वीर सावरकर
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निरंजन तकले बताते हैं, "सावरकर ने वायसराय लिनलिथगो के साथ लिखित समझौता किया था कि उन दोनों का समान उद्देश्य है- गाँधी, कांग्रेस और मुसलमानों का विरोध करना। अंग्रेज़ उनको पेंशन दिया करते थे, साठ रुपये महीना।"
राम बहादुर राय कहते हैं, "दरअसल सावरकर पर आखिरी दिनों में जो कलंक लगा, उसने उनकी विरासत पर अंधकार का बादल डाल दिया। अंडमान की जेल में रहते हुए पत्थर के टुकड़ों को कलम बना कर जिसने 6000 कविताएं दीवार पर लिखीं और उन्हें कंठस्थ किया। लेकिन इसके बावजूद जब सावरकर महात्मा गांधी की हत्या से जुड़ जाते हैं, वह समाप्त हो जाते हैं।"
निरंजन तकले कहते हैं, "मैं सावरकर की जिंदगी को कई भागों में देखता हूं। उनकी जिंदगी का पहला हिस्सा रोमांटिक क्रांतिकारी का था, जिसमें उन्होंने 1857 की लड़ाई पर किताब लिखी थी। इसमें उन्होंने बहुत अच्छे शब्दों में धर्मनिरपेक्षता की वकालत की थी।"
'पोलराइजिंग फिगर'