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15 अगस्त विशेषः 1945 में 8वीं के नौ छात्रों ने फूंका था अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल

Mon, 15 Aug 2016 09:19 AM IST
डीडी गोयल/अमर उजाला, डबवाली (सिरसा)
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स्वतंत्रता सेनानी रामप्रकाश सेठी सुना रहे हैं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक कहानी - फोटो : फाइल फोटो
क्या आप जानते हैं कि 1945 में 8वीं में पढ़ने वाले 9 छात्रों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाया था। देखिए ये विशेष रिपोर्ट।
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स्वतंत्रता सेनानी रामप्रकाश सेठी सुना रहे हैं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक कहानी - फोटो : फाइल फोटो
आजादी के लिए संघर्ष की ये कहानी सुना रहे हैं, उन्हें 9 स्टूडेंट्स में से एक 86 वर्षीय रामप्रकाश सेठी(1945 में वे 15 साल के थे)। इन दिनों वे हरियाणा के सिरसा में रह रहे हैं। वे बताते हैं कि वर्ष 1945 था और देश का हर नौजवां आजादी मांग रहा था। हमारे दिल में भी तरंगे उठने लगी। हम राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय की आठवीं कक्षा में पढ़ते थे। उस समय विद्यालय के हैडमास्टर रामचंद्र गुप्ता थे। कक्षा इंचार्ज रसाल सिंह थे। उस रोज हाजिरी के समय यस सर बोला जाता था। हमने जय हिंद बोला। कक्षा इंचार्ज ने हमें डांटा। जय हिंद बोलने पर पाबंदी लगा दी गई।
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स्वतंत्रता सेनानी रामप्रकाश सेठी सुना रहे हैं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक कहानी - फोटो : फाइल फोटो
रामप्रकाश बताते हैं कि उस समय हमारे दिल में गुस्सा था कि हम जिस देश के रहने वाले हैं, उस देश की जय नहीं बोल सकते। स्कूल में लहलहाते यूनियन जैक (ब्रिटिश झंडे) को देखकर गुस्सा ज्यादा बढ़ गया। हम मौके की तालाश में थे। विद्यालय में स्काऊट का कैंप शुरू हुआ। उसी रोज हमें मालूम पड़ा कि अंबाला के कमीशनर मेक्यूम विजिट के लिए आ रहे हैं। मेक्यूम अंग्रेजी में सात अक्षरों का शब्द था। अंग्रेजी कमीशनर के सम्मान में प्रत्येक शब्द की अलग-अलग व्याख्या के लिए हमें मंच पर बोलना था। इस मौके पर हम गंवाना नहीं चाहते थे।

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स्वतंत्रता सेनानी रामप्रकाश सेठी सुना रहे हैं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक कहानी - फोटो : फाइल फोटो
इसलिए अपने साथी बिहारी लाल बांसल, मनोहर लाल कामरा, गुरदेव सिंह शांत, ओमप्रकाश छाबड़ा, मदन लाल छाबड़ा, शमुम, रफीक तथा सद्दीक आदि के साथ मिलकर हमनें योजना बनाई। कुछ दिन पहले ही तैयारियां शुरू कर दी। प्रत्येक की डयूटी लगाई गई। अंग्रेजी अधिकारी मेक्यूम आया। उसके सम्मान में मार्च पास्ट चल रहा था, हमने विसल बजानी शुरू कर दी, मार्च पास्ट वहीं थम गया। अब शब्दों के जरिए सम्मान देने की बारी थी। मैंने एम शब्द की व्याख्या करनी थी। बोलना था मर्सी फुल, मैंने कहा मर्सी लैस। योजना के अनुसार अन्य सहयोगियों ने भी ऐसे ही किया। मुख्य रूप से गुरदेव सिंह शांत ने बोलना था।
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स्वतंत्रता सेनानी रामप्रकाश सेठी सुना रहे हैं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक कहानी - फोटो : फाइल फोटो
शांत ने कहा कि वुई आर नोट रड्डी टू रिसपेक्ट एनी ब्रिटिश डॉग। हमारे पास काले झंडे थे, हमने मेक्यू को दिखाते हुए गो बैक, गो बैक कहना शुरू कर दिया। शायद हमारे प्लान को स्कूल प्रबंधक समझ चुक थे। हम सभी यूनियन जैक को फाड़ने के लिए दौड़े। लेकिन छत पर चढ़ने के लिए प्रबंधकों ने सीढ़ी गायब कर दी थी। मेक्यूम इतना घबरा किया वह पुलिस सुरक्षा के लिए भाग खड़ा हुआ। उसकी गाड़ी पर लगे यूनियन जैक को हम फाडऩे के लिए दौड़े, पूरा विद्यालय हमारे साथ चल दिया। मेक्यूम गाड़ी लेकर फरार हो गया। हमने पूरे शहर में जलूस निकाला।
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स्वतंत्रता सेनानी रामप्रकाश सेठी सुना रहे हैं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक कहानी - फोटो : फाइल फोटो
अंग्रेज अधिकारी के खिलाफ बगावत करने पर दो दिन बाद मुझे, गुरदेव सिंह शांत, बिहारी लाल बांसल तथा हमारा साथ देने वाले एक अन्य बाहरी युवक नंद किशोर के साथ हमें गिरफ्तार कर लिया गया। गांव डबवाली स्थित थाना में लेजाया गया। फिर सिरसा, बाद में हिसार जेल में डाल दिया गया। काफी दिन जेल में बिताए। बाद में हमें छोड़ दिया गया।
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स्वतंत्रता सेनानी रामप्रकाश सेठी सुना रहे हैं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक कहानी - फोटो : फाइल फोटो
यूं तैयार किए थे काले झंडेः अंग्रेजों के खिलाफ बाल आंदोलनकारियों ने काले झंडे घरों में ही तैयार किए थे। सफेद कपड़े को काले रंग में रंगा था। जब परिजनों ने पूछा इसका क्या करोगे तो बोले विद्यालय में मंगवाए हैं। अपने प्लान के बारे में अपने परिजनों तक को भी नहीं बताया था। बाद में जेबों में रखकर वे झंडों को विद्यालय लेकर पहुंचे। दरी के नीचे छुपा दिया। जब अंग्रेज अधिकारी आया तो स्काऊट कैंप के दौरान मिले डंडों पर झंडों को चढ़ाकर विरोध शुरू कर दिया।
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स्वतंत्रता सेनानी रामप्रकाश सेठी सुना रहे हैं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी एक कहानी - फोटो : फाइल फोटो
मुस्कुराते इन बच्चों से कुछ सीखोः महज 14-15 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए जेल यात्रा करने वाले राजकीय स्कूल के स्टूडेंटस को हिसार जेल में रखा गया। उन्हीं के साथ बालिगों को भी बंद किया गया। उनमें एडवोकेट मि. कुरैशी भी थे। उनके वालंटियर माफी नामा लिख रहे थे। देश के लिए बालकों को जेल में बंद और वह भी मुस्कुराते हुए देखकर उनसे रहा नहीं गया। माफीनामा लिखने वालों पर वे बिगड़ गए। उन्होंने कहा कि इन बच्चों से कुछ सीखो।
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