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संस्मरण: जब सुरेखा सीकरी ने कहा, ‘मेरी दिली इच्छा है कि मैं अमिताभ बच्चन के साथ काम कर सकूं’

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सुरेखा सीकरी - फोटो : अमर उजाला
एक विदेशी कंपनी को जब अपना हिंदी मनोरंजन चैनल लॉन्च करने के लिए ऐसी अदाकारा की तलाश हुई जो परदे पर पूरे रुआब के साथ परंपराओं की वाहक बन सके तो सबको एक साथ नाम सूझा, सुरेखा सीकरी यानी कलर्स चैनल को देश में लॉन्च करने वाले धारावाहिक ‘बालिका वधू’ की दादी सा। और, जब एक फिल्म में एक ऐसी सास के लिए कलाकार की जरूरत महसूस हुई जो अधेड़ उम्र की अपनी बहू के फिर से मां बनने को लेकर हो रही आलोचनाओं के समय उसके पक्ष में खड़ी दिख सके तो फिर सबको एक ही नाम सूझा, सुरेखा सीकरी यानी फिल्म ‘बधाई हो’ की दुर्गा देवी कौशिक। जीतू की मां। नकुल की दादी। ये दोनों किरदार सुरेखा सीकरी के अभिनय जीवन के चौथे पड़ाव के हैं। पिछली बार की मुलाकात में जो अब आखिरी मुलाकात हो चुकी है, सुरेखा ने दो बातें बहुत संजीदा तौर पर कहीं, ‘मैं अभिनय से कभी रिटायर होना नहीं चाहती और मेरी दिली इच्छा है कि मैं अमिताभ बच्चन के साथ काम कर सकूं।’
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सुरेखा सीकरी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘बधाई हो’ के लिए मिला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उनके करियर का तीसरा पुरस्कार रहा। इससे पहले अभिनय के लिए वह 1988 में आई सीरीज ‘तमस’ और 1994 में रिलीज हुई फिल्म ‘मम्मो’ के लिए भी सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुकी थीं। लेकिन ‘बधाई हो’ तक आते आते जमाना बदल चुका था। ट्विटर, फेसबुक और टीवी न्यूज चैनलों पर अपने बारे में इतना सब कुछ देखने के बाद सुरेखा के चेहरे पर उस दिन एक अलग ही तेज था। कहने लगीं, '40 साल हो गए मुझे अभिनय करते करते लेकिन लोगों को या कहें कि नई पीढ़ी को अब जाकर पता चला है। खैर, मुझे इसका गिला नहीं। जब भी जो भी काम मैंने किया अपने दिली सुकून के लिए किया। इनाम मिलते हैं तो किसे खुशी नहीं होती। मुझे और भी बहुत खुशी होती अगर मैं अपने पैरों पर खड़े होकर ये पुरस्कार ले पाती।'
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सुरेखा सीकरी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तीन साल पहले सुरेखा सीकरी एक टीवी सीरीज शूटिंग के लिए महाबलेश्वर में थीं और वहीं नहाते समय बाथरूम में गिर गईं। सिर पर चोट लगी। इलाज में देर हुई और वह लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहीं। खबर उड़ी कि उनकी आर्थिक हालत ठीक नहीं है। ये बात उनको पता चली तो उन्होंने इस पर सख्त एतराज किया। बेचारगी उनको कभी अच्छी नहीं लगी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निकलने के बाद उन्होंने दिल्ली में खूब थिएटर किया। मुंबई आने के बाद भी उनका रंगमंच से लगाव बना रहा। हालांकि, अभिनय की बजाय उनकी मंशा जीवन में एक पत्रकार बनने की ज्यादा रही।

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सुरेखा सीकरी - फोटो : सोशल मीडिया
ये उन दिनों की बात है जब सुरेखा अलीगढ़ में पढ़ती थीं। कॉलेज में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की टोली आई। ‘किंग लीयर’ नाटक हुआ और सुरेखा की बहन ने ठान लिया कि उन्हें अभिनेत्री बनना है। लेकिन, बाद में उनका मन बदल गया और घर वालों की सहमति से सुरेखा सीकरी ने कॉलेज में बंटे एनएसडी के फॉर्म हासिल कर एक फॉर्म अपने नाम से भर दिया। ऑडीशन, इंटरव्यू सबमें अव्वल नंबर। 1968 में सुरेखा सीकरी अलीगढ़ से दिल्ली आ गईं अभिनय सीखने। तब से वह लगातार अभिनय करती रहीं। हादसे के बाद जब वह अस्पताल से घर लौटीं तो भी उनके पास फिल्मों के प्रस्ताव आते रहे। इनमें से दो खास प्रस्ताव का वह जिक्र भी बातों बातों में करतीं। इनमें से एक था समलैंगिक बच्चों के अभिभावक का रोल और दूसरा था बीते जमाने की एक काल्पनिक अभिनेत्री नाजिया का रोल।
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सुरेखा सीकरी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सुरेखा नाजिया का रोल वह बहुत मन से करना चाहती थीं। स्क्रिप्ट भी उन्हें बहुत पसंद आईं। पूरी बातचीत के दौरान इसी एक जिक्र पर सुरेखा मायूस दिखीं। कहने लगीं, ‘निर्देशकों को अब मुझ पर भरोसा नहीं रहा। गलती उनकी भी नहीं है। मेरे हाथ पैर ही मेरा कहना नहीं मानते तो दूसरों को दोष क्या देना। उनको लगता होगा कि जैसा वह चाहते हैं वैसा मैं शायद अब न दे सकूं।’ सुरेखा सीकरी ने परदे पर मजबूत महिलाओं के किरदारों को एक अलग रंग देने की शुरूआत जो की थी, वह विरासत इन दिनों नीना गुप्ता निभा रही हैं।
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सुरेखा सीकरी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
नीना की बात चलने पर सुरेखा ने कहा था, ‘नीना बहुत जीवट वाली महिला रहीं है। उन्होंने अपना जीवन अपने हिसाब से जिया। हो सकता है उसमें उनके मन की भले बहुत न हुई हो लेकिन वह जितने साल, महीने या लम्हे अपने हिसाब से जी सकीं, उतना जी पाना भी सबको कहां हासिल होता है।’ सुरेखा सीकरी को फिल्मों में पहला मौका इमरजेंसी पर बनी फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ में मिला था। ‘सलीम लंगडे पे मत रो’ में अमीना का किरदार लोग कभी भूल नहीं पाए और ‘मम्मो’ में फय्याजी बनकर उन्होंने जग जीत लिया। कमर्शियल सिनेमा में उन्हें निर्देशक जॉन मैथ्यू मैथन लेकर आए फिल्म ‘सरफरोश’ में जिसमें वह सुल्तान की मां बनीं। फिर सनी देओल के साथ वह ‘दिल्लगी’ में भी दिखी। उसके बाद तो अगले दो दशक तक वह लगातार फिल्मों में नजर आती रहीं।
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सुरेखा सीकरी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सुरेखा सीकरी को लोगों ने बीते साल के पहले दिन या कहें कि रात में रिलीज हुई फिल्म ‘घोस्ट स्टोरीज’ में आखिरी बार परदे पर देखा। इस फिल्म में वह एक बीमार महिला के तौर पर नजर आईं जिनकी तीमारदारी जान्हवी कपूर का किरदार करता है। बिस्तर पर लेटे लेटे किए गए इस किरदार को भी सुरेखा ने बहुत संजीदगी से निभाया। जान्हवी कपूर में उनको उनकी मां श्रीदेवी की छाया नजर आती थी। नई पीढ़ी के कलाकारों से उनका लगाव बहुत ज्यादा था। वह कहती भी थीं, ‘ये लोग बहुत सौभाग्यशाली हैं कि इस दौर में अभिनय कर रहे हैं।’  
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