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Vishal Bhardwaj Interview Part 2: हिंदी मीडियम में न पढ़ पाने का आसमान को क्यों है दुख, और क्रिकेट छूटा तो...

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विशाल भारद्वाज और आसमान भारद्वाज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
संगीतकार, लेखक, निर्देशक और निर्माता विशाल भारद्वाज के पिता गन्ना निरीक्षक थे। 12वीं तक वह हिंदी मीडियम में पढ़े और लंबे समय तक अंग्रेजी ठीक से न बोल पाने के अपराध बोध से ग्रसित रहे। लेकिन, जो बातें उन्हें शुरू में उन्हें अपनी कमजोरी लगती थीं, वही अब उनकी ताकत हैं। ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से एक लंबी बातचीत के पहले हिस्से में आपने उनकी लंबे समय से तब्बू के साथ चली आ रही साझेदारी, पंजाबी सिनेमा से आईं अभिनेत्री वामिका गब्बी की खासियत और उनकी नई कृतियों ‘चार्ली चोपड़ा एंड द मिस्ट्री ऑफ सोलांग वैली’ व ‘खुफिया’ के बारे में पढ़ा। अब आगे...

यहां विशाल भारद्वाज के इंटरव्यू का पहला भाग पढ़ सकते हैं..
इरफान नहीं रहे तो ‘खुफिया’ में दूसरे हीरो को लिया ही नहीं, विशाल भारद्वाज का खुलासा
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खुफिया में अली फजल - फोटो : सोशल मीडिया
आपकी आने वाली फिल्म खुफिया में अली फजल का जो किरदार है उसी के ऊपर पूरा उपन्यास लिखा गया है एस्केप टू टू नोव्हेयर। इस किरदार के लिए अली फजल को ही लेने की क्या वजह रही?
अली का काम मैंने ‘मिर्जापुर’ में देखा। फिर अली ने एक फिल्म महामारी के दौरान की थी जो अभी रिलीज नहीं हुई है। वह दो लोगों की फिल्म थी जो एक घर के अंदर शूट हुई है। उसने और हुसैन दलाल ने काम किया था। उसमें मुझे अली का काम बहुत अच्छा लगा। दंगों के समय की फिल्म है कि एक कमरे में दो लोग फंसे हुए हैं। एक हिंदू है। एक मुसलमान है। बहुत खूबसूरत काम किया है अली ने इस फिल्म में। ‘मिर्जापुर’ में बबलू का किरदार तो हम देख ही चुके हैं, लेकिन इस फिल्म को देखकर मुझे लगा कि अली के अंदर तो कमाल की विविधता और गहराई है, उनके अभिनय में। थोड़ा सा मुझे चाहिए भी था ऐसा जैसा किरदार कि उसे शौक है महंगी घड़ियां पहनने का। विदेशी शराब पीने का। और, अली ने बहुत अच्छा काम किया है इस किरदार के लिए फिल्म ‘खुफिया’ में।

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विशाल भारद्वाज और आसमान भारद्वाज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जब पिता-पुत्र एक ही पेशे में हों और एक ही कला भी अपना रहे हों तो घर में दोनों का नजरिया कितना टकराता है आपस में क्योंकि अब वह भी निर्दशक हैं, आप तो हैं ही निर्देशक पहले से?
अरे, बहुत टकराता है। पहली बात तो इसी पर टकराता है कि आज फिल्म कौन सी देखेंगे। वह कहेंगे मुझे ये फिल्म देखनी। मैं कहूंगा नहीं तो मुझे ये नहीं, मुझे वह वाली देखनी है। मुझे ये जॉनर चाहिए ही नहीं। मैं इस विषय पर काम कर रहा हूं। तो हमारा बहुत होता है। बहस भी होती हैं और बहुत सी हम चर्चा भी करते हैं अलग अलग किरदारों को लेकर। इसमें मजा भी है क्योंकि ये जिंदगी है ही ऐसी।

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आसमान भारद्वाज ग्रैजुएशन सेरेमनी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
किसी हुनरमंद पिता का बच्चा अगर अपने पिता की ही कला को अपना रहा है, तो एक पिता को अपने बेटे की परवरिश किस तरह करनी चाहिए, अपने बेटे का हुनर निखारने के लिए?
बड़ा मुश्किल काम है, लेकिन हां आप अपने बच्चे को उस दुनिया के सामने ला सकते हैं कि देखो, ये दुनिया है। इसमें तुम खुद कितनी डुबकी लगाओगे। जितना गहरे जाओगे, उतना ऊपर निकलकर आओगे। जब आप उसे दुनिया के सामने उतार देते हैं तो कभी उसको पहले ही समझ आ जाएगा, कभी बाद में समझ आएगा। कभी, कभी भी समझ में नहीं आता। आप उसको हर चीज मुहैया करा सकते हैं, आप उसको जिंदगी का कल्चर दे सकते हैं कि ये हमारी संस्कृति है, हम यहां से आते हैं। हर इंसान अपनी एक अलग बनावट लेकर पैदा होता है। कुछ है हमारी परंपरा में। वह अब भी हमारे साथ रहना चाहता है। वह खुद अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है। उसकी गर्लफ्रेंड है, फिर भी वह हमारे साथ वक्त बिताना चाहता है। एक बाप सिर्फ इतना काम कर सकता है कि वह अपने बेटे को उन चीजों के समक्ष खोल दे। अगर फिर भी नहीं कर रहा है तो किसी तरह उसे धक्का दे उसके अंदर। बाप को कभी दोस्त बनना पड़ता है, कभी दुश्मन बनना पड़ता है।
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विशाल भारद्वाज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपके पिताजी आपकी संगीत यात्रा की पहली सीढ़ी बने थे। फिर जो आपकी पत्नी बनीं, उन्हें भी संगीत में रुचि है। आप खुद भी संगीत का ध्यान करते हैं। इस जीवन यात्रा के शुरू में जो आपने सुर लगाए थे, वे अब भी कितने संतुलित बचे हुए हैं?
मुझे लगता है कि संतुलन अच्छे से बना हुआ है क्योंकि एक तो संगीत मेरी जिंदगी थी और अब भी मेरे लिए मेरा पहला प्यार संगीत ही है। फिल्म निर्देशक बना भी मैं इसलिए कि जैसा संगीत मैं सिनेमा में चाहता हूं वैसा कर सकूं नहीं तो कौन मुझे मेरी पसंद का संगीत अपनी फिल्म में करना देना चाहेगा। दूसरा संतुलन जो परिवार के साथ जीवन में होना चाहिए, वह भी बनना बहुत जरूरी है। अभी तक तो सब संतुलन में है।
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खुफिया म्यूजिकल नाइट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म खुफिया का जो संगीत है, वह भी लीक से काफी इतर है। आपने रहीम और कबीर के दोहों को लेकर इसका जो संगीत रचा है, वह भी मुझे लगता है कि आपके विचारों में शुरू से ही है?
मुझे लगता है कि हम लोगों को अंग्रेजी को लेकर भय बना रहता था, अब भी है। मैं हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ा 12वीं तक। इसके बाद मैं हिंदू कॉलेज, दिल्ली आ गया। मुझे बड़ा कॉम्प्लेक्स रहता था कि मेरी अंग्रेजी उतनी अच्छी नहीं है। मैं अच्छी अंग्रेजी नहीं बोल पाता हूं। अपने भावों को सही तरीके से प्रकट नहीं कर पाता हूं अंग्रेजी में क्योंकि हम हिंदी में सोचते हैं। और, हिंदी को लेकर एक अजीब सा मखौल था, एक मजाक था। हिंदी बोलने वालों को तो मजाक का विषय समझा जाता था।
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विशाल भारद्वाज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, अब जाकर बीते एक दशक में ये माहौल बदला है..
हां, अब मैं जो पीछे पलटकर देखता हूं तो सोचता हूं कि अगर मैं हिंदी मीडियम में न पढ़ा होता तो मेरे पास भाषा की ये समृद्धि नहीं होती। भले उस वक्त हम कबीर की जीवनी रटकर लिखते थे लेकिन उनके दोहे तो याद हैं। जब वह पढ़ते थे कि ‘कांकर पाथर जोड़ि कै मस्जिद लई बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा भया खुदाय’ या फिर ‘पाहन पूजे हरि मिलें तो मै पूजूं पहाड़, ता ते तो चाकी भली पीसि खाए संसार’ तब तो रटे हुए होते थे, और इनका मतलब भी समझ नहीं आता था लेकिन जब बड़े हुए तो समझ आय़ा कि अरे, इसके तो कितने गंभीर मायने हैं। आसमान को तो ये पता ही नहीं। मुझे तो उसे जबर्दस्ती बताना पड़ता है। उसे अब समझ आता है कि अरे, ये तो इतना अच्छा है। मुझे बोलता है कभी कभी कि मुझे हिंदी मीडियम में क्यों नहीं पढाया। ये चीज तो मुझे अब पढ़नी पड़ रही है, मेरा स्कूल तो अब शुरू हो रहा है। मुझे लगता है कि हम लोग सौभाग्यशाली हैं जहां से हम लोग आए हैं। हम बंबई में रहते हैं। बातें हम अंग्रेजी में करते हैं। फिल्में हम बनाते हैं हिंदीभाषियों के लिए।

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ओंकारा में अजय और करीना - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कितना मिस करते हैं अपनी परवरिश के ठौर को या नजीबाबाद को। अब जाते हैं वहां?
अब जाना होता नहीं है, मेरठ तो बहुत जाता हूं क्योंकि मेरे दोस्त हैं वहां पर बहुत सारे, लेकिन नजीबाबाद तब से अब तक नहीं गया हूं। हमारा जो पैतृक गांव है, जहां के मेरे पिताजी हैं, वह बुलंदशहर के पास एक मशहूर गांव है शिकारपुर। पिताजी गन्ना निरीक्षक थे पहले हल्द्वानी में, वहां से नजीबाबाद फिर मेरठ...

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राष्ट्रपति से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त करते हुए विशाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और क्रिकेट कितना मिस करते हैं। कभी इस बात का दुख होता है कि अगर चोट नहीं लगी होती तो मैं भी नेशनल खेल रहा होता?
अब तो मिस नहीं करता लेकिन तब तो मुझे बहुत दुख होता था। अब मैं पलटकर देखता हूं तो सोचता हूं कि जो भी आपके साथ होता है जिस वक्त, वह बहुत अच्छे के लिए होता है अगर मैं उस वक्त क्रिकेट खोल रहा होता तो ये जो एक्सप्रेशन ऑफ आर्ट है ये जो फिल्ममेकिंग है, यहां तक तो मैं पहुंचता ही नहीं। शेक्सपीयर को तो कभी जिंदगी में पढ़ता ही नहीं। मुझे लगा कि ऊपरवाले का एक अपना स्क्रीनप्ले चलता है तो वह जो करे से स्वीकार कर लेना चाहिए।
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प्रियंका चोपड़ा ओर विशाल भारद्वाज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
एक आखिरी सवाल ये है कि फिल्म में आपने स्पेशल थैंक्स में प्रियंका चोपड़ा का नाम लिखा है, तो उनका क्या योगदान है फिल्म खुफिया के लिए?
अरे, आपने तो क्या कमाल की चीज नोट की है। फिल्म में जो अमेरिका का हिस्सा है, उसे हम कनाडा में शूट कर रहे थे। कनाडाई दूतावास हमें यहां दिलासा देता रहा, हमारे कोई 40 लोगों के वीजा थे, दे देंगे, हो जाएगा। और, सब कुछ हमारा तय हो गया। हमने पैसे जमा कर दिए। वहां लोकेशन वगैरह सब कर ली और सिर्फ नौ लोगों के वीजा मिले। तो नौ लोग हम लोग यहां से गए इनमें कलाकार भी शामिल थे। जब हम वहां पहुंचे शूटिंग से दो दिन पहले तो न हमारे पास हमारा कॉस्ट्यूम डिजाइनर था, मेकअप, हेयर कोई नहीं आया। तब्बू के साथ कोई नहीं था, न बॉय न मेकअप, कुछ नहीं था। सिर्फ एक्टर्स को वीजा दिए। मुझे वीजा दिया। मेरे एसोसिएट को वीजा दिया। संयोगवश हमारा डीओपी (डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी) अमेरिका से था तो उसको वीजा की जरूरत नहीं थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि शूटिंग कैसे होगी। जैसे परसों से शूटिंग होनी है और आज हम बैठे हुए हैं कि कोई है ही नहीं। कोई आने वाली भी नहीं। प्रियंका एलए (लॉस एंजिलिस) में थी मैंने उसको फोन किया कि हम लोग ऐसे फंस गए हैं क्या करें। वो संडे का दिन था। वो कितनी कमाल की औरत है, कितनी कमाल की इंसान है। उसने संडे को पूरा लगके अपनी पूरी टीम बिठाई। उसने अमेरिका से, कनाडा से जहां जहां से जो भी लोग हो सकते थे, सब फिक्स कराई और हमारी शूटिंग शुरू कराई। अब ये तो कोई दोस्त ही कर सकता है और कोई अच्छा इंसान ही कर सकता है।
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