गुजरता साल 2023 इस बात के लिए हमेशा याद किया जाएगा कि इसी साल युवा पीढ़ी का डिजिटल और ओटीटी से मोह धीरे धीरे भंग होना शुरू हुआ। कुछ कुछ ऐसी ही कहानी पर बनी है नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘खो गए हम कहां’। इस फिल्म में अभिनेता आदर्श गौरव ने मध्यमवर्गीय परिवार के एक ऐसे युवक का किरदार किया है, जिसके दोस्त रईस है लेकिन जिसके सपने अब भी गरीब ही हैं। पिता से उसकी बनती नहीं है, जिसे वह दोस्त समझता है, वह सिर्फ उसका इस्तेमाल कर रही है और जीवन में कहीं ठौर उसका बन नहीं रहा। इस किरदार और जीवन के संघर्ष के बारे में आदर्श गौरव से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक खास मुलाकात।
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शुक्ल पक्ष-आदर्श गौरव, सिद्धांत चतुर्वेदी, अनन्या पांडे
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
एक तेलुगू परिवार की संतान का हिंदी सिनेमा में अपनी अभिनय यात्रा शुरू करना कितना चुनौतीपूर्ण रहा अब तक?
जमशेदपुर में मेरा जन्म हुआ तो मैं बचपन से ही हिंदी ज्यादा बोलता रहा हूं। घर पर हमारा नियम रहा है कि हम अपनी मातृभाषा तेलुगु में बात करते हैं। लेकिन, घर पर तो हम समय ही कितना गुजारते हैं। छोटे होते हैं तो बाहर खेल रहे होते हैं। और, बड़े हो जाते हैं तो काम धंधे में लग जाते हैं।
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आदर्श गौरव
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इस साल पिता-पुत्र संबंधों पर सिनेमा में बहुत फोकस रहा है। अपने अभिभावकों से रिश्ते के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?
मेरे पिताजी का बैंक में नौकरी के चलते हमेशा तबादलता होता रहता था। मैंने मम्मी के साथ समय ज्यादा गुजारा है। पिताजी के साथ उतना समय मिला नहीं। अब जाकर मैं पिताजी के साथ समय गुजार रहा हूं और उन्हें समझने की कोशिश शुरू कर रहा हूं।
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आदर्श गौरव
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आप एक मध्यमवर्गीय परिवार से हैं और फिल्म ‘खो गए हम कहां’ में भी ऐसा ही किरदार कर रहे हैं, जो अमीर घरों के युवाओं का दोस्त है..
ऐसे किरदारों के मेरे जो अनुभव रहे हैं, वे मेरी हकीकत से बहुत मिलते जुलते हैं। 2007 मैं मुंबई आया और पापा को बैंक की तरफ से जुहू में मिले फ्लैट में रहता था। शुरू के दो साल मेरे लिए जुहू ही मुंबई था। ये समझ ही नहीं थी कि इसके बाहर क्या है? जमशेदपुर के जिस स्कूल से आया था, वहां स्कूल की फीस तीन सौ रूपये थी और यहां मुंबई में तीन हजार। मेरे आसपास एकदम से ऐसे लोग आ गए जो ब्रांड्स की बातें करते रहे थे। हमारे यहां तो जूतों, कपड़ो के बारे में बातें ही नहीं होती थी। मुझे भी लगने लगा कि अरे, इसने नाइकी के जूते पहने हैं, और मेरे पास तो बाटा के हैं।
इस तरह की बातों से मेरे भीतर बहुत ही कम उम्र में गहरी आर्थिक असुरक्षा घर करने लग गई थी। मैं अपनी और अपने माता-पिता की तुलना इन ब्रांड्स प्रेमी लोगों और उनके माता पिता से करने लग गया था। ये सब अब जाकर सोशल मीडिया पर हो रहा है लेकिन मैं इससे 16 साल पहले ही गुजर चुका हूं। अब ये मुझे बहुत अजीब सी बात लगती है लेकिन उस समय का तो यही सच है।
यानी कि ये जो आपके संघर्ष के अनुभव हैं, उन्होंने आपकी अभिनय यात्रा में कुछ मदद की?
जी, ये मेरे लिए बहुत मददगार रहा। हालांकि, तब मुझे ये समझ नहीं आता था। मुझे उन दिनों इसे लेकर बहुत झुंझलाहट भी होती थी कि हमें हर डेढ़ साल में घर बदलना पड़ता था। पापा के तबादले होते रहते थे। बैंक का घर मिल गया तो ठीक नहीं तो हमें किराए के मकान मे रहना होता था। दूसरे साल मकान मालिक किराया बढ़ाना चाहता था जो हमारे बस में था नहीं, तो फिर ढूंढो उसी बजट का कोई नया मकान। मुंबई में पिछले 15 साल में मैंने ऐसे कोई 10 मकान बदले। तब जो इससे झुंझलाहट होती थी, अब वही मेरे काम आ रहा है। मैं इतने अलग-अलग लोगों से मिला हूं। इतने अलग-अलग इलाकों में रहा हूं कि मेरे पास अब तकरीबन हर किरदार का संदर्भ है।
और, लोगों को ये बताना कितना जरूरी है कि ये सिक्स पैक एब्स वगैरह ये सब फोटोशॉप किया हुआ है?
फिल्म ‘खो गए हम कहां’ में जो ये दृश्य है, ये इन दिनों हो रहा है। कर सकते हैं हम एप्स की मदद से ऐसी चीजें। लेकिन, जिनको असलियत पता है, वे जानते हैं कि ये असली फोटो नहीं है।
सोशल मीडिया पर सब खुश ही नजर आते हैं, जैसे कि कभी किसी का दिल टूटा ही नहीं, अजीब नहीं लगा ये?
ऐसा लोग इसलिए करते हैं क्योंकि लोगों को रोतलू लोग पसंद नहीं हैं। लोगों को हमेशा अच्छी और रंगीन चीजें देखनी हैं। लोगों को यही देखना है कि सब अच्छा है, सब सही है। किसी रोते हुए इंसान को देखकर कोई क्यों अपना भी दिन खराब करना चाहेगा।
मतलब कि आप भी उदास होते हैं तो अपनी हंसते हुए वाली ही तस्वीर डालते हैं?
नहीं, मेरी तो जन्म से ही शक्ल ऐसी है कि मैं चाहूं भी तो हंसता हुआ चेहरा नहीं ला सकता। मैं जब सामान्य रहता हूं तो लोगों को लगता है कि मैं गुस्से में हूं। मुझे बहुत लोगों ने बोला है कि मैं हंसता ही नहीं हूं। मेरे साथ ये उल्टी समस्या है। अब मैंने ये सीखना शुरू किया है और अब मुझे हंसी आ भी नहीं रही होती है तो भी मैं हंस देता हूं।