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Video Interview Raveena Tandon: ‘तब लोग मदद नहीं करते थे, रुआब गांठते थे, अच्छा सीन हो जाए तो कटवा देते थे’

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कर्मा कॉलिंग-रवीना टंडन इंटरव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रवीना टंडन का नाम हिंदी सिनेमा में ऐसे सुपरहिट गानों का पर्याय रहा है जिनकी धुनों पर आज की पीढ़ी भी ठुमके लगाती है, रील्स बनाती है। बीते तीन दशक से सिनेमा में सक्रिय रवीना टंडन उन गिनी चुनी अभिनेत्रियों में से भी हैं, जिनके साथ देसी सिनेमा के दर्शकों का रिश्ता आज भी बना हुआ है। ओटीटी पर उन्होंने वेब सीरीज ‘अरण्यक’ से शुरुआत की और अब उनकी अगली सीरीज आ रही है, ‘कर्मा कॉलिंग’। कर्म और भाग्य में बराबर विश्वास करने वाली रवीना टंडन से ये एक्सक्लूसिव बातचीत की, ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
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कर्मा कॉलिंग-रवीना टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपकी नई सीरीज आ रही है कर्मा कॉलिंग और गीता में तो कहा ही गया कि कर्म करते रहिए, फल की चिंता मत करिए..लेकिन यहां फल शायद बदले का है..?

कह सकते हैं आप। लेकिन हम सब का बचपन से विश्वास गीता पर रहा ही है और उसके सबक जो हैं वे हमने बचपन से आत्मसात किए हैं। हमारा धर्म ही ये कहता है। लेकिन, हमारी सीरीज में जो ‘बदला’ है वह भी हमने कर्म पर ही छोड़ा है कि जो आपके कर्म हैं, वे कभी न कभी लौटकर, आपको तलाशकर वापस आप तक आते ही हैं। यही एक बात हम इस कहानी में बार बार दोहरा रहे हैं कि जो तुम करोगे, वैसा ही फल तुम पाओगे।
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कर्मा कॉलिंग-रवीना टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अलीबाग की जो इंद्राणी कोठारी है इस कहानी में, उसके बारे में ट्रेलर में बताया जा रहा है कि वह 90 के दशक की एक दिवा (हीरोइन) है, किरदार बहुत कुछ रवीना जैसा ही लगता है, इसके पीछे कोई खास विचार रहा बनाने वालों का?

आप तो मुझे जानते हैं इतने बरसों से। मैं तो बहुत ही मिलनसार और ऊर्जावान हूं। और मुझसे जो भी मिलता है, उसे मैं बहुत सामान्य महसूस कराने की कोशिश करती हूं जो कि मेरा मानना है सबको एक सामान्य व्यक्ति के रूप में रहना ही चाहिए। इंद्राणी का जो किरदार है वह मेरी व्यक्तिगत पहचान से बिल्कुल अलग है। हर इंसान की अलग जीवन यात्रा होती है और हर किरदार में हम अपने व्यक्तिगत अनुभव शामिल नहीं कर सकते हैं।

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कर्मा कॉलिंग-रवीना टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इससे पहले माधुरी दीक्षित ने वेब सीरीज ‘फेमगेम’ में एक हीरोइन का किरदार कैमरे के सामने किया और आपका किरदार भी ‘कर्मा कॉलिंग’ में एक पूर्व हीरोइन का ही बताया जा रहा है। उस दौर की जो नायिकाएं हैं, उनसे देश के आम दर्शकों का रिश्ता आज भी बना हुआ है। आज भी गांव, देहात और छोटे कस्बों में उन्हीं के गाने बजते सुनाई देते हैं, इस रिश्ते को बनाए रखने के लिए आप कितना प्रयास करती रहती हैं?

मेहनत तो हर कोई करता है। मैं ये नहीं कह सकती है मैं कुछ ज्यादा करती हूं लेकिन किसी काम को लेकर जो समर्पण और ईमानदारी की जरूरत होती है, वह जब हम करते हैं तो वह दर्शकों के दिलों को छूता ही है। 32-33 साल से मैं काम कर रही हूं तो मुझे लगता है कि मैंने पूरी ईमानदारी से काम किया है। मेहनत करने से कभी डरे नहीं। लोग कहते हैं कि अरे, इनका संघर्ष क्या है? लेकिन, इतने साल मुख्यधारा में बने रहना, एक मुकाम हासिल करना और यहां तक आने के बाद भी अच्छे किरदार मिलते रहना, अपने आप में ही एक अलग संघर्ष होता है।
 

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कर्मा कॉलिंग-रवीना टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, इसमें भाग्य का कितना साथ मानती हैं आप?

बिल्कुल, भाग्य की बहुत बहुत जरूरत होती है। आपके ग्रह, नक्षत्र जब सही सीध में होते हैं तो बहुत जल्दी काम हो जाता है। नहीं तो कभी तो आप जितनी भी मेहनत कर लो। हर फिल्म में हम उतनी ही मेहनत करते हैं लेकिन कभी कभी फिल्म नहीं चलती तो बुरा लगता है कि हमारी मेहनत बेकार गई। हमने एक किरदार विकसित किया जो दर्शकों के दिलों तक नहीं पहुंच पाया। दिल को बहुत ठेस पहुंचती है तब। लेकिन हमें आगे तो बढ़ना ही होता है। मैं बीते हुए कल या आने वाले कल में नहीं जीती हूं। मैं आज में और इस पल में जीती हूं जो मेरे सामने है कि इस समय जो हो रहा है, उसे अपना सर्वश्रेष्ठ कैसे दे सकती हूं।

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कर्मा कॉलिंग-रवीना टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपको फिल्म ‘दमन’ में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का, किरदार भी आपने बहुत विविधतापूर्ण निभाए हैं। ओटीटी पर भी आप काफी प्रयोग करते दिख रही हैं, इस तरह के किरदार मिलना भी कितना चुनौतीपूर्ण होता होगा?

मैं जरूर कहूंगी कि मैं अभिव्यंजना (मैनिफेस्टेशन) पर बहुत विश्वास करती हूं। जो भी तरंगें अपनी वाणी से आप ब्रह्मांड में भेजते हैं वह जरूर कहीं न कहीं असर करती हैं और वैसी ही चीजें आपके पास आने लगती हैं। आप यकीन नहीं करेंगे दोनों ही वेब सीरीज या ‘केजीएफ’ की बात करें तो ‘अरण्यक’ भी मुझे इसकी शूटिंग शुरू करने से पहले अलग अलग प्लेटफॉर्म से अलग अलग नामों से ऑफर हो रही थी। और, मैं हर बार मना कर रही थी, तो वे लोग हर बार और उसके सुधारकर मेरे पास वापस आते। आखिर में जब सिद्धार्थ रॉय कपूर और रोहन सिप्पी इसे मेरे पास लेकर आए तो नेटफ्लिक्स इसे ले चुका था और तब मैंने हां की। ‘केजीएफ टू’ के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। ‘केजीएफ 1’ के दौरान ही इसके निर्देशक प्रशांत नील मेरे पास आए थे लेकिन मेरा ये कहना था कि जब ‘केजीएफ टू’ का ही रोल डेवलप नहीं हुआ है तो मैं ‘केजीएफ वन’ करके ही न अटक जाऊं। मैंने उनको कहा कि केजीएफ वन मे आप मेरा बॉडी डबल इस्तेमाल कर लीजिए और फिर ‘केजीएफ टू’ अपन जम के करते हैं और वही हुआ।

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रवीना टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, ‘कर्मा कॉलिंग’?

जिस ओरीजनल शो ‘रिवेंज’ पर ये शो बना है, इसका हिंदी अनुकूलन मेरे पास 10 साल पहले स्टार टीवी की तरफ से एक धारावाहिक के लिए आया था और उस समय मेरे बेटे बहुत छोटे थे। और, बनाने वालों को 260 दिन मेरी शूटिंग के लिए चाहिए थे। मैंने तब इसे मना कर दिया था क्योंकि बच्चे मेरे बहुत छोटे थे और उनको छोड़कर मैं शूटिंग पर जाना नहीं चाहती थी, मुझसे हो भी नहीं सकता था ये। फिर छह साल बाद ये फिर मेरे पास आया। फिर, मैंने मना किया और हर बार इससे रुचि नारायण जुड़ी हुई थीं, पहले वह सहायक निर्देशक थीं अब वह खुद इसका निर्देशन कर रही हैं। जैसे कि मैंने कहा कि अगर आप किसी चीज की बार बार अभिव्यंजना करो तो वह लौटकर आपके पास आती ही है, ये मेरी ‘कर्मा कॉलिंग’ थी। तो जब समय सही होता है तो बाकी सब भी अपने आप सही हो ही जाता है। हां, ना बोलना मुश्किल है क्योंकि उसके लिए आपके पास वह विश्वास होना चाहिए।

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रवीना टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

नए कलाकारों को आप शूटिंग के समय कितना उत्साहित करती हैं?

मैं वैसे तो सलाह नहीं देती हूं क्योंकि पता नहीं उसकी जरूरत है भी नहीं। लेकिन, हां किसी सीन को बेहतर बनाने के लिए मैं उनकी मदद करती हूं। जैसे कि अभी एक नई फिल्म की शूटिंग कर रही थी तो उसमें मेरे साथ जो अभिनेत्री थीं, उन्हें बहुत भावुक होना था और जब उनकी आंखों में आंसू आते थे तो वह अपना चेहरा नीचे कर लेती थीं, तो मैं उनसे फुसफुसा कर कहती है कि ऊपर देखो, ऊपर देखो क्योंकि कैमरा उनके चेहरे के भाव रिकॉर्ड कर रहा था और उनकी आंखें कैमरे में देखेंगी तभी दर्शकों से उनका रिश्ता बनेगा। मुझे ऐसा करने में तो कोई नुकसान नही दिखता। वरिष्ठ कलाकारों की ये जिम्मेदारी भी है कि वह नए साथियों का हौसला बढ़ाते रहें। हालांकि, मेरे साथ ऐसा शुरू के दिनों में ऐसा नहीं होता था..

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रवीना टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

...मतलब?

कभी मैं भी नई थी और ऐसा हुआ है मेरे साथ कि एक बहुत ही सीनियर कलाकार ने ऐसे मौके पर मेरी मदद नहीं की उल्टे वे मुझे अपने आभामंडल से प्रभावित करने की कोशिश करते थे और अगर मैं किसी सीन में उनसे बेहतर काम कर ले जाती थी तो वे सीन काट दिए जाते थे। क्योंकि उस अभिनेता से ये सहन नहीं हो पा रहा था और आश्चर्यजनक किंतु सत्य तथ्य ये भी है कि हालांकि उस फिल्म में मेरे इतने सारे सीन काट दिए गए थे उसी फिल्म के लिए मैंने सारे फिल्म अवार्ड्स जीते।

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राशा थडानी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपकी बिटिया राशा थडानी आपकी कितनी सलाह मानती है?

बहुत ही अच्छी बच्ची है। वह बहुत ही समझदार बेटी है। उसकी परवरिश हमने बहुत अच्छे से करने की कोशिश की है। उनकी फिल्मों के बारे में मुझे बात करने की मनाही है। लेकिन, मैंने हमेशा कहा है कि मेरी बेटी को शुरू से कलात्मक विषयों मे रुचि रही है। मेरा बेटा रणबीर बिल्कुल इन सबमें रुचि नहीं लेता। उसका पढ़ने लिखने की तरफ ज्यादा झुकाव है। वह फिल्में भी नहीं देखता है। उसने दो ही हिंदी फिल्में देखी हैं, और वह भी मेरे साथ। एक ‘दूल्हे राजा’ और एक ‘अंदाज अपना अपना’। वह भी बचपन में। मैं तो अब बोलती भी हूं कि चल मेरे साथ पिक्चर देखने लेकिन वह बस सिर्फ मार्वल की फिल्में देखता है।

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रवीना टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

एक आखिरी सवाल दीपिका पादुकोण को लेकर, 25 जनवरी को उनकी फिल्म रिलीज हो रही है ‘फाइटर’ और 26 जनवरी को आपकी सीरीज आ रही है, ‘कर्मा कॉलिंग’, दीपिका की अब तक की तरक्की की वजह आप क्या मानती हैं?

मैं समझती हूं कि ये हमारी जो नई जेनरेशन है, वह बहुत ही मेहनती है। वह किसी चीज को हल्के में नही लेती है। हम लोगों ने जो परिपक्वता 20-25 फिल्में करने के बाद हासिल की थी, उतनी परिवक्वता ये लोग अपनी पांचवीं फिल्म में ही हासिल कर ले रहे हैं। ये लोग फिल्में भी बहुत सोच विचारकर साइन करते हैं। हम लोग तो आंखें मूंदकर फिल्में साइन करते थे। हीरो अच्छा है, निर्देशक अच्छा है, बस साइन कर ली। रोल भी नहीं सुनते थे। ऐसा भी एक समय था जब मैं एक साथ 30 फिल्में कर रही थी। स्टूडियो से स्टूडियो भागते रहते थे और ऐसा लगता था कि 24 घंटे के दिन में 25 घंटे काम कर रहे हैं। बिना आराम किए, बिना सोए, तीन-तीन चार-चार शिफ्टों में काम कर रहे होते थे। तो, आप समझ सकते हैं कि काम को लेकर हमारा कितना ही फोकस हो पाता होगा...।

(इस इंटरव्यू के संपादित अंश अमर उजाला अख़बार के 21 जनवरी 2024 के अंक में प्रकाशित हो चुके हैं।)
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