फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

स्वतंत्रता दिवसः पाकिस्तान से ये शख्स लेकर आया था कटी लाशों से भरी ट्रेन, देखिए

Tue, 15 Aug 2017 08:48 AM IST
अनिल कुमार/अमर उजाला, फिरोजपुर(पंजाब)
विज्ञापन
1 of 6
1947 का गदर
1947 का गदर वो खौफनाक मंजर था, जिसे भूलना भी चाहो तो मुमकिन नहीं। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जानिए उस शख्स के बारे में जो पाकिस्तान से कटी लाशों से भरी ट्रेन लेकर आया था।
विज्ञापन

2 of 6
1947 का गदर वो खौफनाक मंजर
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बुजुर्ग बाल कृष्ण गुप्ता व सोहन सिंह की गदर की याद ताजा हो गई। वह बताते हैं कि यहीं से ट्रेन पाकिस्तान जाया करती थी और सन 1947 में दोनों देशों के बंटवारे के बाद बिगड़े हालात के दौरान दोनों देशों के कई लोग मरे थे।
विज्ञापन

3 of 6
1947 का गदर वो खौफनाक मंजर
रेलवे से सेवानिवृत हुए चीफ कंट्रोलर बाल कृष्ण गुप्ता ने बताया कि दोनों देशों का जब बंटवारा हुआ था उस समय वो रेलवे में गार्ड थे। वही पाकिस्तान से इसी रेलमार्ग से लाशों से भरी ट्रेन हुसैनीवाला रेलवे स्टेशन से होती हुई फिरोजपुर के छावनी रेलवे स्टेशन पहुंची थी।

4 of 6
1947 का गदर वो खौफनाक मंजर
बाल कृष्ण गुप्ता बताते हैं कि उन्हें रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों ने आदेश दिया था कि पाकिस्तान के गंडा सिंह रेलवे स्टेशन पर भारतीय लोग फिरोजपुर आने का इंतजार कर रहे हैं। यह कहते हुए उन्हें ट्रेन लेकर पाकिस्तान भेजा गया, जब ट्रेन से भारतीयों को लेकर हुसैनीवाला रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुए तो रास्ते में पाकिस्तान के कुछ शरारती तत्वों ने उनपर हमला बोल दिया। 
विज्ञापन

5 of 6
1947 का गदर वो खौफनाक मंजर
बाल कृष्ण गुप्ता बताते हैं कि ट्रेन में कई लोगों को तेजधार हथियार से काट दिया गया। ट्रेन खून से लथपथ थी। किसी तरह कुछ लोगों को बचाकर फिरोजपुर छावनी रेलवे स्टेशन पहुंचे। जब भी उन्हें ये दिन याद आता है उनकी आंखों से आंसू छलक उठते हैं। बुजुर्ग किसान सोहन सिंह ने बताया कि सन 1947 के गदर में इसी ट्रैक पर दौड़ने वाली ट्रेन पर पाकिस्तान की तरफ से कटी हुई लाशें भारत आई थी। 
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
1947 का गदर वो खौफनाक मंजर
बाल कृष्ण गुप्ता बताते हैं कि ट्रेन तो खून से लथपथ थी ही इस ट्रैक पर भी लोगों का खून बहा है। इसलिए यह ऐतिहासिक ट्रैक है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि हुसैनीवाला स्थित समाधि स्थल 1960 से पहले पाकिस्तान के कब्जे में था। जन भावनाओं को देखते हुए 1950 में तीनों शहीदों की समाधि स्थल पाक से लेने की कवायद शुरू हुई। करीब 10 साल बाद फाजिल्का के 12 गांव व सुलेमान की हेड वर्क्स पाकिस्तान को देने के बाद शहीद त्रिमूर्ति से जुड़ा समाधि स्थल भारत को मिल गया।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें