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हवन करते समय क्यों बोला जाता है स्वाहा? बड़ा गहरा है ये रहस्य

Thu, 28 Mar 2019 05:30 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला
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हवन - फोटो : shutterstock
हिंदू धर्म में हवन को सबसे पवित्र धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। शादी हो या कोई भी धार्मिक अनुष्ठान, अक्सर लोग हवन करते ही हैं। हवन करते समय मंत्रों का जाप करते हुए स्वाहा कहकर ही हवन सामग्री, अर्घ्य या भोग भगवान को अर्पित किया जाता है, लेकिन कभी आपने सोचा है कि हर मंत्र के अंत में स्वाहा क्यों बोला जाता है? 
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हवन - फोटो : shutterstock
स्वाहा का मतलब है, सही रीति से पहुंचाना यानी किसी भी वस्तु को उसके प्रिय तक सुरक्षित और सही तरीके से पहुंचाना। पुराणों के अनुसार, 'स्वाहा' अग्नि देव की पत्नी हैं, इसलिए हवन में हर मंत्र के बाद इनका उच्चारण होता है। 
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हवन - फोटो : shutterstock
दरअसल कोई भी यज्ञ तब तक सफल नहीं माना जाता है, जब तक कि हवन का ग्रहण देवता न कर लें, लेकिन देवता यह ग्रहण तभी कर सकते हैं जब अग्नि के द्वारा और स्वाहा के माध्यम से अर्पण किया जाए। 

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अग्नि - फोटो : shutterstock
स्वाहा के बारे में कहा जाता है कि वह प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। उनका विवाह अग्नि देव के साथ हुआ था। अग्निदेव अपनी पत्नी स्वाहा के माध्यम से ही हविष्य ग्रहण करते हैं और उनके माध्यम से यही हविष्य आह्वान किए गए देवता को प्राप्त होता है। 
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हवन - फोटो : shutterstock
स्वाहा से जुड़ी एक रोचक कहानी है, जिसके मुताबिक स्वाहा प्रकृति की ही एक कला थी, जिसका विवाह अग्नि के साथ देवताओं के आग्रह पर संपन्न हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने खुद स्वाहा को यह वरदान दिया था कि केवल उसी के माध्यम से देवता हविष्य को ग्रहण कर पाएंगे। इसीलिए कोई भी यज्ञ तभी पूरा माना जाता है, जब आह्वान किए गए देवता को उनका पसंदीदा भोग पहुंचा दिया जाए। 
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हवन - फोटो : shutterstock
हवन के सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक लाभ भी हैं। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान द्वारा किए गए एक शोध के मुताबिक, यज्ञ और हवन के दौरान उठने वाले धुएं से हवा में मौजूद हानिकारक जीवाणु लगभग 95 फीसदी तक नष्ट हो जाते हैं। साथ ही इसके धुएं से वातावरण शुद्ध होता है, जिससे बीमारी फैलने का आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।
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