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राजकुमार राव की कामयाबी के ये हैं तीन मंत्र, ‘अमर उजाला’ के साथ खास बातचीत में खुद किया खुलासा

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राजकुमार राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
राजकुमार राव हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा अभिनेताओं में शुमार हो चुके हैं जिनकी फिल्में कोरोना संक्रमण काल में भी सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी हैं। राजकुमार की फिल्म ‘रूही’ कोरोना की पहली लहर के बाद सीधे सिनेमाघरों में रिलीज हुई। और, अच्छा बिजनेस करने में कामयाब रही। उनकी एक फिल्म ‘द व्हाइट टाइगर’ ने भी सीधे ओटीटी पर रिलीज होकर भी खूब वाहवाही बटोरी। जंगली पिक्चर्स की फिल्म ‘बधाई दो’ की शूटिंग वह पूरी कर चुके हैं। एक और कॉमेडी फिल्म ‘हम दो हमारे दो’ भी पूरी ही होने वाली है। और, अब वह शुरू कर चुके हैं ‘अंधाधुन’ बनाने वालों की नई क्राइम ड्रामा फिल्म ‘मोनिका, ओ माई डार्लिंग’। राजकुमार कहते हैं, ‘हां, कुछ ज्यादा ही कॉमेडी कर ली है मैंने हाल की फिल्मों में। आपने सही कहा और मुझे भी लगने लगा है कि मैं कैमरे के सामने का ड्रामा मिस करने लगा हूं। कहानी की नाटकीयता मुझे काफी पसंद आती है। जिन दोनों कॉमेडी फिल्मों का आपने नाम लिया है, उनके बाद मैं भी कुछ ड्रामा ही तलाशता रहा। ‘मोनिका, ओ माई डार्लिंग’ इसी तलाश से निकली हैं।’
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राजकुमार राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
राजकुमार राव नीयत के साफ इंसान हैं। विनम्रता भी उनमें कूट कूट कर भरी है। अभी अमिताभ बच्चन और इमरान हाशमी की फिल्म ‘चेहरे’ देखने के लिए सनी देओल के स्टूडियो सनी सुपर साउंड में फिल्म समीक्षकों का मजमा लगा हुआ था। राजकुमार अपनी किसी फिल्म की डबिंग के लिए वहां से गुजरे तो पहले तो रफ्तार में आगे निकल गए। फिर उन्हें लगा कि शायद लॉबी में कुछ जाने पहचाने चेहरे भी थे, तो वह वापस लौटे। सबको सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करते हुए अभिवादन किया और फिर काम के लिए आगे बढ़े। कामयाबी की ऊंचाई पर पहुंच चुके राजकुमार मानते हैं कि परंपराओं को संजोए रखने से ही आत्मविश्वास बढ़ता है।
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राजकुमार राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और बतौर अभिनेता उनकी भूख किस वजह से बढ़ती रहती है? ये पूछने पर राजकुमार अपनी कामयाबी का पहला मंत्र साझा करते हुए कहते हैं, ‘मेरा मुकाबला अपने आप से है। मैं अपने पिछले हर रोल को ही अपनी अगली कसौटी मानता हूं। ये भी मानता हूं कि हर नई फिल्म से उम्मीदें होती हैं। और, इन उम्मीदों पर खरा उतरने की मैं पूरी कोशिश भी करता हूं। मेरे नाम से अगर फिल्म बिकती है तो फिर फिल्म अच्छी बने, मेरे चाहने वालों को पसंद आए, इसकी जिम्मेदारी भी मेरी ही है।

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राजकुमार राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मनोज बाजपेयी जैसे अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘दीवार’ देखकर हीरो बने वैसे ही राजकुमार को भी मनोज की फिल्म ‘शूल’ देखकर हीरो बनने का हौसला आया। राजकुमार मानते हैं कि लगातार अभ्यास और लगातार कोशिश ही वह मंत्र है जो उन्हें यहां तक लेकर आया। वह कहते हैं, ‘स्टेज से मेरा लगाव था। गुड़गांव से दिल्ली आया तो यहां भी नाटकों से जुड़ा रहा। इसी दौरान मैंने मनोज बाजपेयी की ‘सत्या’ और ‘शूल’ जैसी फिल्में देखीं। मुझे लगा कि ये सब भी हो रहा है अभिनय की दुनिया में तो मैं पुणे गया, वहां अभिनय सीख और मुंबई आ गया। हां, इस बीच मैंने शाहरुख खान की फिल्में भी खूब देखीं। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ और ‘कुछ कुछ होता है’ जैसी फिल्मों से भी मैंने काफी कुछ सीखा है।’
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राजकुमार राव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
राजकुमार राव के साथ काम कर चुके निर्देशक भी मानते हैं कि वह बहुत ही सहज कलाकार हैं। उनमें इतनी कामयाबी के बाद भी अनावश्यक अकड़ नहीं है। यही उनकी कामयाबी का तीसरा मंत्र भी है। वह जिस सरलता से बात समझते हैं, उतनी ही तरलता से अपन किरदार में बह जाते हैं। राजकुमार कहते भी हैं, ‘परदे पर किसी किरदार को पेश करना निर्देशक की ही कल्पना होती है। वह किसी कहानी को लेकर एक अलग दुनिया गढ़ता है। बतौर अभिनेता हमारा काम उस निर्देशक की कल्पना में रंग भरना होता है। निर्देशक को अपनी कल्पना पता हो तो काम करना बहुत सहज रहता है। जैसे हंसल मेहता हैं। उनके सिनेमा ने भी धीरे धीरे ही विकास किया है। वह खुद से सीखे हुए निर्देशक हैं इसीलिए उनके काम में बहुत सहजता और बहुत ठहराव है। उनके साथ मेरा एक अलग रिश्ता बन गया है। ये रिश्ता एक अभिनेता का अपने निर्देशक पर भरोसे का रिश्ता है। और, एक निर्देशक का अपने अभिनेता पर यकीन का रिश्ता है।
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