मम्मी, आप बिल्कुल परेशान मत होइए, मैं एकदम ठीक हूं। आप लोगों की बहुत याद आ रही है। अब यहां फर्स्ट महार रेजिमेंट की ओर से कमरा भी मिल गया है। आप लोगों को रहने में कोई दिक्कत नहीं होगी। रेयांश-लावण्या आई लव यू... जल्द ही ठीक होकर आपके पास आऊंगा...।
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deepak nainwal dead body
- फोटो : amar ujala
ये बातें दीपक नैनवाल ने 17 मई की रात 8.30 बजे अंतिम बार अपने परिजनों के साथ हुई वीडियो कॉल में कही थी, लेकिन यह दीपक के साथ उनकी अंतिम बातचीत होगी, इसका इल्म परिजनों को कतई नहीं था। दीपक के भाई प्रदीप नैनवाल बताते हैं कि 17 मई को करीब 12 मिनट वीडियो कॉल पर बात हुई थी। वह पूरी तरह स्वस्थ लग रहे थे। उन्होंने माता-पिता, पत्नी और बच्चों के साथ ही उनसे भी बात की। हमें लग रहा था कि जल्द ही दीपक हमारे बीच होगा, लेकिन हमें नहीं पता था कि यह हमारी अंतिम बातचीत होगी। प्रदीप के मुताबिक, अगले ही दिन दोपहर दीपक को लगातार तीन अटैक पड़े। उन्हें आईसीयू से हटाकर वेंटीलेटर पर रखा गया, लेकिन मौत के मुंह से निकले दीपक को जिंदगी फिर दगा दे गई।
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deepak nainwal
- फोटो : file photo
मुठभेड़ में उन्हें कई गोलियां और छर्रे लगे थे। दिल्ली के आरआर अस्पताल में कई गोलियां निकाल दी गईं। वहीं, दो गोलियां उनके फेफड़े को चीरती हुई दिल के पास लगी थीं। इसमें से एक गोली चिकित्सकों ने निकाल दी, लेकिन एक गोली को इसलिए नहीं निकाला गया, क्योंकि उसके निकलते ही दीपक का शरीर शून्य हो जाता। इसे देखते हुए उन्हें इलाज के लिए पुणे स्थित पैराप्लेजिक रिहैब सेंटर रेफर किया गया था। यहां 20 दिन के बाद रविवार की सुबह उनका निधन हो गया।
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...मगर तिरंगे से खूबसूरत कोई कफन नहीं होता
शहीद नायक दीपक नैनवाल के दिल में बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा कूट-कूटकर भरा था। वह अपने पिता की तरह सेना में जाना चाहते थे। जब पिता घर आते तो उनसे अपने लिए वर्दी लाने की जिद करते थे। पिता कहते थे की जब बड़े हो जाओगे, तब वर्दी मिलेगी। दीपक का यह सपना वर्ष 2001 में फर्स्ट रेजिमेंट के जरिये सेना में जाने के साथ पूरा हुआ।
दीपक नैनवाल के पिता चक्रधर प्रसाद ने फोन पर बताया कि बेटे को एडवेंचर लाइफ बहुत पसंद थी। उसने बचपन से ही सेना में जाने की जिद की और उसे पूरा किया। मां पार्वती कहती हैं कि अगर उनका बेटा जिंदा होता तो देश के लिए और भी बहुत कुछ करता। मुझे उम्मीद थी कि मेरा बेटा मौत को मात देकर 12 अप्रैल को छुट्टी पर घर आएगा, लेकिन अब वो कभी नहीं आएगा। शहीद की पत्नी ज्योति कहती हैं कि दीपक हमेशा कहते थे कि ‘जमानेभर में मिलते हैं आशिक कई, मगर वतन से खूबसूरत कोई सनम नहीं होता, नोटों में सिमटकर मरे हैं लोग, मगर तिरंगे से खूबसूरत कोई कफन नहीं होता।’ वह कहती हैं कि अपने बच्चों को भी सेना में भेजेंगी।