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Hariharan Interview: मैं सौ फीसदी बंबइया हूं! लेकिन विकिपीडिया वाले हैं कि मेरी बात सुनते ही नहीं

Sat, 18 Feb 2023 07:37 AM IST
पलक शुक्ला अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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हरिहरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अपनी जादुई आवाज से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाले दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों और पद्मश्री से सम्मानित गायक हरिहरन देश की तकरीबन सभी भाषाओं में गा चुके हैं। खुद को खालिस बंबइया मानने वाले हरिहरन इस बात से दुखी दिखे कि विकीपीडिया ने उनकी मातृभूमि बदल दी है। अपने नए अलबम ‘मनमर्जी’ के सिलसिले में उन्होंने ‘अमर उजाला’ से ये खास मुलाकात की।

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हरिहरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हरिहरन जी, आपके श्रोता ही नहीं बल्कि मुंबई फिल्म जगत के अधिकतर लोग भी आपका जन्म दक्षिण भारत में मानते हैं, ये गलतफहमी कैसे चली आ रही है?
मेरा जन्म तिरुवनंतपुरम, केरल में हुआ, यह गलत जानकारी इंटरनेट से फैली और फैलती ही जा रही है। लोग पीढ़ी दर पीढ़ी एक गलत जानकारी पर यकीन करते जा रहे हैं और इस बारे में विकिपीडिया मेरी बात सुनने को तैयार ही नहीं है। ये बोल बोलकर मैं थक चुका हूं कि इंटरनेट पर मेरे बारे में जो गलत जानकारी है उसे ठीक कर दें लेकिन विकिपीडिया वाले हैं कि मेरी बात सुनते ही नहीं। मैं सौ फीसदी बंबइया हूं (मुंबइया भी नहीं)। मेरा जन्म दादर में हुआ। माटुंगा के डॉन बॉस्को हाई स्कूल और सेंट जेवियर्स कॉलेज से मैंने पढ़ाई की है।
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हरिहरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, संगीत की पढ़ाई आपको घुट्टी के साथ मिली..
हां, जब से मैंने होश संभाला, संगीत ही सबसे पहले कानों में पड़ा। पिताजी (अनंत सुब्रमणि) शास्त्रीय गायक थे। उनसे मां (अलामेलू मणि) ने संगीत सीखा और मां से मैंने संगीत सीखा। मेरी मां संगीत पढ़ाती भी हैं। बहुत छोटा था तभी पिताजी हम सबको छोड़ गए। लेकिन, संगीत के जरिये वह हमारे जीवन में अब भी बने हुए हैं। मां ने संगीत की जो घुट्टी पिलाई, उसी ने मुझे उस्ताद गुलाम अली साहब तक पहुंचाया और बस तब से सफर जारी है..
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हरिहरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और इसी बीच आपने जीत लिया आल इंडिया सुर सिंगार कंपटीशन?
उन दिनों अखबार में एक विज्ञापन निकला था कि आल इंडिया सुर सिंगार प्रतियोगिता के लिए दो गाने रिकार्ड करके भेज सकते हैं। मैं और मेरे एक दोस्त घनश्याम वासवानी ने दो गाने रिकार्ड करके भेज दिए। घनश्याम वासवानी भी गायक थे। मेरे गाने की रिकॉर्डिंग उन्होंने की और उनके गाने की रिकॉर्डिंग मैने करके भेजी।

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हरिहरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इसी कंपटीशन ने आपकी सिनेमा के लिए राह खोली होगी होगी?
सही कहा आपने। इस कंपटीशन के बाद ही सबसे पहले संगीतकार जयदेव ने मुझे साल 1977 में अपनी फिल्म 'गमन' में गाने का मौका दिया। ये किसी फिल्म के लिए गाया मेरा पहला गाना था। कुछ और फिल्मों में भी गाया उसके बाद लेकिन 80 के दशक की शुरुआत में ही मुझे गजलों ने अपनी तरफ खींच लिया। बस तभी से गजलें और फिल्मी दोनों के साथ मोहब्बत जारी है।

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हरिहरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपके करियर में संगीतकार ए आर रहमान का काफी योगदान रहा है, उनसे पहली बार कब मिले?
उन दिनों ए आर रहमान जिंगल (विज्ञापन) बनाते थे। उनका फोन मेरे पास 1992 के शुरू में आया। तब तक वह दिलीप ही थे। उन्होंने मुझे निर्देशक मणिरत्नम की फिल्म 'बॉम्बे' का गीत गाने के लिए अपने स्टूडियो बुलाया। ये गाना 'तू ही रे, तू ही रे' जब मैंने गाया तो मुझे इसकी ध्वनियां बहुत अच्छी लगीं। उन्हें सुनने का एहसास ही कुछ अलग था। 'ताल' में जब मैंने 'इश्क बिना क्या जीना यारो' जब पहली बार गाया था तो मुझे वह ठीक नहीं लगा। फिल्म में जो गाना आपने सुना, वह इस गाने का दूसरा टेक है जो मैंने एक हफ्ते बाद दोबारा गाया था।
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हरिहरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अरविंद स्वामी, अक्षय खन्ना तो ठीक हैं, लेकिन आपने अमरीश पुरी जैसे कलाकार के लिए भी गाकर तो कमाल ही कर दिया था..
(मुस्कुराते हुए) फिल्म 'परदेस' का वह गाना इसके निर्देशक सुभाष घई ने बहुत ही खूबसूरती से शूट किया था। दृश्य बहुत ही भावुक था। आपको एक किस्सा सुनाता हूं। एक दिन हम लोग ये फिल्म परिवार के साथ देख रहे थे। 'आई लव इंडिया' गाना आया तो उसमें एक लाइन अमरीश पुरी पर भी फिल्माई गई है। मेरी मां ने छूटते ही कहा, 'अमरीश पुरी कितने सुर में गा रहे हैं।' मैं हंसने लगा तो मां ने इसकी वजह पूछी। तब मैंने बताया उनको कि इसे भी मैंने ही गाया है।

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हरिहरन - फोटो : social media

और, इंटरनेट की मानें तो आपके गजल गायन की शुरुआत आशा भोसले के एलबम आबशार-ए-गजल से हुई?
इंटरनेट पर यह जानकारी भी गलत है। मेरा पहला अलबम 'गजल का मौसम' था। उसमे उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहब का संगीत था। उसके बाद मैने 'सुकून' किया। इसमें आशा भोसले जी ने मेरा परिचय श्रोताओं से कराया। तब कहीं जाकर मैंने आशा भोसले जी के लिए एक अलबम 'आबशार-ए-गजल' कंपोज किया जिसकी बात आप कर रहे हैं।

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हरिहरन - फोटो : social media
और, लता मंगेशकर ने आपको विदेश की सैर कराई..
मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे लता दीदी के साथ 'लम्हे', 'डर' और 'हू तू तू' जैसी फिल्मों में गाने का मौका मिला। लता जी से मिलना ही मेरा सौभाग्य रहा है। उनके साथ जो भी वक्त बिताया वह सोने पर सुहागा है। वही मुझे पहली बार लंदन ले गई थीं। बहुत प्यार दिया उन्होंने मुझे। बाद में दीनानाथ मंगेशकर अवॉर्ड से सम्मानित भी उन्होंने ही कराया। आशा जी और लता जी से मुझे बहुत सीखने का मौका मिला। जब तक वे पूरी तरह से तैयार नहीं होती थी तब तक माइक पर नहीं आती थी। एक रिहर्सल, दो रिहर्सल, तीन रिहर्सल..तब तक रिहर्सल करती रहती थीं जब तक कि पूरे गाने का हर खम, हर पेंच उन्हें याद न हो जाए। वह लाइव रिकॉर्डिंग का जमाना था और जब ये दोनों गाना शुरू करती थीं तो फिर रुकती नहीं थीं।
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हरिहरन - फोटो : social media
ये नया अलबम मनमर्जी क्या है?
जैसा इस एलबम का नाम है, उसी हिसाब के इसमें गाने हैं। जो मन में आया वह गा दिया। मन अगर साफ हो और उस मन से जो आवाज निकले वह लोगों को जरूर पसंद आएगी। इसमें कव्वाली है। गीतनुमा गजल है। सूफी गाने भी हैं बिक्रम घोष ने जिस तरह से इनका संगीत रचा है, उसी हिसाब से मैंने गाया है। मैंने कव्वालियां ज्यादा नहीं गाई हैं तो कह सकते हैं कि इसकी कव्वाली मेरी तरफ से मेरा चाहने वालों को एक तोहफा है।
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