जानें क्यों उठाया यह कदम
बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन अभिनय के साथ ही अपने द्वारा उठाए गए कदमों की वजह से भी लोगों का दिल जीतने में कामयाब रहे हैं। अमिताभ खुद जितने अच्छे अभिनेता है, उतने ही बड़े सिने प्रेमी भी हैं। इसलिए उन्होंने फिल्मों के संरक्षण को लेकर कदम उठाया। उनकी इस पहल के लिए उन्हें इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ फिल्म आर्काइव अवॉर्ड देकर सम्मानित भी किया जा चुका है। लेकिन ऐसा करने के पीछे भी एक वजह थी, जो दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार से जुड़ी है। दिलीप कुमार की वजह से ही अमिताभ बच्चन ने फिल्मों को सहेजने के बारे में कदम उठाया।
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अपने बंगले में सहेज कर रखीं फिल्में
दरअसल, अमिताभ बच्चन दिलीप कुमार को काफी पसंद करते हैं, लेकिन वह महान अभिनेता की कुछ फिल्में सिर्फ इस वजह से नहीं देख पाए थे क्योंकि वह हमेशा के लिए खो गई थीं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनका सही तरीके से संरक्षण नहीं हुआ था। ऐसे में अमिताभ बच्चन हमेशा से ही फिल्मों को सहेजने में रुचि रखते हैं और भारत में नष्ट हो रही फिल्मों के संरक्षण का मुद्दा उठाते थे। फिल्मों के संरक्षण की शुरुआत अभिनेता ने अपने घर से की और कई दशकों तक अपनी करीब साठ फिल्मों को पश्चिमी मुंबई के अपने बंगले में एयर कंडीशन में रखा।
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अब एनजीओ कर रहा फिल्मों का संरक्षण
हालांकि, अब इन फिल्मों के प्रिंट सहेजने के लिए अमिताभ बच्चन ने एक एनजीओ ‘फिल्म हेरीटेज फाउंडेशन’ को सौंप दिए थे, जो इन्हें नियंत्रित तापमान पर रखती है। ये एनजीओ भारतीय फिल्मों को संवारने और सहेजने का काम करती है और फाउंडेशन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब रही है। वहीं, अमिताभ बच्चन एक तरह से इसके ब्रांड एंबैस्डर हैं। अब अभिनेता के 80वें जन्मदिन के मौके पर फिल्म हेरीटेज फाउंडेशन ने 8 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक चार दिवसीय फिल्म महोत्सव का आयोजन करने का एलान किया है।
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जरूरी है फिल्मों का संरक्षण
भारत में बॉलीवुड के साथ ही दस बड़े फिल्म उद्योग हैं और हर साल सभी भाषाओं में 36 हाजर से ज्यादा फिल्में बनती हैं। लेकिन इन्हें सहेजने के लिए सिर्फ दो आर्काइव हैं। ऐसे में कई फिल्में संरक्षण की वजह से नष्ट हो जाती हैं। अगर आज हम भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा (1931) की बात करें तो उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। 1988 में आई श्याम बेनेगल की फिल्म 'भारत एक खोज' की भी मूल कॉपी का पता नहीं हैं। लेकिन ऐसा सिर्फ पुरानी फिल्मों के साथ ही नहीं है, नई फिल्में भी इसकी भेंट चढ़ रही हैं। एसएस राजामौली के अनुसार 2009 में आई 'मगधीरा' के नेगेटिव छह साल में ही गायब हो गए। ऐसे में डिजिटल युग से पहले बनी फिल्मों का सही तरह से संरक्षण करना बेहद जरूरी हो जाता है।
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