'ताज: डिवाइडेड बाय ब्लड'
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सीरीज की कहानी के मुताबिक अकबर की कोशिश यही रहती है कि किसी तरह से सलीम को अपनी जिम्मेदारी का एहसास हो, मुराद रहमदिल बने और दानियाल लड़ाई के तौर तरीके को समझ सके, लेकिन अकबर की अपेक्षाओं पर कोई भी खरा नहीं उरता है। सलीम को तख्त का लालच नहीं है। अकबर दीन-ए- इलाही पंथ की शुरुआत करता है। उसका मानना है कि मजहब के नाम पर एक-दूसरे का खून बहाना बंद होना चाहिए। तलवार के जोर पर लोगों का मजहब नहीं बदलना चाहिए, कोई किसी भी जाति धर्म का हो, सबको समान अधिकार मिलना चाहिए। मुगलिया सल्तनत के लिए ऐसा ही बादशाह चाहिए, जो इस सब बातों का ख्याल रख सके।