सुख मोहे सारे दिए, मोरे गौने में चाँद और सितारे दिए, साथ ले के मैं सारा गगनवा चली, पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली.... तो साल 1957 में निर्देशक महबूब खान को भी और फिल्म मदर इंडिया के संगीतकार नौशाद को भी समझ आ गया कि इस गाने को गला खोल के अगर कोई गा सकता है तो वह हैं सुरों की बेगम, शमशाद बेगम.....

लेकिन, ये वो दौर था जब शमशाद बेगम तो कभी न गाने की बात ठाने बैठी थीं। शौहर के इंतकाल के बाद बेगम ने अपना सारा ध्यान अपनी बिटिया की परवरिश में लगाने का फैसला किया। बिटिया ने तमाम मिन्नतें की कि उसे भी गाना गाने की ट्रेनिंग लेने दी जाए पर शमशाद ने संगीत की सियासत का असली चेहरा देख लिया था, वह नहीं चाहती थीं कि उनकी बेटी भी इस सब में जाकर फंसे। उनकी बिटिया उषा ने हिंदुस्तानी फौज के एक बड़े अफसर से शादी की और आखिरी सांस तक अपनी मां की सेवा भी की। तो कैसे मदर इंडिया के निर्देशक महबूब खान ने मनाया महान गायिका शमशाद बेगम को इस शानदार गाने के लिए, जानने से पहले देखिए फिल्म मदर इंडिया का शमशाद बेगम का गाया ये गीत। जी हां, हिंदुस्तान कभी ऐसा भी हुआ करता था, बस 60-65 बरस पहले की तो बात है। ये गाना देखते ही आपका दिल तो भर आएगा ही, साथ ही आंखों में खुशी की एक चमक भी जरूर बिखरेगी।

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Shamshad begum - फोटो : Social Media
पहले ब्रेक में ही मिले 12 गाने
शमशाद बेगम ने मदर इंडिया का गाना पी के घर आज ... तो खैर महबूब खान की मिन्नतों पर और उन्हें लाहौर से मुंबई लाने की बातें याद दिलाने पर गाया ही, इसके बाद भी तमाम सुपर डुपर हिट गाने गाए। और, ऐसे गाने भी गाए जिनमें कोरस गाने वालों की भीड़ में कभी किशोर कुमार तो कभी लता मंगेशकर खड़े दिख जाते थे। संगीतकार मदन मोहन ने भी शमशाद बेगम के गानों में कोरस खूब गाया है। ये तब सब बच्चे थे और बच्ची ही तो थीं शमशाद बेगम जब उन्हें गाना गाने का पहला बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल हुआ। स्कूल में अपने गानों के लिए खूब तारीफ पाने वाली शमशाद को कव्वालियों का शौक रखने वाले उनके एक चाचा लाहौर की एक बड़ी म्यूजिक कंपनी में ऑडीशन दिलाने ले गए।

ये वाकया है साल 1931 का और 14 अप्रैल 1919 को पैदा हुईं शमशाद तब सिर्फ 12 साल की थीं।  मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर ने बच्ची का टेस्ट लिया और टेस्ट पास होते ही मिला उसे 12 गानों का कॉन्ट्रैक्ट और हर गाने के एवज में मिले 15 रुपये। अलबम पूरा होने पर शमशाद को बाद में 500 रुपये और इनाम में भी मिले। लेकिन, ये तब हो सका जब शमशाद के चच्चा ने उनके वालिद को बड़ी मुश्किल से मनाया। बहुत ही संस्कारी परिवार की थीं शमशाद बेगम का और उनके वालिद मियां हुसैन बख्श मान कतई नहीं चाहते थे कि उनकी बिटिया बाहर जाकर गाना गाए। ये गाने तब जाकर रिकॉर्ड हो पाए जब तय ये हुआ कि शमशाद सारे गाने बुर्के में रिकॉर्ड करेंगी और फोटो उनका एक न खिंचेगा। आगे किस्सा बढ़ाने से पहले पेश ए खिदमत है फिल्म मुगले आजम का ये गाना जिसमें शमशाद बेगम के साथ गा रही हैं लता मंगेशकर, तब तक वह इतना मशहूर न हुई थीं।
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Shamshad begum - फोटो : Social Media
13 साल की शमशाद की मोहब्बत और बगावत
लता मंगेशकर और उनकी बहन आशा भोसले का हिंदी सिनेमा में आगमन उन्हीं दिनों हुआ जब शमशाद बेगम का करियर अपने शीर्ष पर था। संगीतकार दोनों को बेगम की स्टाइल में ही गाने को बोलते थे और तमाम गाने लता व आशा ने गाए भी हैं शमशाद बेगम के ही अंदाज में। लेकिन, अपने पीछे आने वाली पीढ़ी को अपने अंदाज का दीवाना बना देने का ये हुनर पाने से पहले शमशाद बेगम ने मुश्किलें बहुत झेलीं और इनकी शुरुआत होती है उनके अपने घर से। शमशाद बेगम की पैदाइश जलियांवाला बाग हत्याकांड के ठीक अगले दिन की है। लाहौर में पैदा हुई शमशाद की मां गुलाम फातिमा की दो बेटियां और पांच बेटे और भी हुए।

13 साल की शमशाद पर मोहल्ले का ही गणपत लाल बट्टू रीझ गया। गणपत लॉ का स्टूडेंट था और शमशाद से उम्र में काफी बड़ा भी। लेकिन, जमाने भर की मुखालिफत के बावजूद दोनों ने 1934 में शादी कर ली। गणपत ने लाहौर से मुंबई तक शमशाद का हर कदम पर ख्याल रखा। जहां उनके कदम होते, वहां गणपत अपना दिल बिछाए रहते। मदर इंडिया का गाना गाने से पहले शमशाद ने गाना इन्हीं गणपत का 1955 में एक सड़क हादसे में निधन हो जाने के चलते छोड़ा था। 1955 से पहले शमशाद ने गायिकी के जो कमाल किए, वे आज भी बेमिसाल हैं।

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Shamshad begum - फोटो : Social Media
हीरोइन बनने का ऑफर मिला तो घर में गदर
तो शमशाद बेगम की किस्मत ने पलटा खाया था रिकॉर्डिंग कंपनी जीनोफोन का कॉन्ट्रैक्ट हासिल करके। उनके गाए रिकॉर्ड बाजार में आए तो धूम मच गई। पेशावर और लाहौर के आल इंडिया रेडियो पर उनके गाने खूब बजते। प्रोड्यूसर दिलसुख पंचोली ने शमशाद बेगम को देखा तो फिल्मों में हीरोइन बनने का ऑफर दे दिया। मैडम ने मान भी लिया। स्क्रीन टेस्ट हो गया। सेलेक्ट भी हो गईं और फिर आया नंबर मियां हुसैन बख्श से परमीशन लेने का। साहब फैल गए कि बिटिया अभी तक गाने ही गा रही थी अब पिच्चर सलीमा भी करने लगेगी तो उनकी तो नाक ही कट जाएगी बिरादरी में। सब कोशिशें बेकार गईं। वालिद साहब ने फरमान जारी कर दिया कि अगर कहीं फोटो भी अब खिंची तो गाना बंद।

नतीजा ये कि साल 1933 से लेकर साल 1970 तक की शमशाद बेगम की गिनती की फोटुए हैं। वो इसलिए कि बिटिया ने अपने अब्बा हुजूर से दोबारा कभी कैमरे के सामने न आने का वादा कर दिया था। और अब जानिए सौ टके वाली बात। शमशाद बेगम ने इतनी मशहूरियत पाने तक किसी उस्ताद से गाना सीखा तक न था। रेडियो पर वह दिल्ली की क्राउन इंपीरियल थिएट्रिकल कंपनी के साजिदों के साथ गाती थी। इन्हीं दिनों उन्होंने कुछ नात रिकॉर्ड की। सारंगी के उस्ताद बक्शवाले साहेब ने उनको सुना और अपने साथ ले गए। इन्हीं से शमशाद ने सरगम सीखी। और यहीं से मौका बना शमशाद बेगम का अपने वालिद का घर छोड़ बंबई जाने का। बाबुल का घर छोड़ जाने का दर्द शमशाद बेगम की आवाज में समझना हो तो ये गाना बिल्कुल मुफ़ीद है।

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Shamshad begum - फोटो : Social Media
महबूब खान लेकर आए बंबई
ये बात कोई 1940-41 की है जब शमशाद बेगम अपने बाबुल का घर छोड़ बंबई आ गईं। लेकिन, लाहौर से बंबई आना इतना आसान न था। उस वक्त भी काम आए थे निर्देशक महबूब खान। महबूब खान ने गणपत को ऐसा ऑफर दिया कि वो मना ही नही कर पाए। महबूब खान बोले, “मैं बंबई में इसे रहने को घर दूंगा। गाड़ी दूंगा। नौकर चाकर दूंगा और पांच छह और लोग भी इसके साथ आना चाहें तो उनका खर्च भी दूंगा।” रेडियो की शोहरत शमशाद के साथ साथ फिल्मों में भी चली आई। गुलाम हैदर ने समशाद से 1941 में रिलीज हुई फिल्म खजांची और उसके अगले साल आई फिल्म खानदान में बेहतरीन गाने गवाए। मशहूर अभिनेता प्राण की पहली फिल्म यमला जट में भी शमशाद बेगम ने सुपरहिट गाने गाए। रफीक गजनवी, अमीर अली, पंडित गोबिंदराम, पंडित अमरनाथ, बुलो सी रानी, राशिद अत्रे और एम ए मुख्तार जैसे संगीतकारों ने शमशाद का साथ पाकर खूब सारे हिट गाने बनाए।
शमशाद बेगम ने देश के बंटवारे तक बंबई में अपना बड़ा नाम बना लिया। और, ये इसके बावजूद कि गुलाम हैदर इस बीच एक और गायिका नूरजहां भी खोज लाए थे। फिर बंटवारा हुआ और हैदर पाकिस्तान चले गए और शमशाद बेगम को मिल गया मौसिकी में एक नई परवाज़ का पूरा खुला आसमान।

कम लोग ही जानते हैं कि एस डी बर्मन को बतौर म्यूजिक डायरेक्टर हिंदी सिनेमा में स्थापित करने में भी शमशाद बेगम का बड़ा हाथ है। वह बंगाली सिनेमा के बड़े कंपोजर थे, लेकिन 1946 में जब उन्हे पहली हिंदी फिल्म शिकारी का म्यूजिक बनाने का मौका मिला तो वह सीधे शमशाद बेगम के पास ही गए। शमशाद बेगम ने कभी किसी नए संगीतकार के साथ गाने से मना नहीं किया। दिलचस्प बात ये है कि उस दौर के जितने भी बड़े संगीतकार हुए सब अपने स्ट्रगल के दौर में भी शमशाद से मिल चुके थे। ये सब करियर का बड़ा मौका मिलते ही सीधे शमशाद के पास ही पहुंचे। कुछ और संगीतकारों के किस्से अभी बाकी हैं, पहले सुनिए शमशाद बेगम का गाया और एसडी बर्मन का कंपोज किया फिल्म बहार का ये गाना, सैंया दिल में आना रे, आके फिर ना जाने रे, छम छमा छम छम...परदे पर यहां छम छम करती आपको दिखेंगी वैजयंतीमाला।

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Naushad Ali
नौशाद ताउम्र रहे एहसानमंद
हिंदी सिनेमा के बड़े संगीतकार ओ पी नैयर के पैर जमाने में भी शमशाद बेगम का बड़ा हाथ रहा। शमशाद उन्हें तब से जानती थीं जब वह लाहौर में रेडिया पर गाया करती थीं और ओ पी नैयर वहां नामी गायकों को केक खिलाने आया करते थे। नैयर वहां ऑफिस ब्वॉय की नौकर करते थे। ओ पी नैयर को जब बतौर संगीतकार पहला मौका मिला तो वह सीधे शमशाद बेगम के पास आए और फिल्म मंगू के गाने रिकॉर्ड करने की गुजारिश की। नैयर कहते थे, शमशाद बेगम की आवाज किसी मंदिर में बजने वाली घंटी की तरह एकदम साफ है। ओ पी नैयर और शमशाद बेगम के साथ की ही तरह नौशाद और शमशाद बेगम का भी साथ लंबा चला।

नौशाद ने एक इंटरव्यू में कहा था, “बुलंदी तक पहुंचने में जिस एक शख्स का मैं कर्ज़दार ताउम्र रहूंगा वो हैं शमशाद बेगम।” ये सच भी इसलिए है क्योंकि नौशाद के आने से पहले ही शमशाद बेगम मशहूर हो चुकीं थीं। ये और बात है कि नौशाद के गानों ने उनकी शोहरत में चार चांद लगा दिए। और, ये भी और बात है कि शमशाद बेगम के गाए सोलो औ डुएट गानों ने ही नौशाद को महान संगीतकार नौशाद का दर्जा दिलाया। नौशाद मशहूर हुए तो दूसरों से भी गाने गवाने लगे लेकिन शमशाद बेगम के लिए उनके पास एक कोना हमेशा महफूज़ रहा और जब मदर इंडिया की बारी आई तो नौशाद ने फिल्म के कुल 12 में से चार गाने शमशाद बेगम से ही गवाए। नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म मदर इंडिया का एक गाना आप शुरू में ही सुन चुके हैं। यहां आपको सुनाते इसी फिल्म का वो गाना जो अब भी हर साल होली में तो जरूर ही बजता है..

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Shamshad begum - फोटो : Social Media

करियर में गाए करीब छह हजार गाने
ऐसा कम ही होता है कि किसी मशहूर गायिका के साथ कोरस गाने वाला कोई बालक एक दिन उसी गायिका के साथ डुएट सॉन्ग रिकॉर्ड करे लेकिन ऐसा हुआ शमशाद बेगम और किशोर कुमार के साथ। आगे चलकर मशहूर संगीतकार बने मदन मोहन के साथ किशोर कुमार भी स्टूडियोज के चक्कर लगाया करते थे। बड़े भाई अशोक कुमार उस दौर के सुपरस्टार थे तो कोई रोकता टोकता भी नहीं था। और ऐसे ही खेल खेल में किशोर कुमार ने गाना शुरू कर दिया। न शमशाद बेगम ने कहीं शुरुआत में गाने की ट्रेनिंग ली और न ही किशोर कुमार ने। दोनों ने अंगारे और नया अंदाज जैसी फिल्मों में साथ में डुएट गाने गाए।

शमशाद बेगम ने ही ये भविष्यवाणी भी की थी कि किशोर कुमार एक दिन बहुत बड़ा गायक बनेगा और मदन मोहन से उन्होंने कहा था जिस दिन वह संगीतकार बनेगा, वह उनके साथ गाने जरूर रिकॉर्ड करेंगी और वह भी सिर्फ आने जाने का खर्चा लेकर। मशहूर संगीतकार सी रामचंद्र जब उनके पास ‘मेरी जान मेरी जान संडे के संडे आना’ जैसा वेस्टर्नाइज गाना लेकर पहुंचे तो शमशाद बेगम ने उन्हें भी मना नहीं किया। उन्हें बदलती हवा का रुख भांप लेने की कला जो पहले से आती थी। शमशाद बेगम ने हिंदी के अलावा तमिल, बंगाली, मराठी, गुजराती और पंजाबी में करीब छह हजार गाने रिकॉर्ड किए। उनके हिट गाने बेशुमार हैं। पिछली चंद स्लाइड्स में इनमें से कुछ गाने आपने देखे भी होंगे, अब देखिए ये गाना जो फिल्माया गया है दिलीप कुमार और मुनव्वर सुल्ताना पर और जिसमें आवाजें हैं शमशाद बेगम के साथ तलत महमूद की।

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Shamshad begum - फोटो : Social Media

मरने से पहले ही मार दिया जमाने ने
तो बात हमने शुरू की थी कि फिल्म मदर इंडिया के लिए निर्देशक महबूब खान ने मशहूर गायिका शमशाद बेगम को फिर से गाने के लिए कैसे राजी किया। और, एक बार वो गाने के लिए राजी हुईं तो फिर तमाम फिल्मकारों के घर चांदी बरसा गईं। मदर इंडिया के लिए उन्होंने चार गाने गाए और चारों सुपर हिट। इसके बाद हावडा ब्रिज, जाली नोट, लव इन शिमला, मुगले आजम, ब्लफ मास्टर और घराना जैसी फिल्मों में भी उनके आवाज का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला। लता मंगेशकर और आशा भोसले के आने के बाद धीरे धीरे शमशाद बेगम ने गाना कम कर दिया। साल 70-71 तक आते आते शमशाद बेगम फिल्म संगीत से पूरी तरह दूर हो चुकी थीं।

रिटायरमेंट के बाद वह मुंबई में ही अपनी बेटी और दामाद के साथ एकांतवास में जीने लगीं लेकिन साल 2004 में लोगों को उनकी याद तब आई जब सामने ये आया की कि जिन शमशाद बेगम का 1998 में ही मीडिया में इंतकाल बताया जा चुका है, वह अभी जिंदा हैं। इसके बाद उनके घर वाले सामने आए और तब दोबारा हुई खोजबीन में ये सामने आया कि 1998 में जो शमशाद बेगम गुजरीं वो दिलीप कुमार की बेगम सायरा बानो की कोई दूर की रिश्तेदार थीं। इसके बाद भी भारत सरकार को और पांच साल तक शमशाद बेगम की याद नहीं आई। 2009 में जाकर उन्हें पद्मभूषण पुरसकार मिला। 23 अप्रैल 2013 को मुंबई में उन्होंने आखिरी सांस ली। जाते जाते सुनते जाइए शमशाद बेगम का फिल्म नया दौर का ये गाना, जो उन्होंने आशा भोसले के साथ गाया..



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