एक दिन शास्त्री जी ने उनसे कहा, "टंडन! मैंने सुना है कि तुम अपने लेख अखबारों में भेजने के अलावा अन्य लोगों के लेख भी प्रकाशित करवाते हो !" टंडन जी ने शास्त्री जी की बात की ताईद करते हुए कहा कि बिल्कुल वह ऐसा करते हैं और अगर शास्त्री जी स्वयं उनके लिए लिखें तो उन्हें और अधिक प्रसन्नता होगी। शास्त्री जी ने पूछा कि क्या उन्हें भी उनके लेखों के लिए भुगतान किया जाएगा।
इस पर श्री टंडन ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनके लेख एक साथ कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हो सकते हैं और उनमें से कुछ का भुगतान भी होगा। आखिरकार, शास्त्री जी के लेख प्रकाशित हुए और श्री टंडन को शास्त्री जी के लेखों के लिए सभी जगहों से कुल मिलाकर लगभग दो सौ रुपये मिले, जो उन दिनों काफी बड़ी राशि मानी जाती थी।
जब टंडन साहब ने यह रक़म शास्त्री जी के हांथों में रखी, तो वह बहुत हैरान हुए और पूछा, “यह पैसा क्यों भाई ? तुमको यह कहाँ से मिला है ? तुम मुझे क्यों दे रहे हो ?" इस पर, श्री टंडन ने उन्हें बताया कि यह उनके लेखों का मानदेय है। लेकिन शास्त्री जी वास्तव में इस पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे क्योंकि उन्होंने लेखों के माध्यम से इतने पैसों की उम्मीद नहीं की थी। फिर उन्होंने कहा, "टंडन, तुम मेरे साथ मजाक तो नहीं कर रहे हो। अखबारों से जितना मिला है, उससे कहीं ज्यादा तुम मुझे दे रहे होगे। मैं तुम्हारे दोस्ताना व्यवहार की सराहना करता हूं, लेकिन मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता।"
तब श्री टंडन ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वास्तव में यह सारा पैसा उन्हीं का है। अंत में, उनकी बात मानते हुए शास्त्री जी ने कहा, "ठीक है टंडन, पर इसमें से तुम अपना कमीशन तो ले लो, जो मैं समझता हूं कि पचास प्रतिशत होना चाहिए।"
"मैं आपका दोस्त हूं, कमीशन-एजेंट नहीं," श्री टंडन ने उत्तर दिया और शास्त्री जी मुस्कुराते हुए तुरंत अन्य विषय-विमर्श में दत्तचित्त नज़र आये।