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कड़कड़ाती ठंड में खाना-सोना भी मुश्किल: मां की आवाज सुनते ही रो पड़ा विशाल, बोला-बहुत बुरे हैं हालात

Tue, 01 Mar 2022 11:16 AM IST
पूजा त्रिपाठी मूर्ति दलाल, अमर उजाला, फरीदाबाद
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छात्र विशाल - फोटो : अमर उजाला/पीटीआई
कड़कड़ाती ठंड में यूक्रेन के पड़ोसी देशों की सीमाओं पर फंसे स्थानीय छात्र न तो खा पा रहे हैं न ही सो पा रहे हैं। सोमवार को तीन दिन बाद यूक्रेन में फंसे छात्रों के साथ परिजनों की बात हुई। इसके बाद उन्हें वहां के मुश्किल हालातों की जानकारी लग सकी। छात्रों से परिजनों का संपर्क कटा हुआ है। इंटरनेट की सुविधा मिलने पर तीन दिन बाद परिजनों को वहां के हालात की जानकारी लग सकी।

खाने-पीने व शौच जैसी आधारभूत सुविधाओं के लिए भी मारामारी
राहुल कॉलोनी निवासी कुमरचंद ने बताया कि उनका 20 वर्षीय पोता यूक्रेन में पढ़ाई करने गया है। सोमवार शाम पांच बजे उसका फोन आया। तीन दिन बाद वह इंटरनेट की सुविधा मिलने पर घर पर बात कर सका। मां राजवती की आवाज सुनते ही फफक-फफक कर रो पड़ा। बोला हालात बहुत बुरे हैं। यूक्रेन का बॉर्डर सील कर दिया है। वहां से हमारे बाद निकलने वाले छात्रों को रोक दिया गया है।
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यूक्रेन से स्वदेश लौटे छात्र - फोटो : पीटीआई
हम पोलैंड के बॉर्डर पर हैं। यहां मदद मिल रही है। हमसे पीछे छूटे युवाओं को मार रहे हैं। हमें बताया कि 48 घंटे बाद घर पहुंच जाएंगे। बीते तीन दिन से इस बॉर्डर पर फंसे हैं। एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए जिले से यूक्रेन के इवानो फ्रांसिस राष्ट्रीय मेडिकल विश्वविद्यालय (विवि) में पढ़ाई करने गए दो छात्र वहां के ताजा हालात की जानकारी परिजनों को दे रहे हैं। तीन दिन बाद परिजनों से उनकी बात हुई।
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यूक्रेन की राजधानी कीव की तस्वीर - फोटो : पीटीआई
सोमवार को परिजनों से हुए संपर्क से पता चला कि वहां जमा देने वाली ठंड में युवाओं को एक हॉल में रखा गया है। भारी संख्या में वहां विदेशी छात्रों की भीड़ होने के कारण खाने-पीने व शौच जैसी आधारभूत सुविधाओं के लिए भी मारामारी है। दीप (19 वर्षीय) व विशाल (20 वर्षीय) बेहतर भविष्य का सपना लिए वहां गए लेकिन आज जिंदगी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। सेक्टर-9 निवासी दीप के भाई सौरभ ने बताया कि उनका छोटा भाई रोमानिया बॉर्डर पर है। स्थानीय प्रशासन व सरकार से उन्हें कोई मदद व जानकारी नहीं मिल रही। उसने कांपती हुई आवाज में बात की। कहा कि बहुत ठंड है। यहां सामान्य दिनों की तरह सभी को रखा गया है, ऐसे में छात्र सर्दी में ठिठुर रहे हैं।

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यूक्रेन से घर लौटी छात्रा मां से लिपटी - फोटो : पीटीआई
वहां छह साल की एमबीबीएस की पढ़ाई, यहां एक साल का डोनेशन
दीप के भाई सौरभ ने बताया कि वह फार्मासिस्ट है। छोटा भाई दीप एमबीबीएस करना चाहता है। यहां उसने नीट की तैयारी कर सरकारी-निजी कॉलेज में पढ़ाई के लिए मौके तलाशे। सरकारी में दाखिला नहीं मिला। निजी में एक साल का डोनेशन ही 25 से 30 लाख रुपये है। कई निजी कॉलेजों में दाखिले के लिए हाथ-पैर मारे फिर भी कम से कम 20 लाख रुपये का डोनेशन लग रहा था।
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यूक्रेन से स्वदेश लौटे छात्र - फोटो : पीटीआई
सालाना फीस व खर्च अलग इसलिए परिवार ने तय किया कि यूक्रेन में राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में छह साल की पढ़ाई ही यहां के डोनेशन में हो जाएगी। ऐसे में उसे यूक्रेन भेज दिया। वह दिसंबर में ही यूक्रेन गया था। जैसे ही रूस से युद्ध जैसे हालात बने तो फ्लाइट का पता किया। अमूमन 25 हजार रुपये में होने वाली एक तरफ की फ्लाइट का किराया बढ़कर 1.5 लाख रुपये कर दिया गया। इस कारण दीप को वापस नहीं ला सके। स्थानीय स्तर पर किसी से कोई मदद नहीं मिल रही।
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