पंजाब कला भवन के ऑडिटोरियम में मंचित नाटक में ये दिखाया गया कि किस तरह एक पोस्टर युवतियों और उनके निम्न तबके के लोगों की जिंदगी बदल देता है।
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देखिए, एक ‘पोस्टर’ ने कैसे बदली युवतियों की जिंदगी
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ऑडिटोरियम बदला हुआ नजर आया। यहां रिक्शे खड़े हुए थे। जो घरों की तरह दिखाई दे रहे थे। यह घर उन मजदूरों के थे, जो जमींदार के खेतों में काम करते, अत्याचार सहते और बमुश्किल दो वक्त की रोटी जुटाते। अलंकार थियेटर ग्रुप के कलाकारों ने नाटक पोस्टर में अपनी अदाकारी से सबका दिल जीत लिया।
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नाटक की शुरुआत होती है फॉरेस्ट अफसर श्यामलाल और जमींदार पटेल के साथ। जमींदार पटेल ठेकेदार को तरह तरह के प्रलोभन देता है। नाटक में नजर अंदाज किए जा रहे मजदूरों और किसानों की आवाज उठाई गई है। इस नाटक में गांव में रहने वाले किसानों और मजदूरों के साथ शहरी मजदूरों की बात भी की गई है।
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यह कहानी उस गांव की है जिसका जमींदार पटेल है। इसके खदान, जंगल और जमीन हैं। जंगल के बीच उसका बड़ा महल है। वह मजदूरों को उतना ही देता है जितना कि दो वक्त की रोटी के लिए जरूरी है। उसके मुताबिक जिंदगी जीने के लिए दो लंगोट और दो रोटी ही काफी हैं।
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वह अपने मजदूरों को हमेशा भ्रम में डाल कर रखता है। उनको खाने के साथ-साथ शराब भी देता है ताकि वह आगे बढ़ने की सोच भी न सकें। एक दिन बवाल हो जाता है जब चैती नाम की महिला मायके से एक पोस्टर लेकर आती है। यह पोस्टर मजदूरों के हक में होता है।
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मजदूर पोस्टर लगा देते हैं, जमींदार देखता है तो भड़क जाता है। वह मजदूरों को पीटता है, आडंबरी अखंडानंद को बुलाता है और मजदूरों पर अत्याचार करता है। अंत में दिखाया है कि मजदूर जमींदार को पीटते हैं।