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हनुमानजी के इस मंदिर में विदेशों से आते हैं लोग, मान्यता ऐसी कि 2025 तक हो चुकी है बुकिंग

Wed, 14 Feb 2018 09:30 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोटद्वार
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sidhbali temple - फोटो : amar ujala
हनुमानजी के इस मंदिर की मान्यता इतनी प्रसिद्ध है कि मंदिर में भंडारा करवाने के लिए 2025 तक बुकिंग हो चुकी है।
 
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sidhbali temple kotdwar
श्री सिद्धबली धाम कोटद्वार में बाबा की चौखट से कोई भी श्रद्धालु निराश नहीं लौटता है। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद यहां पूरी होती है। मनोकामना पूरी होते ही भक्त मंदिर में भंडारा कर हनुमान जी को भोग लगाते हैं। श्रद्धालुओं पर बजरंग बली की नेमत इस कदर बरसती है कि यहां भंडारा आयोजन के लिए भक्तों को सालों साल इंतजार करना पड़ता है। धाम में अगले सात वर्षों यानी 2025 तक भंडारों की एडवांस बुकिंग चल रही है।

 
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sidhbali temple kotdwar
कोटद्वार स्थित श्री सिद्धबली धाम हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। बजरंग बली जी के इस पौराणिक मंदिर का जिक्र स्कंद पुराण में भी है। श्री सिद्धबली बाबा के दर्शन को देश एवं विदेश से श्रद्धालु यहां उमड़ते हैं और मंदिर में मत्था टेककर मनोकामना मांगते हैं। बाबा अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते। मुराद पूरी होने के बाद श्रद्धालु मंदिर में भंडारा कर भोग लगाते हैं।

 

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sidhbali temple kotdwar
भंडारे के आयोजन के लिए मंदिर समिति की ओर से बुकिंग की जाती है। भंडारा बुकिंग काउंटर के प्रभारी सुनील बुड़ाकोटी और शैलेश कुमार जोशी बताते हैं कि रविवार, मंगलवार और शनिवार को विशेष भंडारा होता है। रविवार और मंगलवार के भंडारा आयोजन 2025 तक बुक हो चुके हैं। शनिवार के भंडारे लिए भी 2024 तक एडवांस बुकिंग हो चुकी है। अन्य दिनों के भंडारे भी 2019 तक के लिए बुक हैं। 

 
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sidhbali temple kotdwar
श्री सिद्धबली धाम की ख्याति देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक है। हर साल लाखों भक्त देश एवं विदेश से धाम पहुंचते हैं। भंडारा बुकिंग काउंटर के शैलेश कुमार जोशी बताते हैं कि भंडारे की एडवांस बुकिंग कराने वाले श्रद्धालु उत्तराखंड के अलावा यूपी, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र से हैं। कई एनआरआई भी हैं, जिनकी मुराद धाम में आने पर पूरी हुई है। श्री सिद्धबली धाम ट्रस्ट के अध्यक्ष कुंज बिहारी देवरानी के मुताबिक श्री सिद्धबली धाम गुरु गोरखनाथ जी की तपस्या स्थली रही है। आदिकाल में मंदिर स्थल पर सिद्ध पिंडियां थीं। 80 के दशक में मंदिर में बाबा की मूर्ति स्थापित हुई। इसके बाद ही मंदिर का सुंदरीकरण हुआ। कहा जाता है कि हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने के लिए इसी रास्ते गए थे।
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