इस बार का चुनाव अपने आप में खास है। उत्तराखंड के चुनावी रण में दो-दो बार सत्ता का स्वाद चख चुकी भाजपा और कांग्रेस 3-2 की लीड लेने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रही है। इस कारण मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए जहां कांग्रेस ने उत्तराखंडियत की बात कही तो भाजपा आने वाले दशक को उत्तराखंड का दशक कह रही है।
चुनावी समर में ऐपण, पहाड़ी टोपी, गागरी के बाद पिछौड़े तक की एंट्री हो गई है। लोगों से जुड़ने के लिए अपनाए गए ये हथकंडे कितने कारगर हुए इसका पता तो 10 मार्च को ही लग पाएगा, लेकिन इन सबने यहां की संस्कृति को राष्ट्रीय पटल पर प्रसिद्धि तो दिला ही दी है।
चुनावी समर के शुरूआती दौर में किसी को ये आभास भी नहीं था कि पहाड़ी टोपी लोगों के बीच चर्चा का विषय बन जाएगी। गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ब्रह्मकमल लगी उत्तराखंडी टोपी पहने नजर आए थे। उसके बाद से ही यह टोपी ट्रेंड बन गई। उत्तराखंड में भाजपा का जो भी नेता आया उसके शीश पर पहाड़ी टोपी नजर आई। फिर वह स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, सीएम धामी हों, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा हों या फिर राजनाथ सिंह हर नेता और कार्यकर्ता ने लोगों से खुद को जोड़ने के लिए पहाड़ी टोपी का सहारा लिया।