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उत्तराखंड में मौजूद है मां काली का 'शक्तिपुंज', तस्वीरों में करिए दर्शन...

Wed, 06 Jul 2016 08:27 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
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maa kali shaktipunj kalishila and kalimath - फोटो : (फोटोः कालीमठ मंदिर की बेवसाइट से)
मां भगवती का असीमित 'शक्तिपुंज' देवभूमि उत्तराखंड में ऊंचाई पर मौजूद है। कालीमठ मंदिर रुद्रप्रयाग में स्थित है। यहां से करीब आठ किमी. खड़ी चढ़ाई के बाद कालीशिला के दर्शन होते हैं। विश्वास है कि मां दुर्गा शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज का संहार करने के लिए कालीशिला में 12 वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट हुई थीं। कालीशिला में देवी-देवताओं के 64 यंत्र हैं।
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मान्यता है कि इस स्थान पर शुंभ-निशुंभ दैत्यों से परेशान देवी-देवताओं ने मां भगवती की तपस्या की थी। तब मां प्रकट हुई। असुरों के आतंक के बारे में सुनकर मां का शरीर क्रोध से काला पड़ गया और उन्होंने विकराल रूप धारण कर लिया। मां ने युद्ध में दोनों दैत्यों का संहार कर दिया। मां को इन्हीं ६४ यंत्रों से शक्ति मिली थी।
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स्थानीय निवासीओं के अनुसार, यह भी किवदंती है कि माता सती ने पार्वती के रूप में दूसरा जन्म इसी शिलाखंड में लिया था। वहीं, कालीमठ मंदिर के समीप मां ने रक्तबीज का वध किया था। उसका रक्त जमीन पर न पड़े, इसलिए महाकाली ने मुंह फैलाकर उसके रक्त को चाटना शुरू किया। रक्तबीज शिला नदी किनारे आज भी स्थित है। इस शिला पर माता ने उसका सिर रखा था।

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कालीमठ मंदिर में एक कुंड है, जो रजत पट/ श्रीयंत्र से ढका रहता है। शारदीय नवरात्रों में अष्टमी को इस कुंड को खोला जाता है। मान्यता है कि जब महाकाली शांत नहीं हुईं, तो भगवान शिव मां के चरणों के नीचे लेट गए। जैसे ही महाकाली ने शिव के सीने में पैर रखा वह शांत होकर इसी कुंड में अंतर्ध्यान हो गईं। माना जाता है कि महाकाली इसी कुंड में समाई हुई हैं। कालीमठ में शिव-शक्ति स्थापित हैं। यहां पर महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, गौरी मंदिर और भैरव मंदिर स्थित हैं। यहां अखंड ज्योति निरंतर जल रही है।
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उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित यह कालीमठ मंदिर मां काली को समर्पित है। इसे भारत के सिद्ध पीठों में से एक माना जाता है। कालीमठ रुद्रप्रयाग जिले के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक है। स्कंद पुराण के अंतर्गत केदारखंड के बासठवें अध्याय में मां के इस मंदिर का वर्णन है। रुद्रशूल नामक राजा की ओर से यहां शिलालेख स्थापित किए गए हैं जो बाह्मी लिपि में लिखे गए हैं। इन शिलालेखों में भी इस मंदिर का पूरा वर्णन है।
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इस मंदिर की स्थापना शंकराचार्य ने की थी। यहां मां काली ने रक्तबीज राक्षस का संहार किया था । इसके बाद देवी मां इसी जगह पर अंर्तध्यान हो गई थीं। आज भी यहां पर रक्तशिला, मातंगशिला व चंद्रशिला स्थित है। नवरात्रि के शुभ अवसर पर इस मंदिर में देश के विभिन्न भागों से हजारों की संख्या में भक्तगण आते हैं।
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रुद्रप्रयाग जनपद के विकास खण्ड ऊखीमठ के अन्तर्गत मां काली का प्राचीन मंदिर है। ऋषिकेश-गौरीकुण्ड राष्ट्रीय राजमार्ग पर के स्थान गुप्तकाशी से 22 किमी॰ आगे जाकर कालीमठ पहुंचा जा सकता है। यहां पर पहुंचने के लिए ऋषिकेश से गुप्तकाशी तक जीएमओ, टीजीएमओ, यातायात, गढ़वाल मण्डल विकास निगम की बसें तथा प्राइवेट कार एवं टेक्सी की सुविधा भी उपलब्ध है। गुप्तकाशी से स्थानीय जीप, टैक्सी एवं बस के माध्यम से कालीमठ तक पहुंचा जा सकता है।
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कालीमठ में यात्रा के लिए माह मई से अक्टूबर तक का समय उत्तम रहता है। क्योंकि इस समय केदारनाथ यात्रा भी संचालित रहती है। अतः यात्रीगण केदारनाथ यात्रा के साथ-साथ कालीमठ के भी दर्शन कर सकते हैं। नवरात्रि के समय मां काली दर्शन शुभ माने जाते हैं।

Published By : Nirmala Suyal
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