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सैकड़ों सालों में कैसे बदलता गया दिल्ली का नाम, पहले इस नाम से जानी जाती थी देश की राजधानी

Fri, 17 Jan 2020 10:35 AM IST
Mohit Mudgal एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
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दिल्ली चुनाव में बिगुल बजने के बाद से आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। जहां आम आदमी पार्टी इस चुनाव में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में किए अपने काम के नाम पर वोट मांग रही है। वहीं दूसरी ओर भाजपा दिल्ली की जनता से केंद्र सरकार द्वारा किए काम और प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर वोट लेने के लिए प्रचार कर रही है।

लेकिन आज हम आपको बताएंगे उस दिल्ली के नाम के पीछे की कहानियों के बारे में जिसकी सत्ता पर काबिज होने के लिए इस समय ये राजनीतिक पार्टियां सभी दांव-पेंच लगा रही हैं। बता दें कि दिल्ली में 8 फरवरी को मतदान होगा, और 11 फरवरी को नतीजे सामने आएंगे।
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  • दिल्ली के पुराने नाम का जिक्र सबसे पहले पौराणिक काल में पाया जाता है। सबसे पहले पांडवों ने दिल्ली को इंद्रप्रस्थ के नाम से बसाया था। यह उस समय यह पांडवों की राजधानी थी। दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ से दिल्ली कैसे पड़ा इसे लेकर भी कई कहानियां है। आइए जानते हैं आज 'नई दिल्ली' के नाम से जानी जाने वाली राष्ट्रीय राजधानी के पीछे की कहानी...
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  • दिल्ली नाम को लेकर एक कहानी है जो सबसे ज्यादा प्रचलित है। वो है कि ईसा पूर्व 50 में एक मौर्य राजा थे धिल्लु। उन्हें दिलु भी कहा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि धिल्लु का अपभ्रंश होकर बाद में दिल्ली हो गया।
  • एक तर्क यह भी दिया जाता है कि तोमरवंश के राजा धव ने इलाके का नाम ढीली रख दिया था। उनके ऐसा करने कि वजह बड़ी ही अजीबोगरीब बताई जाती है। ऐसा माना जाता है कि किले के अंदर लोहे का खंभा ढीला था। इस लिए उन्होंने इलाके का नाम ढीली रख दिया। यही ढीली शब्द बाद में दिल्ली हो गया।

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  • इतिहासकारों के बीच एक कहानी यह भी प्रचलित है कि तोमरवंश के दौरान जो सिक्के बनाए जाते थे, उन सिक्कों को देहलीवाल कहा जाता था। इसी से शहर का नाम दिल्ली हो गया। 
  • कुछ इतिहासकार ऐसा भी मानते हैं कि पहले के समय में दिल्ली के इलाके को हिंदुस्तान की दहलीज माना जाता था। यह दहलीज बाद में दिल्ली हो गई।
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  • मौर्य सम्राट दिलु को लेकर कई दावे किए जाते हैं। एक धारणा के मुताबिक उनके सिंहासन के सामने एक कील थी, इस कील के बारे में कहा जाता था कि यह कील पाताल तक पहुंच गई है। राज्य के ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि जब तक यह कील है, तब तक मौर्य साम्राज्य का राज रहेगा। पूरी कहानी अगली स्लाइड में...
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  • भविष्यवाणी के बाद राजा के मन में आया कि कील काफी छोटी है इसलिए उन्होंने कील उखड़वा ली और उसे दोबारा मजबूती से गड़वाया। लेकिन बाद में फिर कील उतनी मजबूती से नहीं धंसी और ढीली हो गई। इसके बाद उस समय एक कहावत बनी कि किल्ली तो ढिल्ली भई!
  • कहावत काफी मशहूर हुई । बाद में दिलु, ढिल्ली और दिल्लु को मिलाकर दिल्ली बना दिया गया।
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  • महाराज पृथ्वीराज चौहान के समय में भी दिल्ली और इसके संस्थापक का जिक्र मिलता है। पृथवीराज ने दरबार में चंदरबरदाई कवि हुआ करते थे। उनकी हिंदी रचना पृथ्वीराज रासो में तोमर राजा अनंगपाल को दिल्ली का संस्थापक बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि अनंगपाल ने लाल-कोट का निर्माण करवाया था और महरौली के गुप्त कालीन लौह-स्तंभ को दिल्ली भी वही लाए थे। बता दें कि दिल्ली में तोमर शासनकाल 900-1200 ई. तक रहा था।
  • दिल्ली या दिल्लिका शब्द का उपयोग सबसे पहले उदयपुर के शिलालेखों पर पाया गया। इन शिलालेखों का काल 1170 ई. माना जाता है।
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